उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक अपने लक्ष्य को न पा लो

स्वामी विवेकानंद

प्रत्येक मनुष्य का जीवन चक्र शैशावास्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, प्रौढ़ावस्था, एवं वृद्धावस्था के चरणों से होता हुआ मृत्यु के आलिंगन से अपने अंत को प्राप्त करता है, इस प्रकार से अगर देखा जाए तो प्रत्येक मनुष्य का जीवन एक सामान सा प्रतीत होता हैI तो ये प्रश्न उठना लाजिमी है कि वो क्या चीज है जो हमे एक दुसरे से अलग करती है, मेरे प्यारे दोस्तों इस प्रश्न का उत्तर है हमारे द्वारा हमारे लिए हमारे ही जीवनकाल में तय किये गए हमारे लक्ष्य. जब हम बाल्यास्था में होते हैं तो हमारे लक्ष्य चाहे जो भी हों उन्हें प्राप्त करने हेतु हम एडी-चोटी का जोर लगा देते हैं हम कर्मवान रहते हैं लेकिन जैसे-जैसे हमारी उम्र बढती है हमारा कर्मफल से विश्वास उठने लगता है और हम अपने भाग्य को कोसना शुरू करते हैं और लोगो कि बातों में आकर अक्सर अपने लक्ष्य को असंभव मानके उसे छोड़ देते हैंI और यही हमारे दुखों का कारण बनता है I

उपरोक्त सुविचार में स्वामी विवेकानंद जी यही कहना चाहते हैं कि लक्ष्य को पहचानना और उसको प्राप्त करने के अलावा हमारे लिए कोई और प्राथमिकता श्रेष्ठ नहीं होनी चाहिएI   

खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप हैं।

स्वामी विवेकानंद

पाप क्या है ? अगर हम कहें कि अपनी असली क्षमताओं को ना समझना एवं खुद को सदैव कम आंकना ही पाप है तो शायद हमारा ये कहना गलत नहीं है क्यूंकि जिस क्षण हम खुद को कमजोर समझना शुरू करते हैं तो ठीक उसी क्षण से हम अपने कार्यों को सिद्ध करने के लिए अनर्गल मार्गों को अपनाते हैं या कोई और हमारे इस कमजोरी का फायदा उठाके हमसे अनर्गल या कहें तो अधार्मिक और अनैतिक कार्यों को संपन्न करवाता है. और हम जब भी कोई अनैतिक कार्य करते हैं तो वो केवल हमारे लिए ही नहीं बल्कि संपूर्ण समाज के लिए भी हानिकारक सिद्ध होता है.

इसीलिए स्वामी विवेकानंद जी का ये कहना कि “खुद को कमजोर समझाना पाप है” शत प्रतिशत सत्य है”  

तुम्हें कोई पढ़ा नहीं सकता, कोई आध्यात्मिक नहीं बना सकता। तुमको सब कुछ खुद अंदर से सीखना हैं। आत्मा से अच्छा कोई शिक्षक नही हैं।

स्वामी विवेकानंद

सत्य ही है कि हमारे आत्मा से अच्छा कोई दूसरा शिक्षक नहीं है. चलिए अब इस बात को समझने कि कोशिश करते हैं, हमारे अन्दर पांच मूल भाव जिन्हें क्रमशः हर्ष, विषाद, इर्ष्या, क्रोध एवं डर कहते है और इन मूल भावों को महसूस करने के लिए हमें किसी बाह्य कारक कि भी आवश्यक्ता नहीं पड़ती ये भाव हमारे कर्मों के वजह से हमारे अन्दर स्वयं ही प्रकट होते हैं हम इन्हें आत्मभाव भी कह सकते हैं क्यूंकि ये भाव हमारे आत्मा द्वारा ही उत्पन्न होते हैं. जब भी हम कोई अच्छा कार्य करने जाते हम सदैव उत्साहित एवं प्रसन्न रहते हैं और हम जब भी कोई गलत कार्य करने जाते हैं हमारी आत्मा से एक आवाज आती है जो हमें आगे न बढ़ने के लिए प्रेरित करती है और अगर हम अपनी आत्मा कि बात सुनते हैं तो हम उस गलत कार्यों द्वारा उत्पन्न होने वाले नकारात्मक प्रभावों से बच जाते हैं. दोस्तों हमारे आत्मा कि आवाज सदैव आती रहती है लेकिन कभी-कभी हम इसे जान बुझके अनसुना करने लगते हैं और  कुछ समयांतराल के बाद ये आवाज हमें सुनाई देनी बंद हो जाती है.

