नृसिंह अवतार

इन्फोदारिया के प्रिय पाठकों ! जैसा कि आपने तृतीय अवतार कहानी के माध्यम से ये जाना कि महर्षि कश्यप के घर हिरण्याक्ष तथा हिरान्य्कशिपू नाम के दो बालकों ने माता अदिति के गर्भ से जन्म लिया जिनमे से हिरण्याक्ष का वध स्वयं भगवान् विष्णु ने वराह अवतार धारण करके किया एवं पृथ्वी को उसके पापों से मुक्त किया लेकिन हिरण्याक्ष के वध से जहां देवताओं में अत्यंत ख़ुशी का माहौल था वहीँ दूसरी ओर हिरण्याक्ष का बड़ा भाई हिरण्यकशिपु इस घटना से बड़ा रुष्ट हुआ एवं उसने अजेय होने का संकल्प किया ताकि वह देवताओं और विष्णु को पराजित कर अपने भाई के मृत्यु का प्रतिशोध ले सके। अजेय होने का वरदान पाने के लिए उसने सहस्त्रों वर्ष बिना जल ग्रहण किये ब्रह्मा जी को ध्यान में रखकर तप किया l हिर्न्य्कशिपू के तप से ब्रह्मा जी अत्यंत प्रसन्न हुए एवं उसे दर्शन देकर मनोवांक्षित वरदान मांगने को कहा, हिरान्यकशिपू ने ब्रह्मा जी से बड़ी ही होशियारी से वरदान माँगा कि ‘आपके बनाए किसी प्राणी, मनुष्‍य, पशु, देवता, दैत्‍य, नागादि किसी से मेरी मृत्‍यु न हो। मैं समस्‍त प्राणियों पर राज्‍य करूं। मुझे कोई न दिन में मार सके न रात में, न घर के अंदर मार सके न बाहर। यह भी कि कोई न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार मार सके। न भूमि पर न आकाश में, न पाताल में न स्वर्ग में।’  l ब्रह्मा जी से प्राप्त वरदान के तेज से अजेय हो चुके हिरान्यकशिपू ने देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया एवं धीरे-धीरे सम्पूर्ण लोकों का अधिपति हो गया। देवता निरूपाय हो गए थे उनके पास हिरान्यकशिपू को पराजित करने का कोई भी उपाय नहीं सूझ रहा था, क्यूंकि ब्रह्मा जी द्वारा प्राप्त वरदान हिरान्यकशिपू को एक प्रकार से अमर बना चूका था l

