मत्स्य अवतार 

सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने सम्पूर्ण जगत की सृष्टि करने के बाद अन्त में मनुष्यों के आदिपुरुष मनु को बनायाl मनु की संतान होने के कारण ही हम मानव कहलाते हैंl मानव ही विश्व का श्रेष्ठ जीव हैl

मनु ने संतान के लिए कठोर तपस्या की, तपस्या के फलस्वरूप उनकी अनेक परम तेजस्वी संताने हुईं, उन लोगों ने विभिन्न विद्याओं का आविष्कार किया और तपस्या के द्वारा महाशक्ति प्राप्त की l इसके फलस्वरूप वे जीव-जगत् के स्वामी होकर प्रकृति राज्य के सभी प्रकार की सुख सुविधाओं का भोग करने लगे l उनके आनंद की सीमा ना रही l

निश्चिंत होकर मनु तपस्या में डूब गए l ध्यानयोग के द्वारा भूत-वर्तमान-भविष्य की थोड़ी झलक मिलने पर उन्हें पता चला कि थोड़े दिनों बाद ही साड़ी पृथ्वी जलमग्न हो जायेगी और इस प्रकार समस्त जीवों का विनाश हो जाएगा l अपनी इतनी तपस्या का फल समूल ध्वंस हो जाएगा – ऐसा जानकार मनु बड़े ही दुखी हुए l यह विचार उनके लिए असह्य हो उठा l तपस्या के द्वारा ही जगत की सृष्टी हुई है और तपस्या के द्वारा ही इसकी रक्षा करनी होगी – यह सोचकर वे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के ध्यान में निमग्र हो गए l पहाड़ की एक गुफा में शिला के आसन पर ध्यान करते हुए उनकी बाह्य चेतना पूरी तरह से लुप्त हो गयी, उनका शरीर काठ की मूर्ति के सामान अचल हो गया, मन ब्रह्मामय l इस उग्र तपस्या पर प्रसन्न हो कर ब्रह्मा ने उन्हें दर्शन दिए l

ब्रह्मा बोले, “वत्स, पृथ्वी तुम्हारे पुत्र-पौत्रों से भरी है, वे लोग सर्व प्रकार की भोग्य वस्तुएं पाकर आनंदपूर्वक हैं, फिर तुम क्यों ऐसा कठोर ताप करके देह्पात कर रहे हो ?” इस पर मनु ने जब अपने मन का भाव व्यक्त किया, तो ब्रह्मा बोले, “वत्स, तुम इस विषय में निश्चिंत रहो, जिन प्रेममय नारायण की इक्षा से मैंने इस जगत की सृष्टि की है, उन्होंने ही अपने जीवों की रक्षा के लिए सुव्यवस्था की है l” यह कहकर उन्होंने मनु के समक्ष भविष्य की यह घटना प्रकट की l मनु ने प्रफुल्ल होकर उनके चरणों में प्रणाम किया और ब्रह्मा अंतर्ध्यान हो गए l  

अनेक परिवर्तनों के बीच से होकर जगत चलता रहा l पृथ्वी धन-धान्य से पूर्ण थी; रूप, यौवन, स्वास्थय के साथ ही रोग तथा मृत्यु भी विद्यमान थे; तुच्छ बातों को लेकर झगड़ा-फसाद, क्षुद्र स्वार्थ के लिए रक्तपात; हीर स्नेह प्रीति, दुसरो के लिए आत्मत्याग तथा सुख-दुःख, भले-बुरे के चक्र के द्वारा मानव-जीवन में विविध प्रकार के भाव प्रस्फुटित होते रहे l मानव प्रकृति के विधान से काल के श्रोत में प्रवाहित होता रहा l

भोग के द्वारा मनुष्य का मन क्रमशः उन्मत्त हो उठा l शरीर के सुख-स्वाछन्द्य को छोड़कर अंतर की शान्ति को ढूंढनेकी उसके मन में इक्षा नहीं हुई l निंदा तथा विद्वेष क्रमशः कलह तथा हिंसा में परिणत हुए; तदुपरान्त हत्या, रक्तपात तथा अत्याचार का दौर चला l छल-कपट ने मानव ह्रदय पर शासन करना आरम्भ कर दिया l साधुओं के उत्पीडन तथा दुर्बलों के कातर क्रन्दन से श्रीहरि का आसन डोल उठा l

सुषमामयी प्रकृति के हास्यपूर्ण मुखमण्डल पर प्रचण्ड क्रोध की अभिव्यक्ति दीख पड़ी l शरतकालीन निर्मल गगन में बिजली की कड़क सुनाई देने लगी, वसंत के मलय-पवन के दौरान आँधी चलना आदि के द्वारा ऋतुओं में घोर उलट-फेर आरम्भ हुआ l अकाल तथा महामारी निर्दयतापूर्वक जीवों का ग्रास करने लगे l आत्मरक्षा का कोई भी उपाय नहीं बचा, मनुष्य के दिन अत्यंत कठिनाई पूर्वक बीतने लगे l

