बहुत पुरानी बात है | किसी देश में एक शहर था | उस शहर में एक ब्राह्मण परिवार रहता था | उस ब्राह्मण की पत्नी और माँ में बिल्कुल नहीं बनती थी | सास और पतोहू हमेशा आपस में झगड़ती रहती थीं | सास को पतोहू फूटी आँख न सुहाती थी | वह हमेशा उसे सताती रहती थी | उस ब्राह्मण के घर के पास एक बैंगन बाग था | सास अक्सर बैंगन की तरकारी बनाती , लेकिन कभी अपनी पतोहू को नहीं देती थी | पतोहू को बैंगन की तरकारी बहुत पसंद थी | लेकिन करती क्या ? सास का पहरा कभी हटता ही नहीं था | 

आखिर “बिल्ली के भाग्य से चीका टुटा “ | एक दिन सास अपनी बेटी को देखने के लिए नजदीक के गाँव में गई | पतोहू ने सोचा – बस , यही मौका है | झट बाग से बैंगन तोड़ लाई | जल्दी जल्दी बनाई और दरवाजे – खिड़कियाँ सब बंद करके खुशी – खुशी खाने बैठ गई | लेकिन तकदीर खोटी थी | उसी समय सास ने आकर किवाड़ खटखटाया | अब तो पतोहू की जान निकल गई |

उसने झट भात तरकारी सब कुछ एक खली घड़े में दाल दिया और हाथ धोकर दरवाजा खोलने भागी और सास अंदर आ गई | पतोहू पानी लेने का बहाना करके घड़ा लेकर बाहर निकली | लेकिन बाहर भी कहीं उसे ऐसी जगह न मिली जहाँ वह निश्चिन्त होकर बैंगन की तरकारी खा सकती | आखिर बहुत सोच – विचार कर वह अँधेरे कोने में बैठ कर खुशी-खुशी बैंगन की तरकारी खाने लगी | काली माई को इस औरत का यह हाल देख कर बड़ा अचरज हुआ और उन्होंने दाँतो तले उँगली दबा ली | 

चाट -पोंछकर खा लेने के बाद पतोहू उठी और घड़े में पानी भर कर घर जा पहुँची | दूसरे दिन काली के मंदिर का पुजारी पूजा करने आया तो देखता क्या है कि माँ दाँतो तले उँगली दबाए है | यह देख कर उसे बड़ा अचरज हुआ और तुरंत राजा के पास जाकर सारी बात कह सुनाई | राजा ने यही बात दरबारियों से कही | सुन कर सब लोग सुन्न हो गए | एक ने कहा – ” जरूर इस राज्य पर कोई न कोई भारी संकट आने वाला है | नहीं तो काली माँ दाँतो तले उँगली क्यों दबती ?” यह बात सुन कर राजा दर गया और उँगली हटवाने के लिए बहुत से पूजा-पाठ करवाए | लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ |

तब राजा ने ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो कोई वह उँगली हटा देगा उसे बहुत बड़ा इनाम दिया जाएगा | बहुत लोगो ने वह इनाम पाने की कोशिश की |लेकिन कोई पा न सका | 

पतोहू ने कहा – “मैं वह इनाम लूँगी” | वह घड़ा लेकर निकली और सीधे मंदिर में जाकर काली – माँ से कहने लगी – “काली-माई ! तुम तो सबकी माँ कहलाती हो ! क्या तुम्हें मालूम नहीं कि कुछ बहुओं को सास से छिपा कर कभी-कभी कुछ खा लेने का मन होता है ? क्या इतनी -सी बात  के लिए तुम सब के आगे मुझे नीचा दिखाना चाहती हो ? हटा – लो यह उँगली ! नहीं तो यह घड़ा तुम्हारे सर पर पटक दूँगी | “ उसकी ऐसी बातें सुनकर काली – माई भी डर गईं और उन्होंने तुरन्त ही दाँतो तले से उँगली हटा ली | यह ख़बर बिजली की तरह सारे नगर में फ़ैल गई | सब लोग पतोहू की तारीफ करने लगे | 

ज्यों ही राजा को यह खबर मिली , उसने पतोहू को आदर के साथ बुलाया और बहुत-सा सोना – चाँदी , हीरे – जवाहरात आदि उसे भेंट किए | पतोहू यह सब लेकर फूली – फूली घर पहुँची | अब सास उसे देख कर मन ही मन जलने लगी | लेकिन बाहर से वह कुछ बोल नहीं सकती थी | क्योंकि आसपास के लोग अब पतोहू को करीब – करीब एक देवी ही समझने लगे थे | लोग आपस में कहने लगे – ‘ इसका हुक्म तो काली – माई भी नहीं टालती हैं |