अगर हम अपने आत्मा कि उसी आवाज को अपना मार्गदर्शक समझ के अपने कार्यों को अंजाम दें तो अवश्य ही हम स्वयं को अध्यात्म और ज्ञान के काफी करीब पायेंगे. 

सत्य को हज़ार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी सत्य एक ही होगा।

स्वामी विवेकानंद

सत्य क्या है? हमें सूर्य से प्रकाश मिलता है ये सत्य है लेकिन अगर संस्कृत के शब्द सूर्य के जगह हम अंग्रेजी के शब्द Sun का प्रयोग करेंगे तो क्या ये तथ्य कि हमें प्रकाश सूर्य से मिलता है असत्य हो जाएगा? कदापि नहीं. और ये बात केवल सूर्य तक ही सीमित नहीं रहता है, हम इंसान इस धरती पे हजारों भाषाओं का प्रयोग करते हैं लेकिन इससे सत्य के अस्तित्व पे कोई प्रभाव नहीं पड़ता है I

सत्य ही कहा है स्वामी जी ने “सत्य को हज़ार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा”।

बाहरी स्वभाव केवल अंदरूनी स्वभाव का बड़ा रूप हैं।

स्वामी विवेकानंद

जैसा कि हमने ऊपर दिए सुविचार में आत्मा की बात की है ठीक उसी प्रकार स्वामी जी ने अपने इस सुविचार में भी आत्मा के बारे में बात की है स्वामी विवेकानंद जी ये कहना चाहते हैं कि जो भी हमारा व्यक्तित्व दुसरे को दिखाई देता है वो हमारे अंदरूनी व्यक्तित्व यानी आत्म्व्यक्तित्व का  एक व्यापक स्वरुप है.

ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं। वो हम ही हैं जो अपनी आँखों पर हाँथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अंधकार हैं।

स्वामी विवेकानंद

हमारा मस्तिष्क ही हम इंसानों को अन्य जीव-जंतुओं से अलग करता है, यह ही हमारी असली ताकत है .इसी मस्तिष्क के बल पे हम आज इस पृथ्वी पे राज कर रहे हैं और समय-समय पे विज्ञान भी इस बात को कहता आया है कि हम अपने मस्तिष्क का केवल २-५% भाग ही इस्तेमाल में लाते हैं जरा सोचिये अगर हम अपनी क्षमता का केवल २% ही प्रयोग में लाके इतने अद्भुत आविष्कार कर सकते हैं तो भला जब हम अपने १००% क्षमता का प्रयोग करेंगे तो क्या-क्या कर लेंगे. हमें सदैव ये याद रखना चाहिए कि इस पूरे पृथ्वी पे जो कुछ भी दृष्टिगोचर है वो या तो प्रकृति ने बनाया है या फिर हम इंसानों ने . किसी ने सत्य ही कहा है कि सपने पूरे होते हैं और इस बात का प्रमाण ये है कि जिन ग्रहों को हम कभी केवल अपनी आँखों से देख सकते थे उन्ही ग्रहों पे आज हम इंसानी बस्तियां बसाने जा रहे हैं.  

