श्री राम स्तुति, हिन्दुओं के अराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चन्द्र जी के अद्भुत तेज का महिमा मंडन करती हुई गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित आरती है | तुलसीदास जी सोलहवी शताब्दी के कवि थे जिनकी अधिकतम रचनाये श्रीराम चन्द्र जी को ही समर्पित हैं l

श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणम l नव कंजलोचन कंज मुख, कर कंज, पद कंजारुणम ll

अर्थात – तुलसीदास जी अपने मन से कहते हैं कि हे मन, कृपा करने वाले श्रीराम का भजन करो जो कष्टदायक जन्म-मरण के भय का नाश करने वाले हैं l जो नवीन कमल के समान आँखों वाले हैं, जिनका मुख कमल के समान है, जिनके हाथ कमल के समान हैं, जिनके चरण रक्तिम (लाल) आभा वाले कमल के समान हैं ll

कंदर्प अगणित अमित छवि नवनील नीरद सुन्दरम् l पटपीत मानहु तड़ित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम ll

अर्थात – तुलसीदास जी श्री रामचंद्र जी की तेज के बारे कहते हैं कि जो अनगिनत कामदेवों के समान तेजस्वी छवि वाले हैं, जो नवीन नील मेघ के समान सुन्दर हैं l जिनका पीताम्बर सुन्दर विद्युत् के समान है, जो पवित्रता की साकार मूर्ति श्री सीता जी के पति हैं ll

भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्यवंश निकन्दनम l रघुनन्द आनंदकन्द कौशलचन्द दशरथ नन्दनम ll

अर्थात – तुलसीदास जी पुनः अपने मन से वार्तालाप करते हुए उसे सलाह देते हुए कहते हैं कि हे मन, दीनों के बन्धु, सूर्यवंशी, दानवों और दैत्यों के वंश का नाश करने वाले l रघु के वंशज, सघन आनंद रूप, अयोध्याधिपति श्रीदशरथ के पुत्र श्रीराम को भजो ll

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणम l आजानुभुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणम ll

अर्थात – तुलसीदास जी अपने अराध्य श्री रामचंद्र का बखान कहते हुए लिखते हैं जिनके मस्तक पर मुकुट, कानों में कुंडल और माथे पर तिलक है, जिनके अंग प्रत्यंग सुन्दर, सुगठित और भूषण युक्त हैं l जो घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाले हैं, जो धनुष और बाण धारण करते हैं, जो संग्राम में खर और दूषण को जीतने वाले हैं ll

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रन्जनम l मम ह्रदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनम ll

अर्थात – श्रीतुलसीदास जी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी से विनम्र निवेदन करते हुए कहते हैं, हे शंकर, शेष और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले l काम आदि दुर्गुणों के समूह का नाश करने वाले श्रीराम जी आप मेरे हृदय कमल में निवास कीजिये ll

मनु जाहिं राचेउ मिलहि सो बरु सहज सुन्दर सांवरो l करुणा निधान सुजान शील सनेह जानत रावरो ll

अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं की पार्वती जी सीता जी को आशीर्वाद देते हुए कहती हैं कि जो तुम्हारे मन को प्रिय हो गया है, वह स्वाभाविक रूप से सुन्दर सांवला वर ही तुमको मिलेगा l वह करुणा की सीमा और सर्वज्ञ है और तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है ll

एहि भांति गौरि असीस सुनी सिय सहित हियँ हरषी अली l तुलसी भवानिहि पूजि पुनिपुनि मुदित मन मंदिर चली ll

अर्थात – इस प्रकार श्रीपार्वती जी का आशीर्वाद सुनकर श्री सीता जी सहित सभी सखियाँ प्रसन्न हृदय वाली हो गयीं l श्रीतुलसीदास जी कहते हैं – श्रीपार्वती जी की बार बार पूजा करके श्रीसीता जी प्रसन्न मन से महल की ओर चलीं ll

दोहा –

जानिगौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि |

मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ||

अर्थात – श्रीपार्वती जी को अनुकूल जान कर, श्रीसीता जी के ह्रदय की प्रसन्नता का कोई ओर-छोर  नहीं है l सुन्दर और मंगलकारी लक्षणों की सूचना देने वाले उनके बाएं अंग फड़कने लगे l

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