सीता अपने माँ – बाप के साथ पड़ोस के एक गाँव में मेला देखने गई | उस रोज़ उस गाँव में बड़ा भारी उत्सव हो रहा था | लोग दूर – दूर के गाँवों से बैल – गाड़ियों पर और पैदल भी चले आ रहे थे | रथोत्सव भी होने वाला था | अच्छी – अच्छी भजन मंडलिया भी आने वाली थी | उस दिन वह मवेशियों की हाट भी लगने वाली थी इसीलिए लोग अच्छे – अच्छे गाय – बैल सजा कर ले जा रहे थे | सभी दुकाने तरह – तरह की खूबसूरत चीज़ो से सजी हुई थी | जगह – जगह मिठाइयों की दुकाने थी , वहाँ से स्वादिष्ट मिठाइयों की सौंधी खुशुबू फैल कर लोगो को ललचा रही थी | थोड़ी ही दूर मैदान में एक घेरा सा  हुआ था जहा लोग तमाशा देख रहे थे | 

सीता अपने माँ – बाप  के साथ दिन भर वहा घूमती फिरती रही | उसने गाने सुने , तमाशे देखे , काठी  के घोड़े पर  छड़ी | वह  भर आँखे फाड़ – फाड़ कर मेला देखती रही | जब उसे भूख लगी तो माँ ने उसे मिठाई खरीद के खिला दी | भीड़ की धक्का – मुक्की मे वो कही खो न जाये इस ख्याल से उसकी माँ  उसका नन्हा सा हाथ पकड़ के घूमती रही | 

इसी तरह शाम हो गयी | लेकिन कही अँधेरा न था , गैस और बिजली की बत्तियों से दिन जैसा उजाला हो रखा था | भीड़ पल पल मे बढ़ती जा रही थी | सीता अपनी माँ का हाथ पकड़ कर सकपकाई सी घूम रही थी | एक जगह रामायण – गान हो रहा था , सीता  अचरज के साथ ये सब देख रही थी | लेकिन आखिर थी तो वो छोटी लड़की ही , इस तरह कब तक घूमती रहती ! बेचारी थक गयी और उसे बड़े जोर की नींद आने लगी | 

माँ ने जब ये देखा तो उसे एक जगह लेता दिया और खुद उसकी बगल मे बैठ गयी | उस शोर में  भी आँख मूंदते ही सीता को नींद आ गयी | बेचारी थकी हुई थी ना ! उसकी माँ उसे देखती बैठी रही | 

इस तरह दो-तीन घंटे बीत गए दो – तीन औरते बच्चो के साथ वही आ पहुँची | इतने मे सीता के पिता में आकर उसकी माँ से कहा – ” चलो, यहाँ थोड़ी दूर पे ही भजन चल रहे है , थोड़ी देर सुन कर फिर लौट आएँगे |”

“लड़की को छोड़कर कैसे आऊँ ? ” सीता की माँ ने पूछा | 

“हम  उसको देखते रहेंगे , जल्दी लौट आना ” – बगल की औरतो ने कहा | 

सीता की माँ ने सोचा – ‘ जब तक ये जगती है , तब तक मैं लौट आऊँगी | ‘ यह सोचकर भजन सुनने चली गयी | 

आधा घंटा बीत गया , जिन औरतो ने सीता को देखते रहने का वादा किया था उन्हें भी नींद आ गयी | 

इतने मे सीता जगी और माँ को चारो तरफ ढूंढने लगी | लेकिन उसकी माँ वहाँ कहाँ थी ? इतने मे  थोड़ी दूर उसे एक औरत दिखाई दी जो देखने में ठीक उसकी माँ जैसी थी | सीता अम्मा ! अम्मा ! चिल्लाती हुई उसकी ओर दौड़ी | पर वह औरत तब तक भीड़ में ओझल हो चुकी थी | 

इतने मे  थोड़ी दूर उसे एक औरत दिखाई दी जो देखने में ठीक उसकी माँ जैसी थी | सीता अम्मा ! अम्मा ! चिल्लाती हुई उसकी ओर दौड़ी | पर वह औरत तब तक भीड़ में ओझल हो चुकी थी | अब सब से धोके खाते हुए सीता हर औरत के पास जाती और देखती की कही उसकी माँ तो नहीं है ? कुछ औरतो को तो देख कर उसने समझा की सचमुच उसकी माँ ही है | उसने उनका हाथ भी पकड़ लिया , लेकिन हर बार उसे निराशा ही हाथ लगी | रेशमी साड़ियाँ  पहने परियो जैसी औरते वह चारो तरफ घूम रही थी , एक से बढ़कर एक खूबसूरत और सजी-धजी | पर किसी को भी देख कर उसे ख़ुशी नहीं हुई | 

