कुर्म-अवतार 

स्वर्ग का ऐश्वर्य भोग करके एक बार देवताओं के मन में बड़ा गर्व हुआ, भोग-विलास में मत्त होकर उन लोगों ने सभी प्रकार की तपस्याओं का परित्याग कर दिया, क्रमशः आलस्य और उसके फलस्वरूप शरीर-मन की दुर्बलताओं ने प्रकट होकर देवताओं का तेज नष्ट कर दिया, बचा रहा केवल उनके पूर्व गौरव का दंभ, और कौन बड़ा है कौन छोटा – यही लेकर उनके बीच निरंतर कलह होने लगा l 

दूसरी ओर पातालवासी असुरों के उद्यम का अंत न था, शास्त्रपाठ, दान, कला, वाणिज्य, कृषि, आदि समस्त कार्यों में उनका सम उत्साह था l देखते-ही-देखते वे लोग महा-शक्तिमान हो गए और देवताओं की दुर्बलता उनके भी दृष्टि में आ गयी l एक दिन दाम्भिक देवताओं ने पाया कि असंख्य असुर सेना ने उनके स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया है l जिन दिनों वे भोग तथा आपसी कलह में व्यस्त थे, उसी अवधि में असुरगण धन-जन तथा विद्या-बुद्धि में उनसे आगे निकल गए थे l वैसे देवताओं ने बड़े जोर-शोर के साथ युद्ध आरम्भ किया और आपस में चर्चा करने लगे कि उनके बाणों से असुरों की पराजय होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा l परन्तु परिणाम कुछ और ही हुआ, देवताओं के बाण चाहे जितने भी तीक्ष्ण क्यों न रहें हों, परन्तु उन्हें चलाने के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता थी, उसका देवशरीर में अभाव था l इधर असुरों का शरीर वज्रवत दृढ था, वे शारीरिक कष्ट तथा मृत्युभय की परवाह न करते हुए दल-के-दल देवसैन्य के भीतर प्रवेश करने लगे l उनकी ‘मारो-मारो’ , ‘काटो-काटो’ की आवाज, भीषण हुँकार तथा आत्मरक्षा का प्रयास किये बिना दोनों हाथों से उन्हें निर्भयतापूर्वक तलवारें चलाते देखकर देवताओं में आतंक फैल गया l देवतागण दैत्यों का तेज सहन नहीं कर सके और परास्त होने के बाद स्वर्ग छोड़कर भाग गए l असुरों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया l

असुरों का प्रहार इतना भयंकर था कि उनके अस्त्रों का आघात सहकर बचे रहने की अपेक्षा मृत्यु कहीं अधिक सुखकर होती l देवता अपना क्षत-विक्षत शरीर लेकर जिससे जहाँ भी हो सका, स्वर्ग-मर्त्य-पाताल के गिरि-गुफा आदि में अत्यंत कष्टपूर्वक छिपे रहे l संयोगवश किसी-किसी को असुरों की निगाह में आकर और भी कठोर अपमान तथा प्रहार सहना पड़ा l देवताओं के उद्धार का कोई भी उपाय नहीं बचा, काफी समय तक असुरों के हाथ अपमानित होने तथा चोट सहते हुए जीवित रहने के अलावा देवताओं के लिए दूसरा मार्ग ही क्या था ? अहंकार और आलस्य का फल कितना विषमय होता है !

प्रजापति ब्रह्मा देवताओं के दुःख से बड़े ही व्यथित हुए l असुरगण चाहे जितने भी अच्छे कार्य, दान-ध्यान आदि करते रहे हों, परन्तु उनका उद्देश्य नाम-यश तथा इहलोक का भोग करना था l नाम-यश तथा भोग के लिए वे लोग सब कुछ करने को तैयार थे, परन्तु भगवान् या धर्म की ओर उनका जरा भी आकर्षण न था l जो थोडा-बहुत धर्म उनमें था, वह भी केवल स्वार्थ-साधन का उपाय मात्र था l वे लोग भगवान को नहीं, अपितु भगवान् से सुख सुविधा चाहते थे l दूसरी और देवतागण सामयिक दुर्बलता के चलते दाम्भिक हो जाने पर भी भगवान् से सच्चा प्रेम करते थे और धर्म के लिए ही धर्म की  साधना करते थे l बीच-बीच में उनके मन में भोग की कामनाये प्रबल हो जाने से उनमे कई प्रकार की दुर्बलताएं आ जाती थीं, तथापि उनका मूल स्वभाव अच्छा था l