तब हम इसी की पूजा क्यों न करे ?” इस तरह अब उसे देखने के लिए बहुत दूर – दूर के लोग आने और तरह – तरह की भेंट लाने लगे | यह सब देख कर सास मन में और भी जलने लगी | जब उसे कोई उपाय न सूझा तो उसने  अपने बेटे के कान भरना शुरू कर दिया – ” देख बेटा ! तेरी पत्नी जरूर कोई चुड़ैल है | नहीं तो काली – माँ भी इससे क्यों डरती | हमको अपने बचाव के लिए कोई उपाय सोचना चाहिए | नही तो यह एक-न-एक दिन जरूर हम दोनों को खा जाएगी | अच्छा हो , अगर पहले ही हम इस से अपना पिंड छुड़ा लें |”

रोज़ ऐसी बातें सुनते – सुनते बेटे का मन भी बदल गया | उसने एक दिन माँ  से पूछा – ‘ अच्छा , तुम्ही बताओ , इस चुड़ैल से बचने का क्या उपाय है ? ‘

माँ ने एक उपाय सोचा और बेटे में कह दिया | सुन कर बेटा तैयार हो गया | 

एक रात माँ-बेटे दोनों ने मिल कर सोइ हुई पतोहू के मुँह में कपडा ठूँस दिया | फिर उसे एक चटाई में लपेट कर रस्सी से बाँध दिया और उठा कर मरघट में ले गए | वहाँ उन्होंने सूखी लकड़ियाँ जमा करके एक चित्ता बनाई और फिर चटाई   में लिपटी हुई पतोहू को उस पर लिटा दिया | लेकिन आग लगाने के लिए दियासलाई ढूंढ़ने लगे तो मालूम हुआ की दियासलाई घर पर ही भूल आए है | सास ने कहा – ‘ बेटा , तुम यही रहो | मैं अभी घर से दियासलाई  ले आती हूँ |’ इस पर बेटे ने कहा – ‘ माँ ! तुम्ही यहाँ रहो , मैं जाकर दियासलाई ले आता हूँ |’ लेकिन माँ क्या बेटे से काम होशियार थी ? दोनों दियासलाई लाना चाहते थे | कोई वहां रहने को तैयार न था | आखिर यह तय हुआ कि दोनों साथ – साथ घर जाकर दियासलाई ले आएँ | बस , पतोहू को वही छोड़कर दोनों घर लौट आए | 

अब पतोहू ने धीरे धीरे अपने सारे बंधन ढीले किए | आखिर किसी न किसी तरह रस्सी की गाँठे खुलीं और वह चित्ता पर से नीचे उतरी | पास ही लकड़ी का एक कुंदा पड़ा था | उसे चटाई में लपेट कर उसी तरह बाँध दिया | उस मरघट के एक कोने में एक बड़ा पेड़ था | पतोहू उसी पर चढ़ गई और पत्तो की आड़ में छिप कर बैठ गई | 

कुछ ही देर में उसके पति और सास दोनो दिया -सलाई लेकर लौटे | चित्ता पर चटाई ज्यों-की-त्यों पड़ी थी | उन्होंने झट उस में आग लगा दी | लकड़ी का कुंदा जल उठा | उन्होंने समझा – डायन जलकर खाक हो गई और खुशी – खुशी  घर लौट आए | 

थोड़ी देर बाद जिस पेड़ पर पतोहू छिपी बैठी थी उसके निचे कुछ चोर जमा हो गए | वे किसी धनवान के घर से अच्छे – अच्छे गहने चुरा लाए थे और उस पेड़ के नीचे बैठ कर बँटवारा कर रहे थे | पतोहू  

उस समय पेड़ की दाल पर बैठी ऊँघ रही थी | अचानक उसके हाथ से दाल छूट गई और वह धड़ाम से नीचे आ गिरी | उसे देख कर चोरो ने समझा – कोई भूत है | बस , वे गहने वग़ैरह वही छोड़ , जान लेकर भाग खड़े हुए | पतोहू ने एक – एक करके सब गहने पहन लिए और अपने घर की राह ली | घर पहुँच कर उसने दरवाजा खटखटाया | सास ने डरते – डरते दरवाजा खोला | सोने – जवाहर से लदी हुई अपनी पतोहू को देख कर उसने समझा कि वह भूत बन कर लौट आई है | चिल्लाती हुई वह अन्दर भागी और गिरती -पड़ती जाकर अपने बेटे को जगाया | वह हड़बड़ा कर उठा और पूछने लगा – ‘क्या बात है ?’