उन्ही दिनों पृथ्वी पर द्रविड़ नाम का एक राज्य था एवं परा धर्मपरायण सत्यव्रत वहाँ के राजा थे l प्रजा का कल्याण करने की बात ही सर्वदा उनके मन में बनी रहती थी l याज्ञ-यज्ञ तथा ध्यान-जप में ही उनके दिन बीतते थे l मनुष्य की दुर्दशा से व्यथित होकर वे जगत के कल्याणार्थ दिन-पर-दिन भगवान् से प्रार्थना करते रहते थे l

एक दिन सत्यव्रत तालाब के जल से पितरों का तर्पण कर रहे थे, सहसा क्रीड़ारत एक छोटी-सी मछली उनकी अंजलि में आ पड़ी l मछली को वे वापस तालाब में डालने लगे, तभी उसने मानवी भाषा एवं क्षीण वाणी में, “रक्षा करो, रक्षा करो” – कहकर चीत्कार करना आरम्भ कर दिया l राजा ने विस्मित होकर मछली को ऊपर उठाकर देखा l मछली पुनः बोली, “मैं बड़ी-बड़ी मछलियों से अत्यंत भयभीत हूँ, तुम मेरी रक्षा करो” l राजा तो यह सुनकर बिलकुल अवाक् रह गए l मछली को कमण्डल में रखने के बाद उन्होंने अपना तर्पण समाप्त किया l बाद में कमण्डल को अपने भवन में लाकर उन्होंने एक किनारे रख दिया l राजा ने सोचा की भगवान् की इच्छा से घटित इस घटना में असंभव जैसा कुछ भी नहीं है l संभव है कि इसमें कोई गूढ़ अभिप्राय हो l

अगले दिन प्रातःकाल राजा मछली की हालत देखने के लिए कमण्डल के पास गए l उन्होंने पाया कि मछली के बढ़ जाने से कमंडल भर गया है l उन्हें देखते ही मछली बोल उठी, “राजा, देखो, मैं कितनी बड़ी हो गयी हूँ ! तुम्हारे इस छोटे से कमंडल में आ नहीं पा रही हूँ, तुम यथाशीघ्र मुझे और भी बड़े स्थान में रखो l” राजा ने उसे एक हौज के पानी में रख दिया l

अगले दिन राजा ने देखा – वह मछली अद्भुत रूप से इतनी बड़ी हो गयी थी कि हौज में उसके हिलने-डुलने तक को स्थान न था l इस असाधारण घटना को देखकर राजा भगवान् की महिमा के विषय में सोचने लगे l सामान्य लोगों के सामान वे उद्विग्न नहीं हुए l मछली मोटी आवाज में राजा से अपने को और भी बड़े जलाशय में ले जाने का अनुरोध करने लगी l मछली को अपने उद्यान के विशाल सरोवर में डालने के बाद राजा सोचने लगे कि अब तो इसे कोई परेशानी नहीं होगी l  

परन्तु बड़े आश्चर्य के साथ अगले ही दिन राजा ने देखा कि मछली पूरे तालाब में फैल चुकी है l यह घटना किसी के लिए अज्ञात नहीं रही, अब मछली की आवाज भी अत्यंत मोटी हो गयी थी l अपनी इस मोटी आवाज में वह राजा से बात करने लगी l

राजा ने सेनापति को आदेश दिया, “मछली को बिना कष्ट पंहुचाये नदी में डलवा दो l” सेनापति ने बहुत-सी रस्सियों को मछली के शरीर में लपेटा, हजारों लोगों तथा अनेक हाथियों की सहायता से उसे सौ बैलगाड़ियों पर चढ़ाया और बड़े ही कष्टपूर्वक उसे नदी तक ले गए l यह घटना लोगों के मुख से हजारो प्रकार से अतिरंजित होकर पूरे भारत में फैल गयी l उन दिनों रोग, शोक, अकाल, भूकंप, उल्कापात, वज्राघात आदि के फलस्वरूप पृथ्वी की अवस्था भयंकर थी और अब इस घटना से वो और भी भयावह हो उठी l जो मुट्ठी भर लोग इन आपदाओं से बाख गए थे, वे भी इस घटना को सुनकर भय से मरणासन्न हो गए l परन्तु राजा सत्यव्रत भगवान् के चिंतन में विभोर रहे l 

