दशावतारम् – तृतीय अवतार

0
790
Dashavataaram

वराह अवतार 

ब्रह्मा जी ने ज्ञानी मुनियों की सृष्टि की, उन मुनियों को ब्रह्मा जी का मानसपुत्र भी कहा जाता है, वे भगवान् के अलावा और कुछ भी नहीं जानते थे, लज्जा, घृणा, भय, और किसी भी प्रकार का स्वार्थ उनमे नहीं था एवं वे लोग किसी शिशु के सामान सर्व बन्धनों से मुक्त होकर रहा करते थे l एक दिन ऐसे ही मुक्त विचरण करते हुए वे लोग विष्णु जी के धाम वैकुण्ठ पहुच गए और जब उन्होंने वैकुण्ठ की शोभा देखी तो उनका मन प्रफुल्लित हो उठा और उनके शिशु मन के अन्दर वैकुण्ठ के अन्दर की शोभा और श्री हरि के दर्शन की इच्छा जाग उठी l वे अन्दर प्रवेश करने ही वाले थे कि तभी वैकुण्ठ के द्वारपाल जय तथा विजय ने उनका रास्ता रोक दिया और फिर भी जब मुनियों ने अन्दर जाने का प्रयास किया तब जय और विजय ने उन मुनियों पर बेंत से प्रहार किया l प्रहार से रुष्ठ मुनियों ने दोनों द्वारपालों को अभिशाप दिया कि, “तुम लोग वैकुण्ठ में रहने के लायक नहीं हो, तुम लोगों का पतन हो” l मुनियों का अभिशाप सुनते ही जय और विजय घबरा गए और भयभीत होकर मुनियों के चरणों में गिरके माफ़ी मांगने लगे l इतना शोरगुल सुनके श्री हरि को रहा नहीं गया और वो भी स्थिति का जायजा लेने द्वार पे आ गए, मुनियों ने जब भगवान् विष्णु को देखा तो वे भाव विह्वल हो गए और कोई उनके पैरों में पड़ गया तो कोई उनका हाथ पकड़ लिया दृश्य कुछ ऐसा था मानो जैसे बच्चों को उसकी माँ मिल गयी हो l जब जय और विजय ने ये सब देखा तो उनका दिल और भी जोरों से धडकने लगा और उन्हें लगा कि जब विष्णु जी इनसे इतना स्नेह करते हैं तो अवश्य ही उन्हें दण्ड देंगे और कहीं उन्हें वैकुण्ठ से निष्कासित ना कर दिया जाए इस कल्पना मात्र से ही उनका ह्रदय काँप उठा l

मुनियों के शांत होने पर श्रीहरि उन्हें भीतर ले गए और बोले, “मेरे द्वारपालों ने तुम्हारे साथ बड़ा ही अनुचित व्यवहार किया है l अपने पुण्यों के फल से वैकुण्ठ में आकर इन लोगों को बड़ा गर्व हो गया था और उसकी उपयुक्त सजा भी उन्हें मिल गयी है l”

मुनिगण अपने क्रोध की बात भूल चुके थे, परन्तु जय तथा विजय के दुःख से वे बड़े दुखी हुए l श्री भगवान् को छोड़कर पाप-ताप-मोहमय जगत् में लौट जाना – इससे बढ़कर दुःख की बात और क्या हो सकती है ? परन्तु ऋषियों की वाणी को विफल करने का कोई उपाय नहीं l उन्हें वैकुण्ठ छोड़कर जाना ही पड़ेगा l मुनियों ने श्रीहरि से कहा, “प्रभो, ऐसी व्यवस्था कीजिये कि जिससे ये लोग शीघ्र ही आपके पास लौट आयें l “श्रीहरि ने कहा, “इन लोगों ने साधनाएँ तो बहुत की हैं, परन्तु अहंकार नहीं छोड़ सके हैं, और सात जन्म तपस्या किए बिना इनका यह अहंकार जानेवाला नहीं है l “सात जन्मों की बात सुनकर जय-विजय आकुल होकर रोने लगे, उनका दुःख देखकर मुनियों को भी रुलाई आ गयी l वे लोग कहने लगे, “प्रभो, एक बार जिसे आपके चरणों का आश्रय मिल चुका है, उसके लिए आपका विरह कितना कष्टदायी होगा, क्या आप नहीं समझ सकते ? एक दिन, दो दिन नहीं, सात जन्मों तक आपको छोड़कर रह पाना भक्त के लिए असम्भव है l मुनियों की बात सुनकर श्रीहरि ने जय तथा विजय से कहा “तुम लोग शत्रुभाव लेकर मनुष्य-लोक में जाओ l शत्रुभाव बड़ा प्रबल होता है, लोग शत्रु के बारे में कितना सोचते हैं, उतना मित्र के बारे में नहीं सोचते l इस भाव से तीन जन्मों में तुम लोगों का अभिमान दूर हो जाएगा l प्रति बार मैं अपने हाथों से तुम्हारा अभिमान दूर करूँगा l”