माँ ने सिसक कर कहा – ‘ अरे | वह भूत बन कर लौट आई है |’ बेटे को विश्वास न हुआ | माँ ने फिर कहा – ‘तुमको विश्वास न हो तो बाहर जाकर देख लो अपनी आँखों से !’ आखिर दोनों डरते -डरते बाहर निकले | देखा , सचमुच वही सजी-धजी खड़ी थी | दोनों उलटे पैर अन्दर भागे तो हँसकर पतोहू ने कहा – ‘ डरिए मत ! मैं भूत नहीं हूँ | मैं आपकी वही बहू हूँ | जब आप लोगो ने मुझे चित्ता में डाल दिया तो मैं सीधे स्वर्ग चली गई | वहाँ ससुर जी से भेंट हुई | वे मुझे देखकर बहुत खुश हुए और आप सबका कुशल -समाचार पूछा | मैंने उन्हें आप सब का हाल सुना दिया | तब उन्होंने कहा – अच्छा , अब तुम घर लौट जाओ और अपनी सास को मेरी खबर पहुँचा दो | कह देना – ‘ ससुर जी कुशल से हैं और तुम्हारी राह देख रहे हैं |’ जब मैं स्वर्ग से लौटने लगी तो उन्होंने ये सब गहने मुझे भेंट कर दिए |’ यह कहकर वह एक-एक करके अपने गहने दिखाने और सास को ललचाने लगी | 

उन रंग – बिरंगे , जग-मग करते गहनों को देख कर सास के मन में भारी उथल – पुथल मच गई | वह सोचने लगी – ‘यह चुड़ैल मेरे सब गहने ले आई ! देखो तो इसका भाग्य | मैं जाती तो मुझे ही मिलते न वे गहने ? लेकिन यह तो कहती है कि उन के पास ढेर के ढेर गहने है | तो मैं देर क्यों करूँ ? क्यों न जल्दी जाकर सब बटोर लाऊँ ?’

ऐसा निश्चय करके उसने कहा – ‘ ओरी बहू , मेरा जो तुम्हारे ससुर जी को देखने के लिए बहुत तड़प रहा है | बेचारे अकेले स्वर्ग में कितना कष्ट उठाते होंगे ! अच्छा तो यही होगा बेटा की तुम मुझे भी उसी तरह चटाई 

में लपेट कर चित्ता में रख दो | मैं तुम्हारे पिताजी को देख कर जल्दी ही लौट आऊँगी |’ बेटा भी माँ से काम होशियार न था | वह झट  राजी हो गया | आँखों में आँसू भर और स्वर्ग जाती सास के चरणों को छूकर पतोहू बोली – ‘ सासु माँ ! स्वर्ग में जाकर कही भूल जाइएगा – जल्दी वापस आइएगा | नहीं तो रो-रोकर हम मर जाएँगे | आपके बगैर यह घर हमें काटने लगेगा , ये गहने भार बन जायेंगे |’ 

बहू का यह प्रेम देखकर सास गदगद हो उठी | वह कुछ कहना ही चाहती थी की बहू बीच में बोल उठी – ‘सासु माँ ! जो एक बार स्वर्ग पहुँच जाता है वह लौट कर आना नहीं चाहता | इसी से हमें दर लग रहा है कि कहीं आप भी वहां जाकर हमें भूल न जाएँ |’

बहू की बातो से सास विहल हो गई | सचमुच उसे भी आँसू आ गए | बहू के सिर पर हाथ रखकर उसने आशीष दिया – ‘ बहू , मैं वहां ज्यादा दिन नही रहूँगी – हाँ , इन बैंगनों  का ख्याल रखना बहू  – मेरे आने तक तोडना नहीं | अच्छा , बहू एक बात तो कहो – क्या स्वर्ग में बैंगन मिलते है ?’

बहू ने मुँह पिचका कर रहा – ‘ नहीं , सासु-माँ ! बैंगन वहाँ  नहीं मिलते | इसीलिए तो मैं आप को वहाँ जाने नही देना चाहती | मैं ही चली जाऊँगी | आप यही रहिए !’

Indian women tea pickers

सास के पेट में खाल-बली मच गई – ‘अरे , यह तो बाकी गहने भी ले आना चाहती है |’

वह झट कहने लगी – ‘नहीं बहू , मैं वहाँ रहने थोड़े ही जा रही हूँ ? बात असल यह है कि मुझे तुम्हारे ससुरजी को देख  आना है | बहुत दिन हो गए है | ‘ अब पति – पत्नी दोनों ने मिल कर सास को चटाई में लपेट लिया | फिर सावधानी से मरघट में ले गए और चित्ता पर रखकर स्वर्ग भेज दिया | इस बार दियासलाई लाना कोई न भूला था | 

बेटे ने बहुत दिनों तक माँ के वापस आने की राह देखि | लेकिन जब महीनो बीत गए और वह लौट कर नहीं आई तो उसने इंतजार करना छोड़ दिया और उसे धीरे – धीरे भुला दिया | उसकी पत्नी तो जानती ही थी कि वह कभी लौटने नहीं वाली | अब वह रोज खुशी -खुशी  बैंगन की तरकारी बनाने और गा -गाकर खाने लगी | 

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