मछली का शरीर नदी के अन्दर भी अत्यंत तीव्र वेग से बढ़ता रहा और उसके कारण जल का प्रवाह अवरुद्ध हो गया l तटवर्ती ग्राम बहने लगे, द्रविड़ राज्य में हाहाकार मच गया l मृत्यु से बचे हुए, भय से अर्धमृत लोगों की सहायता से मछली को खींचकर समुद्र में ले जाया गया l समुद्र में पहुचकर मछली ने यथेक्षा अपने अंगों का विस्तार किया और एक महाद्वीप का आकार धारण कर लिया l

राजा भगवद्बोध से मछली की स्तुति करने लगे, राजा ने कहा, “हे हरि, तुम्हारे अतिरिक्त कौन है, जो ऐसी अद्भुत् लीला कर सके ? पाप में डूबी मनुष्य-जाति तुम्हे भूलकर अहंकार में उन्मत्त हो उठी थी; उन्हें अब यथेष्ट दण्ड मिल चूका है, अब तुम प्रसन्न हो जाओ l जो मनुष्य धरा को तुच्छ मानते थे, आज वे मछली के भय से डरे हुए हैं l तुमने मछली का रूप धारण करके दाम्भिक मनुष्यों का दर्प चूर्ण कर दिया है l 

तभी चारो दिशायें आलोकित हो उठी l मत्स्य का पूर्वार्ध नारायण के रूप में परिणत हुआ – कमल की पंखुड़ियों के सामान दोनों नेत्र; चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा व प्रसन्न मुखमण्डल, जिसे देखते ही जगत विस्मृत हो जाता था ! उस प्रेममय रूप को देखकर राजा का शरीर रोमांचित हो उठा, कम्पन्न के साथ पसीना निकलने लगा, अश्रु से कपोल भीग गए और उनके अंतर से रूदन निःसृत होने लगा l उनका कंठ अवरूद्ध हो गया; आनंद की तरंगो के घात-प्रतिघात से उनका अंग-प्रत्यंग टूटने लगा l नारायण ने राजा के सर, मुख तथा सीने पर हाथ फेरते हुए उन्हें शांत करते हुए कहा, “बेटा सत्यव्रत, एक बार अपने पूर्वजन्म की बातों का स्मरण करो l तुम मनुष्यों के आदिपुरुष मनु हो, तुमनेप्रलय-प्लावन के समय मनुष्य-जाति की रक्षा के लिए कठोर तपस्या की थी l ब्रह्मा के वर से तुम्हारे द्वारा मनुष्य-सह समग्र जीव-जंतुओं की रक्षा होगी l” राजा के मन में एक एक कर पूर्वजन्म की सारी स्मृतियाँ जाग्रत होने लगी l

श्रीहरि बोले, “अब से सात दिन बाद प्रलय आरम्भ होगा l तुम मानव आदि प्राणियों के एक एक जोड़े तथा सभी वनस्पतियों के बीज जल्दी एकत्रित कर लो l सात दिनों बाद देवताओं द्वारा निर्मित एक नौका तुम्हारे घाट पर आ लगेगी, तुम जीवों तथा वनस्पति-बीजों के साथ उसमे सवार हो जाना l जब समुद्र पृथ्वी का ग्रास करेगा, तब मैं सींगधारी स्वर्ण-मत्स्य के रूप में पुनः आऊंगा l तुम अपनी स्वर्ण-नौका को मेरे सींग से बाँध लेना l” यह कहकर नारायण-मत्स्य अंतर्ध्यान हो गए l

सात दिन बाद सचमुच ही एक स्वर्ण-नौका आ पहुंची l श्रीहरि की आज्ञा के अनुसार राजा सभी प्राणियों के जोड़े तथा वनस्पतियों के बीज सहित उसमे सवार हुए और नौका अपने आप ही समुद्र में जा पँहुची l इसके बाद पृथ्वी पर भयानक घटनाएँ होने लगी l सूर्य का तेज बाराह्गुना बढ़ गया l तालाब, सरोवर, नदी आदि सब सुख गए l पेड़-पौधे तथा लताएँ आदि कुछ भी नहीं बचे l पहले पक्षीगण और तदुपरान्त एनी जीव-जंतु मरकर समाप्त हो गए l मनुष्य ने विविध उपायों का सहारा लेकर बचे रहने का प्रयास किया, परन्तु सब कुछ व्यर्थ सिद्ध हुआ l जो कुछ अभागे लोग कन्काल्प्राय होकर बच गए, वे भी भूख-प्यास से पागल होकर सियाल-गिद्धों के सामान घृणित रूप से सादे मुर्दों के लिए चीन-झपटी करने लगे l तथापि जो लोग नहीं मरे, वे नंगे उन्मत्त पिशाच से भी अधिक जघन्यता से युक्त तथा पशुओं से भी बढ़कर खतरनाक हो गए l कई लोग मिलकर किसी एक को मारकर उसके रक्त-मांस का भक्षण करते l

