दर्द और ख़ुशी दोनों ही अच्छे शिक्षक हैं।

स्वामी विवेकानंद

जीवन का प्रत्येक बीतता हुआ क्षण हमें कुछ ना कुछ नयी शिक्षा देता है I इन्ही क्षणों से मिलके हमारे दिन-रात, सप्ताह, महीने और साल बनते हैं दोस्तों हम सभी मनुष्य यही कामना करते हैं कि हमारे या हमारे प्रियजनों के जीवन में दुःख के क्षण कभी ना आयें और जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ हों, दुःख के कल्पनामात्र से ही हमारा मन विचलित हो उठता है लेकिन हम कभी भी यह नहीं सोचते हैं कि दुःख और सुख जीवन के दो पहलु हैं बस हमारा उनको देखने का नजरिया गलत है कुछ लोग बचपन को सुख तो बुढापे को दुःख कि दृष्टी से परिभाषित करने कि कोशिश में लगे रहते हैं लेकिन क्या यह सही है? दोस्तों अगर हमारे जीवन में दुःख ना हो तो हम सुख को कभी भी समझ नहीं पायेंगे अथवा अगर मैं ये कहूँ कि हमारा जीवन रसहीन और आनंदहीन हो जाएगा तो मेरा ये कहना गलत नहीं होगा I

हमारा जीवन ही नहीं उस परम सत्ता द्वारा बनाया गया यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी दुःख-सुख और रात-दिन के नियमों पर चलता है और ऐसे ही निरंतर चलता रहेगा I हमें बस दुःख को नकारात्मक दृष्टि से देखना बंद करना है और दुःख को आने वाले सुख के क्रम में पड़ने वाले एक पड़ाव के रूप में आशावान दृष्टि से देखना शुरू करना है I  

खड़े हो जाओ, और सारी जिम्मेदारी अपने कंधो पर ले लो,
अपने को कमज़ोर समझना बंद कर दो।

स्वामी विवेकानंद

कभी आपने छोटे से बच्चे को करीब से देखा है जो अभी ठीक से चल नहीं पाता लेकिन वो निरंतर अपने पैरो पे चलने के प्रयास में लगा रहता है, वो इस प्रयास में किसी के कहने पे नहीं बल्कि आत्मबोध के कारण लगा रहता है वो अपने अन्दर की क्षमताओं की खोज में लगा रहता है I दोस्तों हम सभी इंसानों में अपार क्षमता है पर आत्मविश्वास की कमी के कारण हमें उस क्षमता का ज्ञान नहीं होता है, हम अक्सर ये सुनते हैं कि एक व्यक्ति ने पृथ्वी के सबसे ऊँचे पर्वत चोटी हिमालय पे सफलता पूर्वक चढ़ाई की, हम ये खबर पढ़ के तो काफी अच्छा महसूस करते हैं लेकिन अगर हमसे कोई कह दे कि क्यूँ नहीं तुम भी चढ़ाई करते हो उस समय हमारा आत्मविश्वास जवाब दे देता है और हम बिना कोई प्रयास किये ही ये बोलते हैं कि अरे ये सबके बस की बात नहीं है I दोस्तों अगर आप इस बात को सत्य मानते हैं कि ये आपके बस की बात नहीं है तो आप सरासर गलत हैं क्यूंकि उस परम सत्ता ने हमें इस धरती का सबसे प्रतिभाशाली जीव बनाया है और अगर हम खुद की प्रतिभा पे सशंकित हैं तो यह उस परम सत्ता का अपमान है I

भगवान् भी उनकी सहायता करते हैं,
जो अपनी सहायता ख़ुद करते हैं।

स्वामी विवेकानंद

अक्सर ये सुनने को मिलता है कि कण-कण में भगवान् का वास होता है और हमें उस भगवान् को पाने के लिए किसी धार्मिक स्थान पे जाने की जरुरत भी नहीं है क्यूंकि उसका निवास स्थान प्रत्येक जीव के अन्दर है I यहाँ पे जब हम अन्दर कह रहे हैं तो इसका अर्थ भौतिक रूप से कदापि नहीं है क्यूंकि भगवान् तो हमारे अंतर्मन की शुद्धता और हमारे आत्मबल में निवास करते हैं I

