जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।

स्वामी विवेकानंद

खुद पे विश्वास करने को ही हम दुसरे शब्दों में आत्मविश्वास भी कहते हैं और मुझे ये कहने कि जरुरत नहीं है कि बिना आत्मविश्वास का व्यक्ति दूसरों को तो छोडिये खुद के ही नजरों से गिर जाता है I भगवान् ने हमें ६ मूल इन्द्रियाँ दी जिसके सहायता से हम संसार में दिखने वाले दुर्गम से दुर्गम कार्य को भी कर सकते हैं लेकिन यदा कदा ही हम इनका प्रयोग गलत कार्यों में करने लग जाते हैं और ऐसा निरंतर करते रहने से हमारी इन्द्रियों से हमारा नियंत्रण खो जाता है और हम दुःख के सागर में डूबने लगते हैं और उस समय हम भगवान् को मदद के लिए बुलाते हैं, पर हम अगर अपने खोये हुए नियंत्रण को वापिस पाने का प्रयास करें तो धीरे-धीरे ही सही हमारा खोया हुआ आत्मविश्वास भी वापिस आ जाएगा और यकीन मानिए उस समय हमें किसी और कि आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी I

जो अग्नि हमें गर्मी देती है, हमें नष्ट भी कर सकती है, यह अग्नि का दोष नहीं हैं।

स्वामी विवेकानंद

इस सुविचार को पढ़ते हुए मुझे एक पंक्ति याद आ गयी जो कुछ इस प्रकार से है ,” हम अपनी आदतों को तो बदल सकते हैं पर अपनी प्रकृति को नहीं “I अतः हमें जीवन में सत्य-असत्य, अच्छा-बुरा, धर्म-अधर्म आदि नीतिगत बातों को स्वयं से ही समझ के आगे बढ़ने कि जरुरत है I कभी-कभी दुसरो को खुश करने के चक्कर में हम इन बातों को भूल आते हैं और यहीं से हमारे पतन का भी प्रारम्भ हो जाता है I  इसी प्रकार अगर हम किसी अधार्मिक व्यक्ति के परामर्श से कार्य करते हैं और हमें जीवन में कष्ट मिलते हैं तो ये उस व्यक्ति का नहीं अपितु हमारा ही दोष कहलायेगा I

चिंतन करो, चिंता नहीं, नए विचारों को जन्म दो।

स्वामी विवेकानंद

मनुष्य की असली पहचान उसके बुरे वक़्त में किया जा सकता क्यूंकि बुरे वक़्त में इंसान दो तरीके से कार्य करते हैं एक वो जो चिंतन करते हैं और चिंतन कि अवस्था सदैव शांत चित्त से ही प्राप्त की जा सकती है और एक वो जो विपरीत परिस्थिति आते ही चिंता करने लग जाते हैं और चिंता कि स्थिति में चित्त हमेशा अशांत ही रहता है और ये बात तो सर्वविदित है कि अशांत चित्त से कभी भी नए और सृजनात्मक विचारों का जन्म नहीं हो सकता है I अतः हमें सदैव परिस्थिति चाहे हमारे अनुकूल हो या प्रतिकूल मन की स्थिति को शांत रखने का ही प्रयास करना चाहिए I

जैसा तुम सोचते हो, वैसे ही बन जाओगे। खुद को निर्बल मानोगे तो निर्बल और सबल मानोगे तो सबल ही बन जाओगे।

स्वामी विवेकानंद

अभी हमने ऊपर आये एक सुविचार में आत्मविश्वास के बारे में बात की इसे हम आत्मबल से भी जोड़ के देख सकते हैं I दोस्तों आप सबने रामायण की वो कहानी तो सुनी ही होगी जिसमे श्री रामचंद्र महावीर श्री हनुमान जी के आत्मबल को जगाते हुए उनके सोये हुए पराक्रम को भी जगाते हैं और हनुमान जी एक ही छलांग में विशाल सागर को पार करके लंका माता सीता के पास पहुच जाते हैं I हम सबके अन्दर भी वही हनुमान हैं जो कि सोये हुए हैं हमें बस एक बार उन्हें जगाना है और फिर हम देखेंगे कि हमारे अन्दर वो क्षमता है कि हम दुनिया का कोई भी कार्य कर सकने में सक्षम हैं I ऐसी बहुत सी कहानियाँ हम आये दिन सुनते रहते हैं कि कैसे एक दिव्यांग ने पुरे सागर को तैर के पार कर लिया, तो क्यूँ ना हम सब भी अपने आत्मबल को जगाये और नित नयी उपलब्धियों को अर्जित करें I 

कुछ मत पूछो, बदले में कुछ मत मांगो। जो देना है वो दो, वो तुम तक वापस आएगा, पर उसके बारे में अभी मत सोचो।

स्वामी विवेकानंद

महापुरुषों कि बातें समझना बहुत ही कठिन कार्य है, अब इसी सुविचार को ले लें तो हम पायेंगे कि विवेकानंद जी हमें बिना कुछ पूछे या बिना कुछ मांगे कार्य करने को कह रहे हैं, और उनके इस सुविचार को सुनके हम कहेंगे कि भला इसमें कैसा आनंद लेकिन अगर हम श्रीमद भगवत गीता में श्री कृष्ण द्वारा बोले गए श्लोक को याद करेंगे तो हम पायेंगे कि उन्होंने भी कुछ ऐसा ही कहा था  कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ 

और हम सब भली भाँती जानते हैं कि उनके आज्ञा का पालन करके ही अर्जुन और उनके भाइयों ने महाभारत का धर्मयुद्ध जीता था I तो हमें भी कभी-कभी अपनी भलाई और धर्म कि भलाई हेतु महापुरुषों कि बात सुन लेनी चाहिए I

जो कुछ भी तुमको कमजोर बनाता है – शारीरिक, बौद्धिक या मानसिक उसे जहर की तरह त्याग दो।

स्वामी विवेकानंद

जो व्यक्ति अपने अन्दर के खामियों और दुर्गुणों कि पहचान कर उनको त्यागने कि क्षमता रखता हो उससे साहसी व्यक्ति शायद इस धरा पे दूसरा कोई नहीं I किसी ने सही ही कहा है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है, यहाँ का अभिप्राय हमारे मानसिक क्षमता से ही है I

किसी की निंदा ना करें। अगर आप मदद के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं, तो ज़रुर बढाएं। अगर नहीं बढ़ा सकते, तो अपने हाथ जोड़िये, अपने भाइयों को आशीर्वाद दीजिये, और उन्हें उनके मार्ग पे जाने दीजिये।

स्वामी विवेकानंद

अक्सर ये कहते हुए सुना जा सकता है कि सबको साँसे गिन के मिली होती हैं और हमें अपने प्रत्येक सांस का उपयोग सोच समझ के सकारात्मक कार्यों में करना चाहिए I किन्तु अक्सर हम इस बहुमूल्य तोहफे का प्रयोग नकारात्मक कार्यों में करते हैं जैसे कि किसी की निंदा करने में जो कि हमारे लिए कहीं से भी हितकर नहीं होता है इसके विपरीत अगर हम इसका उपयोग किसी के सकारात्मक प्रयास की सराहना करने में खर्च करेंगे तो इससे उस व्यक्ति का आत्मविश्वास बढेगा और वो अपने सकारात्मक कार्यों को और भी उर्जावान हो के करेगा और इस प्रकार उसको आगे बढ़ता देखकर हमें भी मानसिक ख़ुशी और संतुष्टि प्राप्त होगी, अतः हम कह सकते हैं कि इस कार्य में दोनों व्यक्ति का फायदा है I

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