समय और हिरन्यकश्यप का अत्याचार बढ़ता गया l कुछ समय पश्चात हिरन्यकश्यप का विवाह हुआ और इस विवाह से उसे चार पुत्रों की प्राप्ति हुई, प्रहलाद उसका सबसे छोटा पुत्र था l प्रहलाद का मन सदैव विष्णु की स्तुति में बीतता था यह बात हिरन्यकश्यप को नहीं मालुम थी, वो तो बस यही चाहता था कि समस्त लोकों में केवल उसकी ही पूजा हो और विष्णु की स्तुति करने वाले को वह अपना परम शत्रु मानता था l इस बात से अनभिज्ञ हिरन्यकश्यप ने एक दिन सहज ही अपने चारों पुत्रों में सबसे छोटे प्रहलाद से पूछा, “पुत्र तुम्हे क्या अच्छा लगता है ? प्रहलाद ने बाल मन की सुलभता एवं इमानदारी से बिना समय गंवाए ही अपने पिता को जो उत्तर दिया उसकी कल्पना हिरन्यकश्यप ने कभी स्वप्न में भी नहीं की थी l प्रहलाद ने कहा, “इन मिथ्या भोगों को छोड़कर वन में श्री हरि का भजन करना!’ बालक प्रह्लाद का उत्तर स्पष्ट था। माना कि हिरन्यकश्यप एक दैत्य था लेकिन उसके अन्दर पिता का भी दिल था अतः उसने प्रहलाद को एक नादान और नासमझ बालक समझ के उसे एक और मौका देने की बात सोची एवं उसने अपने पुत्र प्रहलाद को शिक्षा प्राप्त करने हेतु दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के पास भेज दिया एवं उनसे कहा, ‘इसे आप ठीक-ठीक शिक्षा दें!’ प्रहलाद ने अर्थ, धर्म, काम की शिक्षा सम्यक् रूप से प्राप्त की; परंतु जब पुन: पिता ने उससे पूछा कि अब बताओ समस्त लोकों में श्रेष्ठ क्या है ? तो उसने श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन— इन नौ भक्तियों को ही श्रेष्ठ बताया। पुत्र प्रहलाद के उत्तर से अत्यंत क्रोध में आये हिरन्यकश्यप ने प्रहलाद को तुरंत मार डालने का आदेश दे दिया उसने कहा ‘इसे मार डालो। यह मेरे शत्रु का पक्षपाती है।’ दैत्यराज के आदेश का पालन करते हुए असुरों ने निर्दोष बालक प्रहलाद पर आघात किया परन्तु सारे वार निष्फल साबित हुए वार में प्रयोग किये गए खडग टूट गया, त्रिशूल टेढ़े हो गये; पर वह कोमल शिशु अक्षत रहा। दैत्य चौंक गए उन्होंने प्रह्लाद को विष दिया पर वह जैसे अमृत हो गया, सर्प छोड़े गये उनके पास और वे फण उठाकर झूमने लगे। मत्त गजराज ने उठाकर उन्हें मस्तक पर रख लिया। पर्वत से नीचे फेंकने पर वे ऐसे उठ खड़े हुए, जैसे शय्या से उठे हों। समुद्र में पाषाण बाँधकर डुबाने पर दो क्षण पश्चात् ऊपर आ गये। अंत में दैत्यराज की बहन होलिका ने बालक प्रहलाद को अपने गोद में लेकर घोर चिता में प्रवेश किया परन्तु अग्नि की भीषण लपटें भी बालक प्रहलाद को कोई चोट नहीं पंहुचा पायीं और दूसरी तरफ होलिका जल के ख़ाक हो गयी l दैत्यराज के समझ में नहीं आया रहा था कि आखिरकार विश्व के सारे प्रयास करने के बाद भी प्रहलाद कैसे जीवित बच जा रहा है उसे आभाष हुआ हो-न-हो यह विष्णु का ही काम हो सकता है, अतः क्रोधित हिरन्यकश्यप ने बालक प्रहलाद से पुछा ‘तू किस के बल से मेरे अनादर पर तुला है?’ और आखिरकार हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को बाँध दिया और स्वयं खडग उठाया परन्तु उसका प्रयास असफल रहा, प्रसन्न मन बालक प्रहलाद ने बोला जिसका बल आप में तथा समस्त चराचर में है उसे भला क्या हानि हो सकती है !’ प्रह्लाद निर्भय थे।

‘कहाँ है वह?’ दैत्यराज ने पुछा, इस प्रश्न के उत्तर में बालक प्रहलाद ने उत्तर दिया  ‘मुझमें, आप में, खड्ग में, सर्वत्र!’
‘सर्वत्र? इस स्तम्भ में भी?’
‘निश्चय!’ प्रह्लाद के वाक्य के साथ दैत्य ने अपने महल में खड़े खंभे पर घूसा मारा। वह और समस्त लोक चौंक गये। स्तम्भ से बड़ी भयंकर गर्जना का शब्द हुआ। एक ही क्षण पश्चात् दैत्य ने देखा- समस्त शरीर मनुष्य का और मुख सिंह का, बड़े-बड़े नख एवं दाँत, प्रज्वलित नेत्र, स्वर्णिम सटाएँ, बड़ी भीषण आकृति खंभे से प्रकट हुई। दैत्य के अनुचर झपटे और मारे गये अथवा भाग गये। हिरण्यकशिपु को भगवान नृसिंह ने पकड़ लिया।
‘मुझे ब्रह्माजी ने वरदान दिया है!’ छटपटाते हुए दैत्य चिल्लाया। ‘दिन में या रात में न मरूँगा; कोई देव, दैत्य, मानव, पशु मुझे न मार सकेगा। भवन में या बाहर मेरी मृत्यु न होगी। समस्त शस्त्र मुझ पर व्यर्थ सिद्ध होंगे। भुमि, जल, गगन-सर्वत्र मैं अवध्य हूँ।’
नृसिंह बोले- ‘यह सन्ध्या काल है। मुझे देख कि मैं कौन हूँ। यह द्वार की देहली, ये मेरे नख और यह मेरी जंघा पर पड़ा तू।’ अट्टहास करके भगवान ने नखों से उसके वक्ष को विदीर्ण कर डाला।
वह उग्ररूप देखकर देवता डर गये, ब्रह्मा जी अवसन्न हो गये,महालक्ष्मी दूर से लौट आयीं; पर प्रह्लाद-वे तो प्रभु के वर प्राप्त पुत्र थे। उन्होंने स्तुति की। भगवान नृसिंह ने गोद में बालक प्रहलाद को उठा कर उन्हें बैठा लिया और स्नेह करने लगे।


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