विश्व एक विशाल व्यायामशाला है जहाँ हम खुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं।

स्वामी विवेकानंद

किसी दिन, जब आपके सामने कोई समस्या ना आये – आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं।

स्वामी विवेकानंद

बड़ा ही विरोधाभाषी कथन लग रहा है ना ? जब इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन का प्रत्येक दिन यही कहके शुरू करता हो कि काश आज कोई समस्या न आये ऐसे में ये कहना बड़ा ही अजीब सा लगता है लेकिन जब हम लोग स्वामी विवेकानंद जी कि इस वक्तव्य को ध्यान से समझेंगे तो ही हम सही अर्थ को समझ पायेंगे Iदोस्तों किसी भी कार्य को करने के दो तरीके होते हैं I एक होता है Shortcut और एक होता है Natural Way और अक्सर हम समय को बचाने के लिए Short Cut को चुनते हैं लेकिन कभी-कभी हम इस Short-Cut के चक्कर में इतना खो जाते हैं कि हम कुछ गलत मार्गों पे चलना शुरू कर देते हैं और हमारा समय तो बाख जाता है परन्तु कब हम सत्य और धर्म के मार्ग से हटके असत्य और अधर्म के मार्ग्ग पे चलने लगते हैं हम खुद ही नहीं जान पाते I

एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमे डाल दो और बाकी सब कुछ भूल जाओ।

स्वामी विवेकानंद

दोस्तों विद्वान् लोगों के बोलने का तेरीका भले ही अलग हो सकता है लेकिन उनके बातों का मर्म सदैव एक जैसा होता है, स्वामी विवेकानंद जी के इस सुविचार को पढ़ते हुए मुझे एक और महान व्यक्ति का सुविचार ध्यान में आया उन महान व्यक्ति का नाम अब्राहम लिंकन है जी हाँ सही सुना आपने अमेरिका के पूर्व रास्ट्रपति जिन्होंनेअमेरिका में दासप्रथा का अंत करवाने में बहुत ही अहम् भूमिका निभायी थी .एक बार अब्राहम लिंकन से किसी ने उनके कार्यशैली पे प्रश्न पुचा कि आप काम कैसे करते हैं तो उनका जवाब कुछ इस प्रकार था, “अगर आप मुझे ६ घंटे देते हैं किसी पेड़ को काटने में तो मैं शुरुआत के ५ घंटे अपने कुल्हाड़ी के धार को तेज करने में लगाऊंगा और उसे इतना तेज कर दूंगा कि एक ही प्रहार में वो पेड़ कट जाए” दोस्तों यहाँ ५ घंटे धार को तेज करने से अभिप्राय ये है कि जब तक आप अपने द्वारा किये जाने वाले कार्य को आत्मसात नहीं करेंगे न तो आपको उस कार्य को करने में आनंद आएगा और हो सकता है उस कार्य का परिणाम भी सटीक न आये.

अतः हमें सदैव एक समय में एक ही कार्य करना चाहिए और उस कार्य को पूर्ण इमानदारी और लगन से संपन्न करने के बाद ही किसी दुसरे कार्य में लग्न चाहिए. 

संभव की सीमा जानने का केवल एक ही तरीका है

असंभव से भी आगे निकल जाना

स्वामी विवेकानंद

जब तक हम किसी कार्य को करेंगे नहीं भला हम ये कैसे तय कर पायेंगे कि क्या संभव है और क्या असंभव, दोस्तों अक्सर हम किसी कार्य को देखते ही या उसके बारे में सुनते ही अपने हाथ खड़े कर देते हैं और बड़े ही सहजता से ये कह देते हैं कि ये तो मेरे बस कि बात नहीं है यानी कि ये तो असंभव है लेकिन अगर हमने अपने अन्दर के आत्मा कि शक्ति को पहचान लिया तो सत्य ही कहा है स्वामी विवेकानंद जी ने की उसी क्षण हम असंभव लगने वाले उस पड़ाव से भी आगे निकल जायेंगे. और हमें  ये  सुनिश्चित करने के लिए सदैव एक ऐसे लक्ष्य का ही चुनाव करना चाहिए जोकि हमें असंभव लगे.

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