दोस्तों एक कहानी सुनिए – एक शिष्य था और एक उनके गुरु थे गुरु जी ने उस शिष्य से एक बार कहा था कि भगवान् सदैव हमारी सहायता करने के लिए तत्पर रहते है और उसने अपने गुरु कि इस बात को गाँठ बाँध लिया था I एक बार वो एक गाँव से गुजर रहा था और उसी समय उस गाँव में एक मतवाला हाथी घुस आया था अब इसे सौभाग्य कहें या उस शिष्य का दुर्भाग्य मगर उसका सामना उस हाथी से हो गया I शिष्य ने गुरूजी की बात याद की और सोचा प्रभु जरुर उसके रक्षा के लिए आएँगे और वो हाथी के सामने हाथ जोड़के खड़ा हो गया और अपने अराध्य को याद करने लगा इतने में वो हाथी उसके पास आया और उसको उठाके दूर फेक दिया, शिष्य को बहुत चोट आई लेकिन वो चोट से नहीं बल्कि किसी और बात से परेशान था वो भागते हुए अपने गुरु के पास पंहुचा और हाथ जोड़ के उनके चरणों में गिर गया गुरूजी समझ गए जरुर शिष्य किसी बात से परेशान है उन्होंने कारण पूछा तो शिष्य ने सारा घटनाक्रम गुरूजी को बताया और अपनी शंका भी जाहिर की I उसने अपने गुरु से पूछा कि गुरूजी आप तो कहते थे कि हरी मेरी रक्षा के लिए आयेंगे परन्तु वहां तो कोई नहीं आया I

गुरूजी ने उसको ऊपर उठाया और कहा जब तुमने उस हाथी को अपने आँखों से अपनी तरफ आते हुए देखा और तुम्हारे दिमाग ने उस मतवाले हाथी के रास्ते से हटने के लिए प्रेरित किया ये प्रेरणा तुम्हे श्रीहरि से प्राप्त हो रहा था लेकिन तुम समझ नहीं पाए I

मित्रों प्रभु हमारे निदान में इसी प्रकार आते हैं मगर हम तो सदैव उनके भौतिक रूप कि प्रतीक्षा में लगे रहते हैं I प्रभु तो निराकार हैं वो हम सबकी अंतर्मन कि आवाज हैं, और अगर हम अपने अंतर्मन की आवाज को सुनेंगे तो हमारे जीवन में आनंद ही आनंद होगा I

एक विचार लो और उस विचार को अपनी ज़िंदगी बना लो,
उसी विचार के बारे में सोचो, उसी के सपने देखो उसी को जियो,

स्वामी विवेकानंद

सफलता-असफलता हालांकि प्रयास के ही दो पहलु हैं लेकिन हम देखते हैं कुछ व्यक्ति अपने हर प्रयास में सफल होते हैं और कुछ लोग कितना भी प्रयास करें उनके हाथ असफलता ही लगती है, और वे अहि सोचते हैं कि शायद मेरी किस्मत ही खराब है I पर ऐसा होता नहीं है जब आप सफल लोगों के जीवन को करीब से देखेंगे तो पता चलेगा कि उनकी कार्य करने की शैली ही ऐसी है कि उनको अपने हर एक प्रयास में सफलता मिलती है I 

स्वामी विवेकानंद जी ने भी अपने इस सुविचार में हमें यही बताने की कोशिश की है I अक्सर हम सफलता के बहुत्कारीब पहुच के अपने कदम वापिस खींच लेते हैं क्यूंकि हमारे अन्दर धैर्य नहीं है और अपने लक्ष्य में विश्वास नहीं है , अगर हम अपने अन्दर के आत्मविश्वास को जगाकर अपने लक्ष्यसाधना में पूरी तत्परता से लग जाए तो क्या मजाल हमें हमारा लक्ष्य ना प्राप्त हो I

