सच्ची सफलता और आनंद का सबसे बड़ा रहस्य यह है- वह पुरुष या स्त्री जो बदले में कुछ नहीं मांगता। पूर्ण रूप से निःस्वार्थ व्यक्ति, सबसे सफल हैं।

स्वामी विवेकानंद

अगर हम आत्मचिंतन करें तो हमें पता चलेगा कि सफलता और असफलता तो केवल एक मनःस्थिति मात्र है और यह व्यक्ति विशेष पे भी निर्भर करता है I कभी-कभी हम अपने कार्यों को करने से पहले ही उसके फल के बारे में सोचने लगते हैं और जाने-अनजाने में ही सही अनेक स्वप्न बना लेते हैं, और अगर किसी कारणवश अगर हमारा वो कार्य असफल हो जाता है तो हम दुःख के सागर में डूब जाते हैंI इसके विपरीत अगर हम निस्वार्थ भाव से उस कार्य को करें तो उस कार्य से जुडी सफलता-असफलता हमें ज्यादे प्रभावित नहीं करेगीI 

एक विचार लो। उस विचार को अपना जीवन बना लो – उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो, उस विचार को जियो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो, और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो। यही सफल होने का तरीका हैं।

स्वामी विवेकानंद

जब हम किसी शिशु को ध्यान से देखते हैं तो हम ये पाते हैं कि उसके अन्दर किसी वस्तु को पाने की एक विशेष प्रकार कि हठधर्मिता का गुण होता है और जब तक वो वस्तु उसे प्राप्त नहीं हो जाती वो उसे पाने की जद्दोजहद में वो लगा ही रहता है I हम सब बड़े होने के क्रम में उस मासूम हठधर्मिता का त्याग कर देते हैं लेकिन अगर हम ध्यान से देखे तो पायेंगे कि शिशु हठधर्मिता वास्तव में हमें काफी संतुष्टि प्रदान कर सकती है, क्यूंकि हमारे जीवन का सार अंत में हमारे द्वारा निर्धारित लक्ष्य और उनके परिणाम ही निर्धारित करते है I तो चलिए ढूंढ के फिर से लाते हैं उस बाल-हठधर्मिता को अपने अन्दर जिसे हमने कहीं खो दिया है I

क्या तुम नहीं अनुभव करते कि दूसरों के ऊपर निर्भर रहना बुद्धिमानी नहीं हैं। बुद्धिमान् व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढता पूर्वक खड़ा होकर कार्य करना चहिए। धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा।

स्वामी विवेकानंद

यह बात सर्वदा सत्य है कि हम सबके पहले गुरु हमारे माता-पिता ही हैं एवं उन्ही के मार्गदर्शन में हम अपने जीवन का पहला कदम और पहले शब्द को बोलते हैं लेकिन ये भी एक अकाट्य सत्य है कि वो भी जीवन-मृत्यु के इस बंधन से बधे होते हैं और वे सदैव इस धरा पे हमारा मार्गदर्शन करने के लिए नहीं रहेंगे I एक व्यक्ति के जीवन में उसके माता-पिता से ज्यादा निस्वार्थ भाव से प्रेम करने वाला दूसरा कोई नहीं होता है लेकिन अगर उनको भी एक दिन हमारा साथ छोड़ के जाना है तो क्यूँ ना हम स्वयं को उस परिस्थिति के लिए पहले से ही तैयार करें और अपने अस्तित्व और अपनी प्रतिभा को पहचान के स्वयं के पैरों पे मजबूती से खड़े होने की च्येष्ठा करें I

जब लोग तुम्हे गाली दें तो तुम उन्हें आशीर्वाद दो। सोचो, तुम्हारे झूठे दंभ को बाहर निकालकर वो तुम्हारी कितनी मदद कर रहे हैं।