इतने में धीरे -धीरे अँधेरा हो चला | सीता भटकते भटकते एक घर के सामने चबूतरे पर बैठ गयी और सिसक – सिसक कर रोने लगी | इतने में एक बूढ़ा उस घर का दरवाजा खोल कर बहार आया और अकेली बैठ कर रोटी हुई सीता को देखा | 

“बेटी – तू कौन है ! यहाँ किस लिए अकेली बैठी रो रही है ! ” बूढ़े ने पूछा | 

” मैं अपनी माँ को ढूंढ रही हूँ , वो कही दिखाई नहीं दे रही | ” सीता ने जवाब दिया | 

“तुम्हारी  माँ का नाम क्या है ? उन्होंने कैसी साड़ी पहनी है ? वो दिखने में कैसी है ? ” बूढ़े ने पूछा | 

“मेरी माँ दिखने में बहुत अच्छी दिखती है , वह बहुत सुन्दर है ” सीता ने कहा |  

फिर बूढ़े ने बहुत से सवाल पूछे जिससे वो उसकी माँ का हुलिया पता लगा सके | लेकिन सीता ने ” मेरी माँ बहुत सुन्दर है , वो कही दिखाई नहीं दे रही ” के अलावा और कोई जवाब नहीं दिया | इतने में आस पास के बहुत से लोग जमा हो गए | सभी के घर मेला देखने के लिए मेहमान आये हुए थे , उन सबके घर में बहुत सुन्दर स्त्रियाँ  थी | बूढ़े ने सोचा शायद उन्ही में से किसी की बच्ची होगी | इसीलिए वो सीता को लेके एक – एक घर में गया और उन सारी औरतो को सीता को दिखाकर पूछा –  ” देखो , इनसे में से कोई तुम्हारी माँ है ? ” 

लेकिन सीता उनमे से किसी को नहीं पहचानती थी | उसने कहा – मेरी माँ और भी सुन्दर है | 

“न जाने देखने में वो कैसी परी जैसी लगती होगी !” – बूढ़े ने सोचा | 

वह अब सीता को गोद मे लेके मेले की ओर चल पड़ा | वहाँ वह हर खूबसूरत औरत के पास जाता और सीता को दिखता | लेकिन हर बार सीता एक ही बात कहती – ” नहीं ! ये मेरी माँ नहीं है , मेरी माँ तो और भी सुन्दर है ” | आखिर घूमते घूमते बूढ़ा भी परेशान हो गया और सीता को लेकर घर लौट आया | फिर उसने उसे नहला – धुला कर खिला – पिला दिया | खाना खाने के बाद सीता फिर से चबूतरे पे आकर बैठ गयी | उसकी आँखे माँ को देखने के लिए बैचैन थी | वह वहाँ बैठकर अपनी माँ की राह देखने लगी | 

सॉंझ हो गई | मेला देखकर लोग अपने अपने घर लौटने लगे | सीता चबूतरे पर बैठी – बैठी हर राह चलती औरत को देखकर चौंक उठती कि  शायद उसकी माँ ही है | उसके पास ही वह बूढ़ा और दस – पॉंच आदमी बैठे हुए थे | वे परेशान थे की कैसे इस बच्ची को उसकी माँ से मिलाया जाये | 

अचानक सीता  ज़ोर से “अम्मा !” चिल्लाकर भीड़ की ओर दौड़ी | वह एक औरत के पास जाकर पैरो से लिपट गई | उस औरत ने सीता को उठा कर गले लगा लिया और दुलारने लगी | 

सब लोग अचरज के मारे जहाँ के तहाँ रह गए | उन्हें मालूम हो गया की वही सीता की माँ है | उन्होंने सीता की माँ को एक परी समझ रखा था , लेकिन यह औरत देखने में बहुत कुरूप थी | दुहरा बदन , रूखी त्वचा , कला – कलूटा रंग , उस पर चेचक के दाग ! वाह ! कैसी सुंदरता है | 

पर धीरे धीरे वे समझ गए कि  सीता ने सच ही कहा था , उसकी नज़र में उसकी माँ  सचमुच बड़ी सुन्दर थी !!!

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