करत-करत अभ्यास ते जड़मति होए सुजान I

रसरी आवत-जात ते शिल पे पडत निशान II

सारी शक्ति तुम्हारे अंदर ही है, तुम हर चीज़ कर सकते हो।

स्वामी विवेकानंद

व्यक्ति का आत्मविश्वास ही उसकी वास्तविक शक्ति होती है इसी आत्मविश्वास के बूते बहुतो ने असंभव से दिखने वाले कार्यों को बड़े ही आसानी से किये हैं I पर केवल आत्मविश्वास से लक्ष्य नहीं प्राप्त होता है बल्कि हमें चाहिए कि हम आत्मविश्वास के साथ ही साथ धैर्य भी बनाए रखे क्यूंकि कभी-कभी हम लक्ष्य के काफी करीब पहुच के धैर्य कि कमी के कारण अपने कदम पीछे खींच लेते हैं और हमें असफलता हाथ लगती है I हमने आत्मविश्वास और धैर्य की बात तो कर ली अब तीसरा घटक जो कि सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है वो है मेहनत, मान लेते हैं किसी जंगल में एक शेर है उसमे आत्मविश्वास बहुत है उसमे धैर्य भी बहुत है पर उसमे आलस्य का वास है जिसकी वजह से वो जंगल में घूम के शिकार नहीं कर पाता और कुछ ही दिनों में आत्मविश्वास और धैर्य दोनों के होने के बावजूद वो भूख से मर जाएगा I अतः हमें आत्मविश्वास, धैर्य और मेहनत इन तीनो को अपना सच्चा मित्र बनाना चाहिए और फिर हमें सफलता प्राप्त करने से कोई नहीं रोक पायेगा I

डरो मत!

अगर तुम डरते नहीं हो तो बहुत काम कर सकते हो

अगर तुम डरते हो तो तुम कुछ भी नहीं हो हमेशा कहो

"डर कुछ नहीं है” और ये सबको बताओ।

स्वामी विवेकानंद

अभी हमने ऊपर धैर्य के बारे में बताया कि कैसे धैर्य की कमी के कारण व्यक्ति लक्ष्य के पास पहुच के भी खाली हाथ लौट जाता है I अब हम जिस बारे में बात करने जा रहे हैं वो तो ऊपर बात किये गए तीनो घटकों से भी खतरनाक है, जी हाँ हम बात कर रहे हैं डर के बारे में वोही डर जिसे महात्मा गाँधी ने इंसान का सबसे बड़ा शत्रु बताया था I दोस्तो डर वो चीज है जो आपको कदम ही आगे नहीं बढाने देता और जब आप कदम आगे बढ़ाएंगे ही नहीं तो फिर सफलता-असफलता की बात ही करना बेमानी होगी I

मान लीजिये कोई व्यक्ति है उसके मस्तिष्क में बड़े ही रचनात्मक विचार आते हों पर वो अकेले उस कार्य को करने से डर रहा हो वो लोगों के पास जाएगा और अगर लोगों को उसके विचार में दिलचस्पी नहीं होगी तो उसे मन कर देंगे और इस प्रकार वो कभी भी नहीं जान पायेगा कि उसके विचार का फल क्या निकलता , वहीँ दूसरी और अगर वो बिना किसी का इन्तेजार किये स्वयं ही बिना डरे उस कार्य को शुरू कर देगा तो वो जान पायेगा कि उसके विचार का प्रतिफल क्या है I और मेरे हिसाब से जब कोई व्यक्ति बिना हिचकिचाए या डरे अकेले ही कार्य आरम्भ करने की हिम्मत रखता हो तो फिर उसको सफलता मिलनी निश्चित ही है I 

लोग मुझ पर हसते हैं क्योकि मैं अलग हूँ
मैं लोगो पर हसता हूँ क्यों की वो सब एक जैसे हैं।