असुरगण स्वर्ग के शासक होकर आसुरी विधान के अनुसार ही वहां का शासन चलाने लगे l धार्मिक और ज्ञानी लोगों का अब कोई मान नहीं रहा, धनबल, देहबल तथा बाह्य सौन्दर्य की महिमा अत्यंत बढ़ गयी l विचार करना शौक मात्र रह गया; खाना-पीना और मौज करना ही सभ्यता हुई; हड़बड़ी, शोरगुल तथा दिखावा से देश उन्मत्त हो उठा l स्वार्थ के लिए झूठ का आश्रय लेना नित्यकर्म हो गया, संसार में घोर आसक्ति के फलस्वरूप मनुष्य का मन वासना की अग्नि में दग्ध होने लगा l

प्रजापति ने काफी प्रयास करके देवराज इंद्र को ढूंढ निकाला और उन्हें लेकर वैकुण्ठपति श्रीहरि के सम्मुख उपस्थित हुए l वैसे तो श्रीहरि के लिए भूत-भविष्य-वर्तमान कुछ भी अज्ञात न था l देवताओं की दुर्दशा, असुरों का स्वर्ग-विजय आदि सब कुछ उन्हें विदित था, तथापि ब्रह्मा एवं इंद्र के उन्हें प्रणाम करने के पश्चात बैठने पर उन्होंने कुशलता पूछी l इंद्र लज्जा के कारण अपना सर ही नहीं उठा पा रहे थे; ब्रह्मा ने ही सारी बातें श्रीहरि से बतायी l  

श्रीहरि ने देवताओं के कष्ट में सहानुभूति दिखाई और कहा कि उन्हें और भी पहले सूचित करने से अच्छा होता l विभिन्न बातें कहकर उन्होंने इंद्र को उत्साहित किया l वे बोले, “देवराज, इस जीवन में उत्थान-पतन तो लगा ही रहता है, जय हो अथवा पराजय, पर देहधारी के लिए कर्म के अतिरिक्त दूसरा कोई मार्ग नहीं l कर्मों के फल से ही देवताओं की दुर्दशा हुई है और कर्म ही दैत्यों के उत्थान का भी कारण हैं, अतः कर्म के द्वारा ही कर्म का क्षय करना होगा l परन्तु जैसे-तैसे कर्म करने से ही काम नहीं होगा, सत्परामर्श की भी आवश्यकता है l तुम लोग जो मेरी सलाह लेने आये हो, इसी में देवताओं के उत्थान का बीज निहित है l जो ठीक ढंग से कार्य करना चाहता है, उसे सच्चे आदमी के परामर्श के अनुसार ही चलना पड़ता है l जब तुम मेरे पास आये हो, तो समझ लेना कि अब तुम्हारे संकट के दिन बीत चुके, मैं सदैव अपने शरणागतों की रक्षा करता हूँ l”

“मैं कर्मफल का दाता हूँ, असुरो ने जो कार्य किया है उसके फलभोग को रोकने की क्षमता किसी में नहीं है l तुम लोगों को अब कठोर परिश्रम के द्वारा उनके कर्म को पराजित करना होगा l इस समय युद्ध के द्वारा दैत्यों पर विजय प्राप्त करने की क्षमता देवताओं में नहीं है l अतः तुम जाकर उन लोगों के साथ संधि कर लो, देव और असुर मिलकर क्षीरसागर का मंथन करो, उससे अमृत निकलेगा; अमृत का पान करके तुम लोग अमर हो जाओगे, अनंत तेज प्राप्त करोगे और तुममे दैत्यों पर विजय प्राप्त करने की क्षमता आ जायेगी l”