स्वामी विवेकानंद

हम इंसान एक सामाजिक जीव हैं और हम इस सामाजिक ताने-बाने को हम एक दुसरे को मदद करके और मदद लेके संतुलित बनाए रखते हैं I परन्तु हम अक्सर उसी को मदद कहते हैं जो हमें अच्छा लगता है जैसे हमें पैसे की जरुरत हो और कोई हमें पैसा दे तो हम उसे अच्छा व्यक्ति और अपना मददगार मानते हैं लेकिन अगर वहीँ अगर कोई दूसरा व्यक्ति हमें भला-बुरा सुना दे तो हम उसे बुरा व्यक्ति मानके उसकी भर्त्सना में लग जाते हैं, लेकिन अगर हम ध्यान दे तो दूसरा व्यक्ति भी हमारी मदद ही कर रहा होता है, इस बात को हम दुसरे तरीके से समझने कि कोशिश करते हैं जब कोई व्यक्ति हमें गाली या भला-बुरा कहता है तो हमें बुरा तो लगता है किन्तु उसके गाली देने के कारण हमें दो फायदे होते हैं एक तो हमें उसके वास्तविक प्रकृति की जानकारी मिल जाती है और दूसरा वो हमें अपने अंतर्मन में झाकने पे मजबूर कर देता है और इस प्रकार हमारा व्यक्तित्व और भी निखर जाता है, हम शांत रह के उसे और समाज में अपने विनम्रता का भी परिचय देते हैं I

हम जो बोते हैं वो काटते हैं। हम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं।

स्वामी विवेकानंद

प्रकृति में हम सारे जीव चाहे वो हम इंसान हों या पशु-पक्षी या फिर पेड़-पौधे सभी एक दुसरे से किसी न किसी तरीके से जुड़े हुए हैं और इस जुड़ाव की वजह से ही हमारी प्रकृति कि सुन्दरता और संतुलन बना हुआ है I हम अक्सर अन्य प्राकृतिक जीवन से तुलनात्मक अध्ययन करके अपने जीवन में प्रेरणा प्राप्त करते हैं लेकिन लोगों को अक्सर ऐसा कहते हुए पाया गया है कि भला हम अपनी तुलना पौधों या पशु से कैसे कर सकते हैं , बात उनकी भी सही है लेकिन यहाँ समझने कि बात ये है कि हमें सापेक्ष तुलना करने कि जरुरत नहीं है लेकिन हम व्यय्वाहरिक तुलना कर सकते हैं जैसे कि अगर हम किसी खेत में धान कि बुआई करेंगे तो हम फसल तैयार होने पे गेहूं का इन्तेजार नहीं करना चाहिए यही बात हमारे जीवन में भी लागू होता है कि अगर हम किसी को गाली या भला-बुरा कहेंगे तो हमें उससे प्रेम और स्नेह कि अपेक्षा नहीं रखना चाहिए

जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो–उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति ‘बुद्धिमान’ मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो; वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही हैं।

स्वामी विवेकानंद

सत्य ही साहस है हमें कभी भी सत्य बोलने से घबराना नहीं चाहिए और किसी को प्रसन्न करने के लिए तो कभी भी सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए I आप सोचिये कोई व्यक्ति है वो आम को इमली कहने पे प्रसन्न होता हो और आप भी सोचेंगे कि चलो अगर इतना ही कह देने मात्र से अगर वो प्रसन्न हो जाता है तो भला इसमें हर्ज ही क्या है लेकिन आप ये कदापि नहीं सोच रहे हैं कि आप उसके इस झूठ को प्रश्रय देके उसे अज्ञानता कि तरफ तो धकेल ही रहें हैं दूसरा उसे वास्तविकता से भी दूर कर रहें हैं और ध्यान रहे उसे प्रसन्न करने के चक्कर में आप भी धीरे-धीरे वास्तविकता को नकारने का प्रयास कर रहे हैं I वास्तविकता के परे कि दुनिया आभाषी दुनिया होती है जो देखने में तो चका-चौंध से भरी होती है लेकिन वो मिथ्या मात्र के अलावा और कुछ भी नहीं होती I मिथ्या जगत में कष्ट ही कष्ट है मित्रों I