पृथ्वी पर जीवन का चिन्ह तक नहीं बचा l असंख्य जीव-जंतुओं की सुखी हुई लाशों तथा वृक्ष-लताओं से धरती पति हुई थी l एक दिन अग्नि प्रज्वलित हो उठी और प्रचण्ड धुप तथा प्रबल वायु की सहायता से वह क्रमशः साड़ी धरती पर फैल गयी, जिसके फलस्वरूप पृथ्वी एक अग्निलोक के रूप में परिणत हो गयी l 

जलते-जलते इंधन के साथ-ही-साथ अग्नि भी शांत हुई; सम्पूर्ण धरातल राख से अक्षादित था l प्रबल वायु भीषण गर्जन के साथ निर्बाध गति से पृथ्वी पर प्रवाहित होने लगी l राख और धुल के उड़कर वायुमण्डल में छा जाने से सूर्य की किरणों का मार्ग अवरूद्ध हो गया l

रवि-रश्मियों के प्रचण्ड ताप से नद, नदियाँ तथा सरोवरों का जल भाप होकर आकाश में एकत्र हो चूका था; और अब वह मेघ में परिणत होकर पृथ्वी पर चारो ओर फैल गया l दिन और रात का भेद मिट गया, असंख्य स्तरों में बिखरी मेघराशि के भीसन गर्जन से सभी पर्वत प्रतिध्वनित हो उठे l भूकम्प से धरातल बारम्बार कम्पित होने के फलस्वरूप पहाड़ खंडित होकर गिरने लगे, नदियों के गर्भ से पर्वत उठने लगे और समुद्र मरुभूमि में परिणत हो गए l

तदुपरान्त मुसलाधार वर्षा होने लगी, वर्षा तथा शिलापात के फलस्वरूप ऊँची-नीची भूमि समतल क्षेत्रों में परिणत हो गयी; बड़े-बड़े पर्वत टूटकर जलप्रवाह में बहने लगे, सम्पूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो गयी, पहाड़ तथा समतल समुद्र – सब एकाकार हो गए l उन्मत्त प्रलय-वायु से पर्वताकार तरंगें आकाश में उत्थित होकर सैकड़ों वज्रों की ध्वनि के साथ एक-दुसरे से टकराकर बिखर जाने लगीं l प्रलय मानो मूर्तिमान होकर पृथ्वीतल पर विचरण करने लगा l 

राजा सत्यव्रत की स्वर्णनौका जब उत्ताल तरंगो पर सवार होकर उत्थित और पतित होने लगी, तब भयभीत होकर वे नारायण को पुकारने लगे l नारायण अनेज योजन में फैले स्वर्ण-सींगधारी मत्स्य के रूप में सागर के जल में प्रकट हुए l उनकी अंगज्योति से चारो दिशाएँ आलोकित हो उठीं l राजा निर्भयतापूर्वक अपनी स्वर्णनौका को श्रीहरि के सींग में बांधकर निश्चिन्त हुए l

वर्षा करते करते मेघ समाप्त हो गए l निर्मल आकाश में सूर्योदय हुआ, धरातल पर जल के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था और सूर्य की किरणों से पृथ्वी एक कांच के गोलक के सामान चमकने लगी l मनु की स्वर्णनौकामें स्थित जीवगण आश्वस्त हुए l

तरंगहीन सागर के जल में चन्द्र-सूर्य के रंगों का खेल देखकर राजा श्रीहरि के चिंतन में डूब गए l ऊपर फैले निर्मल नील अनंत आकाश तथा नीचे नील समुद्र ने उनके मन में भगवान् के अनंत भावों की स्मृति जगा दी, उन्हें लगा मानो वे एक आनंदलोक में विहार कर रहे हों l

मत्स्यरुपी नारायण ने भावी मनुष्य के धर्म विषय पर मनु को अनेक वर्षों तक शिक्षा दी l अधर्म के विनाश तथा धर्म की स्थापना के लिए ही प्रायोजन के अनुसार वे विभिन्न रूप धारण किया करते हैं l

धीरे-धीरे पृथ्वी के भू-भाग से पानी नीचे उतर आया l राजा सत्यव्रत ने उस पर वनस्पतियों के बीज बिखेर दिए l जलप्लावन से धरती अत्यंत उर्वर हो जाने के कारण शीघ्र ही वह फल-फूल से आच्छादित हो उठी l मनु जीवों के साथ भूमि पर उतारे, देखते-ही-देखते पृथ्वी पुनः जीव-जंतुओं से परिपूर्ण हो उठी l  

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