जय-विजय ने सत्ययुग में हिरण्याक्ष तथा हिरान्य्कशिपु, त्रेता में रावण तथा कुम्भकर्ण और द्वापर में शिशुपाल तथा दन्तवक्र के रूप में जन्म ग्रहण किया l श्रीहरि ने स्वयं ही लीलामय रूप धारण करके उनका वध किया l

महर्षि कश्यप की दिति तथा अदिति नाम की दो पत्नियाँ थीं l अदिति के गर्भ से आदित्य अर्थात देवताओं ने और दिति के गर्भ से दैत्यों ने जन्म ग्रहण किया l दिति का स्वभाव ठीक नहीं था, उसकी दो जुड़वा संतानें हुई, जिनका हिरानाय्क्ष तथा हिरान्य्कहिपु नाम रखा गया l ये दोनों बच्चे बचपन से ही बड़े शैतान थे, उनके भय से मोहल्ले के लड़के घर से बाहर तक नहीं निकलते थे l वे दोनों बड़े क्रोधी तथा झगडालू थे, उनका शरीर लोहे के सामान कठोर था l उनमें हाथी-सा बल था और नाराज हो जाने पर खून-खराबा कर बैठना उनके लिए आम बात थी l ज्यों ज्यों उनकी उम्र बढती गयी, त्यों त्यों वे और भी भयंकर होते गए l दया-धर्म की तो बात ही नहीं, मार-काट ही उनका नित्यकर्म हो गया l केवल अपने गाँव के लोगों को परेशान करके उन्हें तृप्ति नहीं हुई, अतः वे देश के लोगों पर अत्याचार करते हुए घुमने लगे l राज्य के सभी गुण्डे-बदमाश उनके साथ आ मिले, धीरे-धीरे उनका एक अच्छा-ख़ासा दल तैयार हो गया और वे लोग सबके ऊपर यथेक्षा शासन चलाने लगे l अन्य राजाओं के राज्य छीनकर उन लोगों ने एक विराट साम्राज्य की स्थापना की l

युद्ध में क्षत-विक्षत हो जाने से युद्ध का मजा किरकिरा हो जाता है, इसलिए हिरण्याक्ष अपने शरीर को अमर करने के लिए तपस्या में डूब गया l असुरगण सृष्टिकर्ता ब्रह्मा तथा संहारकर्ता शिव की भक्ति तो करते थे, परन्तु प्रेममय श्रीहरि के प्रति उनके मन में प्रीति ना थी l उसने ब्रह्मा की अराधना करके उन्हें संतुष्ट किया, ब्रह्मा के वर देने की इच्छा व्यक्त करने पर उसने अपना शरीर अमर कर देने का अनुरोध किया l परन्तु ब्रह्मा बोले, “शरीर भला कैसे अमर हो सकता है ? यह तो पंचभूतों की समष्टि है l मैं तुम्हे यही वर दे देता हूँ कि किसी अस्त्र से तुम्हारे शरीर को चोट नहीं पहुचेगा l “हिरण्याक्ष ने सोचा कि शरीर पर अस्त्र का चोट न पहुचने पर, युद्ध में पराजित होने का भय ही नहीं है; वह इसी के लिए तो अमर होना चाहता था l अतः यही वर पाकर उसकी ख़ुशी का ठीकाना न रहा l

हिरान्य्कशिपू अपने साम्राज्य के शासन में ही व्यस्त रहा और हिरण्याक्ष भयानक गुंडागर्दी करते हुए घुमने लगा l उसे जहाँ कहीं भी किसी बलवान आदमी के होने की सूचना मिलती वह वहीँ जा पहुचता l उसका सामना करने की भला किसमें क्षमता थी ! उसके साथ युद्ध करनेवाले की मृत्यु निश्चित थी l किसी भी अस्त्र का चोट उसके शरीर पर नहीं लगता था, अतः अन्य लोग उसका कोई अनिष्ट नहीं कर पाते थे l इसी प्रकार मानावलोक पर विजय प्राप्त करने के बाद वह लोहे की एक भयानक गदा लिए हुए देवलोक जा पहुँचा l उसने सोचा था कि मनुष्य तो सहज ही मर जाते हैं, परन्तु देवता अमर हैं, अतः यहाँ पर उन लोगों के साथ युद्ध का थोडा सा आनंद ले सकूँगा l परन्तु बुद्धिमान देवताओं ने पहले से ही उसके सामने हथियार डालकर गदा के आघात से स्वयं को बचाया l