परन्तु यह कार्य आसान नहीं था, पहले तो पराजित होकर भागे हुए इंद्र को दैत्यराज से संधि की भीक्षा मांगनी थी, तदुपरांत एक समुद्र का मंथन करना था और फिर अमृत मिलने पर असुरों को भी तो उनका भाग देना होगा l असुरों के अमृत पीकर अमर हो जाने से तो देवताओं की सारी आशा ही धूल में मिल जाती l परन्तु श्री भगवान् की वाणी पर इंद्र का ऐसा विश्वास था कि उनके मन में किसी भी प्रकार के संदेह का उदय नहीं हुआ l इसी को कहते हैं देवह्रदय, इंद्र जानते थे कि श्री विष्णु से बढ़कर उनका हितैषी दूसरा कोई नहीं है l सच्चे भक्त का यही लक्षण है l

देवराज के सिंहासन पर बैठकर असुरराज तीनों लोकों पर शासन कर रहे थे l आज देवेन्द्र राज्यहीन, मानहीन तथा अस्त्रहीन होकर दैत्यराज के सम्मुख संधि के प्रार्थी थे l इंद्र की अपूर्व मुख्कान्ति, उज्जवल वर्ण तथा निर्भीक पदक्षेप देखकर द्वारपालों ने ससम्मान उनका मार्ग छोड़ दिया l इंद्र ने सभा में प्रवेश किया और दैत्यराज के प्रति राजोचित सम्मान दिखाते हुए अपना परिचय दिया l

दैत्यगण अब तक इर्ष्यापरायण होकर देवताओं तथा विशेषकर इंद्र को दूर से ही देखते आये थे, परन्तु आज उनके बीच आकर इंद्र ने अपनी अपूर्व अंगकांती से दैत्य्सभा को म्लान कर दिया था l दैत्यगण सचमुच ही चकित होकर उनकी ओर आदर से देखने लगे l उन्हें ऐसा लगा कि वस्तुतः यही व्यक्ति इस सिंहासन पर ठीक-ठीक जंचेगा l दैत्यराज भी चिरकाल से ही जिन इंद्र को श्रेष्ठ मानते आये थे, पाताल में रहकर भी जिन इंद्र के स्वर्ग्भोग को अपने स्वप्नराज्य की कल्पना के रूप में सोचते थे, आज वे ही इंद्र विनीत भाव से उनके सिंहासन के नीचे खड़े थे l वे आश्चर्यचकित थे l

“दैत्यराज, इर्ष्या के कारण हम काफी समय से शत्रुता करते आये हैं, तथापि दैत्य और आदित्य (देवता) – हम एक ही पिता की संतान हैं l स्वर्ग के सिंहासन पर आपका और मेरा समान अधिकार है l देव-दैत्यों के आप भी भाई हैं और मैं भी भाई हूँ, भाई-भाई के बीच आपसी कलह, सिंहासन को लेकर छीना-झपटी – यह सब बड़े ही लज्जा की बात है l घर में झगडा हो तो बाहरी शत्रु का बल बढ़ता है, यदि मिलकर रहें, तो हम कश्यप संतानों के लिए पितृगौरव की रक्षा करना कठीन नही होगा l मैं अब सिंहासन के लिए लालायित नहीं हूँ, दैत्यों और देवताओं के निवारणार्थ मैं आपके पास संधि की प्रार्थना लेकर उपस्थित हुआ हूँ l “

गँवार और मुर्ख लोग मीठी बातों से सहज ही वश में आ जाते हैं, विशेषकर यदि कोई उनकी शरण ले, तो वे सचमुच ही पिघल जाते हैं l इंद्र की इस मधुर प्रेमपूर्ण भाषा को सुनकर असुरगण बिलकुल ही गदगद हो गए l दैत्य्पति ने इंद्र को अपने सिंहासन के बगल में बैठाकर उनके प्रति सम्मान दिखाया l

इंद्र ने कहा, “मैं वैकुण्ठ में नारायण के पास गया था, उन्होंने सलाह दी कि हम भाई-भाई  आपसी विवाद त्याग दें और एक साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करें l मंथन से अमृत का उद्भव होगा और अमृत का गुण तो सर्वविदित ही है l”