केवल वही जीते रहेंगे जो औरो के लिए जीते हैं।

स्वामी विवेकानंद

हमारे मानसिक पटल में ये प्रश्न आता है कि हमारा जन्म क्यूँ हुआ है और इस धरा लोक पे हमारे आगमन का क्या उद्देश्य है ?, शायद हम में  से बहुत तो सोचते भी नहीं होंगे इसके बारे में या अगर उन्होंने सोचा भी होगा तो उन्हें ये कोई समय बर्बाद करने वाला प्रश्न लगा होगा और वे अपनी दिनचर्या में अपने जीवन के शेष बचे दिन काटने में लग गए होंगे I

दोस्तों कुछ इसी सन्दर्भ से जुड़ी एक कहानी याद आ रही है आपको भी सुनाता हूँ, एक बार कि बात है दो दोस्त थे उन्होंने सोचा कि कोई व्यवसाय शुरू किया जाए, अब चुकी वो दोनों ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे तो उन्होंने सोचा क्यूँ ना फल कि दूकान खोली जाए तो दोनों दोस्तों ने एक सड़क के दोनों तरफ अपनी-अपनी दूकान खोल ली, काफी समय बीत जाने के बाद भी जब कोई ग्राहक नहीं आया तो एक दोस्त दुसरे दोस्त कि दूकान पे गया और उससे कहा बहुत देर हो गया मित्र लाओ मैं ही तुम्हारी बोहनी करवा देता हूँ और उसने १० रूपए देके उससे फल खरीदे और खा गया, थोड़ी देर बाद दूसरा दोस्त भी इसी अपने दोस्त कि बोहनी वही १० रूपए देके करवा दिया और उन दोनों ने यही क्रम पूरे दिन जारी रखा, देखते ही देखते दोनों के फल समाप्त हो गए वे बहुत खुश हुए और आपस में कहा चलो बढ़िया हुआ पहले ही दिन सारे फल बिक गए, फिर उन्होंने सोचा कि देखा जाए कमाई कितनी हुई उन्होंने जब अपनी-अपनी तिजोरी खोली तो पाया कि एक दोस्त के तिजोरी में वही १० रूपए पड़े थे और दुसरे दोस्त कि तो तिजोरी पूरी खाली थी I

दोस्तों हमारा जीवन भी फल कि वो दूकान है और कहीं ऐसा ना हो कि दूकान से फल तो ख़त्म हो जाए और तिजोरी खाली रह जाए I अब हमें ही ये तय करना है कि हम ऐसा क्या करें कि जब अंत में हम जीवन का वही खाता देखें तो वो खाली ना हो I 

अपने में बहुत सी कमियों के बाद भी हम अपने से प्रेम करते हैं तो दूसरों में ज़रा सी कमी से हम उनसे कैसे घ्रणा कर सकते हैं।

स्वामी विवेकानंद

प्रेम को दुनिया की सबसे शक्तिशाली संवेदनाओं में से एक माना गया है प्रेम व्यक्त करने के तरीके कई हो सकते हैं किन्तु हर एक तरीके से दर्शाया गया प्रेम जीवन में खुशियाँ ही लाता है I दोस्तों मैं जानता हूँ कि अब आगे जो बात मैं कहने जा रहा हूँ आपमें से बहुत इससे इनकार करेंगे पर वास्तविकता ये है कि हम इस दुनिया में सबसे ज्यादा प्रेम खुद से करते हैं और हम ये चाहते हैं कि हम जैसे हैं सामने वाला व्यक्ति भी वैसा ही बर्ताव करे और ऐसा न होने पे हमारे मन में उस व्यक्ति के प्रति इर्ष्या और घृणा जैसी दुर्भावनाए पनपने लगती हैं I अब जरा सोचिये कि हमारे देश भारत कि कुल जनसँख्या १३० करोड़ से भी ज्यादा है और यदि हम इसी तरह सबसे अपेक्षा पालेंगे तो हमारे समाज और देश कि स्थिति कैसी हो जायेगी I अतः हमें चाहिए कि हम दूसरों से कम से कम अपेक्षा रखें I

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