अब युद्ध के अभाव में हिरण्याक्ष की नसें ऐसी फड़कने लगीं कि युद्ध किये बिना उसका जीना दूभर हो गया l किसी ने उसे सुझाया, “तुम हिमालय के साथ युद्ध करो l” इसलिए वह हिमालय के शरीर पर अपनी गदा से आघात करके थोड़ा विश्राम करने लगा, गदा के आघात से पर्वत टूटकर चूर्ण-विचूर्ण होने लगे l तब हिमालय में निवास करने वाले देवता ने बाहर आकर उससे कहा, “ओ दैत्य, काष्ठ-मिटटी के साथ युद्ध करना भी क्या किसी वीर को शोभा देता है ? तुम समुद्र में वरुण देवता के पास जाओ, वहाँ तुम्हारी युद्ध की पिपासा मिट जायेगी l”

हिरण्याक्ष तब हिमालय छोड़कर सागर के पास गया l हिरण्याक्ष के गदाघात से सागर का जल विक्षुब्ध हो उठा, मछलियाँ भयभीत होकर पलायन करने लगीं l सागर के राज्य में महा-हलचल मच गयी, समुद्र के देवता वरुण सागरतल से बाहर आकर बोले, “अरे मुर्ख, तू क्यों व्यर्थ ही इन छोटी-मोटी मछलियों को भय दिखा रहा है ? यदि सचमुच ही तेरी युद्ध करने की साध है, तो तू पाताल में जा, वहां वराहरूपी श्रीहरि के पास तेरा गर्व दूर हो जाएगा l”

श्रीहरि का नाम हिरण्याक्ष ने पहले भी सुन रखा था l जब भी वह किसी दुर्बल पर अत्याचार करता, तभी उसे कहते सुन जाता, “ठीक है जा, श्रीहरि तो हैं ही! “वह नाम सुनते ही उसके प्राण ईर्ष्या से जल उठते और वह सोचता कि बस एक बार उसे पा जाऊँ, तो देख लूँगा l परन्तु अब तक उसे श्रीहरि का पता नहीं मिल पाया था, आज वरुण के मुख से वह पाकर उसका उत्साह प्रज्ज्वलित हो उठा l उसे लगने लगा मानो श्री हरि को उसने अभी पीस डाला है l वह उन्मादी के सामान तत्काल पाताल की ओर दौड़ चला l

पृथ्वी का उत्तर मेरु थोडा झुककर सूर्य के चारों ओर घूमता है l इसीलिए दक्षिण का समुद्र महासागर है और उत्तर का प्रदेश महादेश है l एक बार किसी कारणवश पृथ्वी का उत्तरी मेरु थोडा अधिक झुक गया, इसके फलस्वरूप सागर की जलराशि ने स्थल भाग को डुबा दिया, सभी जीव-जंतुओं की मृत्यु हो गयी; केवल उच्च पर्वत शिखरों पर दो-चार मनुष्य बड़े कष्टपूर्वक बचे रहे l

सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने अपने प्रधान इंजिनियर विश्वकर्मा की सहायता से पृथ्वी का उद्धार करने का बड़ा प्रयास किया, पर कोई फल नहीं हुआ l तब ब्रह्माजी ने श्रीहरि का शरण लिया, श्रीहरि ने एक विराट शूकर का रूप लेकर पृथ्वी को अपने दांतों में फँसाकर धीरे धीरे खींचा और उसे पूर्ववत स्थापित कर दिया, तब सारा जल दक्षिणी महासागर में चला गया और उत्तर के ग्राम-नगर बाहर आ गए l श्वेत वराह जलमग्न पृथ्वी का उद्धार करने के बाद पाताल में जाकर वहीँ विचरण करने लगे l

हिरण्याक्ष हरि को ढूँढते हुए पाताललोक जा पहुँचा l वहां विशाल दंत्वाले दीर्घकाय श्वेतवर्ण शूकर तथा उसके विशाल उज्जवल नेत्र देखकर प्रथमतः तो वह अवाक् रह गया और तत्पश्चात युद्ध करने का एक अच्छा मौका हाथ आया देखकर उच्च स्वर में बोल उठा, “वाह ! शूकर तो जल में चर रहा है l” उसकी आवाज सुनते ही वराह इतनी तीव्र गर्जना कर उठे कि ग्रह-नक्षत्रों के साथ पूरा ब्रह्माण्ड कम्पित हो उठा l उनके दोनों नेत्रों से मानो आग की चिंगारियां निकलने लगीं, उन्हें देखकर ऐसा लगता था मानो जगत् का सारा क्रोध मूर्तिमान हो उठा हो l हिरण्याक्ष को समझते देर ना लगी कि उसकी इतने दिनों की युद्ध-पिपासा के दूर होने का सुअवसर आ पहुँचा है l