स्वामी विवेकानंद

दोस्तों हम सब एक समाज में रहते हैं और जिस समाज में हम रहते हैं उसकी सबसे बड़ी विडम्बना ये है कि हम इंसानों ने मिलके समाज बनाया लेकिन आज-कल समाज इंसान का निर्माण करने में जुट गया है I हमारी प्राथमिकता ये होनी चाहिए थी कि जब हम किसी कार्य को प्रारम्भ करें तो हमारे दिमाग में ये ना आये कि लोग क्या कहेंगे लेकिन दुर्भाग्यवश हमने एक ऐसे समाज का निर्माण कर दिया है जहां हमें किसी कार्य को करने से पहले ये सोचना पड़ता है कि लोग क्या कहेंगे या अगर मैंने ऐसा कहा या किया तो कहीं लोग मुझपे हसेंगे तो नहीं और जब हम ऐसी सोच रखते हों तो हमें सफलता कभी भी प्राप्त नहीं हो सकती I

अतः हमें यहाँ पे स्वामी विवेकानंद जी के सुविचार को ध्यान में रखते हुए ही कार्य को करना चाहिए और किसी कार्य को करने से पहले हमारे दिमाग में बस ये बात आनी चाहिए कि मैं जो कार्य करने जा रहा हूँ वो सकारात्मक होगा और समाज को एक सही दिशा देगा I

हम वही है जो हमारे विचार हमें बनाते हैं, इसलिए अपने विचारों के लिए सजग हो जाओ।

स्वामी विवेकानंद

भारतीय इतिहास के दो सबसे ज्यादा प्रसिद्द किरदारों की बात की जाए तो वो किरदार होंगे प्रभु श्री राम और लंका नरेश राक्षस राज रावण का I दोस्तों ये दोनों ही पात्र महाबलशाली, ज्ञानी एवं पराक्रमी थे लेकिन एक की सोच ने उन्हें भगवान् की उपाधि दिलवा दी और एक की सोच ने उन्हें राक्षस की, दोस्तों हमारे विचार ही हमारे भविष्य को निर्धारित करते हैं अगर हम किसी के प्रति नकारात्मक सोच रखेंगे तो हमें सदैव नकारात्मक परिणाम ही प्राप्त होंगे लेकिन अगर हमारे विचार सकारात्मक हैं तो चाहे कितनी भी नकारात्मक घटनाए हमारे साथ घट जाए हमें मिलने वाला परिणाम हमारे अनुकूल होगा और सकारात्मक होगा I 

दिन में एक बार अपने आप से बात करो,
वरना तुम दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण आदमी से बात नहीं कर पाओगे

स्वामी विवेकानंद

दोस्तों हमने आत्मविश्वास और आत्मबल की बातें तो कर ली अब बात करते हैं आत्मावलोकन की I दोस्तों आत्मावलोकन का अर्थ होता है स्वयं की पड़ताल करना, हमें दिन में एक बार जरूर अपने लिए समय निकालना चाहिए और अपनी आँखों को बंद करके अपने आप से बात करनी चाहिये ऐसा करने से हमें खुद के अस्तित्व के महत्व के बारे में पता चलेगा I जब हम पूर्ण इमानदारी से अपने द्वारा किये गए कार्यों की समीक्षा करते हैं तो हमें किसी और की जरुरत ही नहीं पड़ती है I ऐसा करने से हमारे व्यक्तित्व में अभूतपूर्व परिवर्तन आता है और हमारे आत्मविश्वास में भी वृद्धि होती है और आप तो जानते ही हैं कि आत्मविश्वास किसी भी रणभूमि में विजय प्राप्त करने के लिए सबसे उपयोगी अस्त्र है I

यदि आप मेरे पास आकर किसी और की बुराई करते है
तो मुझे कोई संदेह नहीं की आप दुसरों के पास जाकर, मेरी भी बुराई करते होंगे!

स्वामी विवेकानंद

ज्यादातर लोग अपने जीवन का अधिकांशतः हिस्सा दुसरो कि बुराई करने में ही बिता देते हैं, जिसकी वो बुराई करते हैं वो तो आगे निकल जाता है लेकिन बुराई करने वाले वहीँ के वह रह जाते हैं I हमें सदैव असे इंसानों से एक निचित दुरी बना के रहना चाहिए क्यूंकि वे अपना समय तो बर्बाद करेंगे साथ में रहने वाले का समय भी बर्बाद कर देंगे I हमारा जीवन बहुत ही महत्वपूर्ण है और हमें अपने जीवन के उद्देश्यों का चयन बहुत ही सोच समझ के करना चाहिए I 

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