हिरण्याक्ष ने उछल कर अपनी बृहत् लौह-गदा शूकर के सिर पर चला दी l शूकर के थोडा पीछे हट जाने से उसकी गदा वराह के दांत से लगकर चूर चूर हो गयी l अब दोनों के बीच धक्कामुक्की आरम्भ हुई, दोनों के पदाघात से पृथ्वी दोलयमान हो उठी l नोंच-काटकर दोनों एक-दुसरे का रक्तपात करने लगे, उनके रक्त से भूतल पर कीचड़-ही-कीचड़ हो गया, इस कीचड़ से जहां शूकर को सुविधा हुई, वहीँ हिरण्याक्ष को घोर असुविधा होने लगी l

हिरण्याक्ष को इस जन्म में अब तक बराबरी का योद्धा नहीं मिला था, परन्तु आज शूकर के समक्ष उसके जीतने की आशा कम थी l उसके शरीर का रक्त क्रोध से गरम होकर मानो उबलने लगा l दोनों के बीच युद्ध काफी देर तक चलता रहा दोनों के शरीर से रक्त की धरा बह रही थी, लगता था कि दोनों के पदाघात से पृथ्वी अपने कक्ष से हट जायेगी l अंतरिक्ष में खड़े भयभीत देवतागण काँपने लगे, इधर संध्या भी हो चली थी l ब्रह्माजी ने चिल्लाकर कहा, “प्रभो, संध्या हो गयी है; संध्या के समय असुरों की शक्ति बढ़ जाती है, इसका अभी संहार कर डालिए l “तब वराह ने अपने वज्र्सम तीक्ष्ण दन्त से दैत्य का ह्रदय विदीर्ण कर डाला l रक्त की मानो नदी बह चली, काफी देर तक हाथ-पाँव पटकने के बाद हिरण्याक्ष ठण्डा हो गया l स्वर्ग के देवता आदि वराह की जयध्वनि के साथ पुष्पवृष्टि करने लगे l

पृथ्वी का उद्धार हुआ, बिना अस्त्र के ही हिरण्याक्ष का वध हुआ l देवतागण अपने अपने स्थान पर चले गए, परन्तु श्रीहरि ने अपना शूकर रूप नहीं छोड़ा, वे कीचड़ में जाकर आनंद करने लगे, एक सुकरी भी आकर उनके साथ रहने लगी l क्रमशः उनके बहुत से बच्चे हुए और उनका एक बहुत बड़ा परिवार बन गया l वे अपने दल-बल के साथ लोकालोक पर्वत पर जाकर निवास करने लगे l

इधर वैकुण्ठ में श्रीहरि की अनुपस्थिति से समस्त कार्यों में बड़ी परेशानियां आने लगीं l ब्रह्माजी उन्हें ढूँढते हुए लोकालोक पर्वत पर पहुँचे और वहाँ का माजरा देखकर अवाक् रह गए l बड़े कष्टपूर्वक अपनी हँसी रोककर वे श्रीहरि की स्तुति करने लगे, परन्तु उन रक्तवर्ण चतुर्भुज हंसवाहन को देखकर श्रीहरि भयपुर्वक अपने बाल-बच्चों के साथ भागने लगे l ब्रह्माजी हँसते हुए शिव जी के पास गए l शिवजी ने सब कुछ सुनकर कहा, “यह आपके समान साधू व्यक्ति का कर्म नहीं है l चलिए, मैं आपको दिखाता हूँ l”

शिवजी ने हाथी के सामान सूड तथा दंत्धारी आठ पांववाले एक विशेष जंतु का रूप बनाया और लोकालोक पर्वत पर जाकर गर्जन करने लगे l इससे भड़ककर वराह ने उन पर आक्रमण कर दिया, दोनों में खूब युद्ध हुआ l तब अष्टपदी (शिव) ने वराह के शरीर में अपने दांत घुसाकर उसे चीरकर दो टुकड़े कर डाला l इसके बाद श्रीहरि उस मृतदेह को त्यागकर शिवजी के साथ खिलखिला कर हँसते हुए स्वर्ग चले गए l

अब भी पितृपुरुषों के श्राद्ध के अवसर पर घर घर में उन्ही आदि-वराह के रूप में श्रीहरि की पूजा हुआ करती है l                

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here