दैत्यराज यह अद्भुत प्रस्ताव सुनकर आनंद से उन्मत्त हो उठे, सभा में उपस्थित दैत्यगण अमृत का नाम सुनते ही हो-हल्ला  करने लगे l असुर नेताओं ने बड़ी कठिनाई से उन्हें शांत किया l सभी लोग संधि की बात पर सहमत हुए l इंद्र को ही समुद्र-मंथन का नेतृत्व सौंप दिया गया और इंद्र सभी चीजों की व्यवस्था करने चले गए l

देवराज इंद्र ने काफी तलाश करके सभी देवताओं को एकत्र किया, श्री विष्णु की सलाह पर उन्होंने जो कुछ भी किया था, सभा में उन्होंने देवताओं के समक्ष वह सब कह सुनाया और समुद्र-मंथन के बारे में उनके सुझाव मांगे l देवतागण मंथन के लिए दण्ड तथा रस्सी की खोज में निकल पड़े, जगत के सभी पर्वतों से मंथन-दण्ड होने का अनुरोध किया गया, परन्तु किसी ने भी इस कार्य में भाग लेने का साहस नहीं दिखाया l आखिरकार मंदरगिरि पर्वत ने इस कार्य के लिए अपनी स्वीकृति प्रदान की, एवं वासुकी नाग मंथन-रस्सी बनने को तैयार हुए l

एक शुभ दिन देवों तथा असुरों की सेना ने महा-उत्साह के साथ मंदरगिरि को उखाड़ा और उसे क्षीरसागर की ओर ले चले, परन्तु कुछ दूर चलते ही वो इतना थक गए कि सबके मन में संदेह उठा कि क्या इस पर्वत को सागर तक ले जाना संभव हो सकेगा ? लज्जा से देवेन्द्र का मुख बिलकुल ही उतर गया, देवतागण कातर होकर श्रीहरि का स्मरण करने लगे l सहसा आकाश में एक विशाल मेघखण्ड के समान गरुड़ प्रकट हुए उनके ऊपर श्रीहरि विराजमान थे, श्रीहरि को देखकर देवगण जय-जयकार करने लगे l

इस जयध्वनि से असुरों का ह्रदय कम्पित होने लगा श्रीहरि के उज्जवल ज्योति से उनके नेत्र अंधे होने लगे थे और वे भयभीत होकर पलायन करने लगे l देवताओं ने बड़ी कठिनाई से उन्हें समझा-बुझाकर लौटाया, असुरों को भयभीत देखकर नारायण ने अपना तेज कम किया और प्रसन्न-मुख से सबको आश्वस्त करने लगे l श्रीहरि ने पर्वत को किसी साधारण से मिटटी के ढेले के सामान उठाकर अपने गरुड़ की पीठ पर रख दिया और गरुड़ उसे ले जाकर क्षीरसागर समुद्र के मध्य रख आये l नारायण कोई विप्पत्ति पड़ने पर स्मरण करने को कहकर वहां से अंतर्ध्यान हो गए l

अमृतपान के लोभ में वासुकी नाग ने रस्सी के समान मंदरगिरि पर्वत को लपेट लिया और एक तरफ पूंछ तथा दूसरी तरफ सिर बढ़ा दिया परन्तु अब इस बात को लेकर विवाद शुरू हो गया कि किस दल के लोग पूंछ पकड़ेंगे और किस दल के लोग सिर l देवताओं ने कहा, “हम ज्येष्ठ हैं, अतः हम सांप को सिर की ओर से पकड़ेंगे l “परन्तु दैत्यगण विजयी हुए थे, अतः वे लोग पूंछ पकड़ने को तैयार न थे, इस पर बुद्धिमान इंद्र असुरों का दावा मानकर वासुकी की पूंछ पकड़ने चले गए और विवाद का सहज ही निपटारा हो गया l अब हरि-हरि की महाध्वनि के साथ समुद्र मंथन आरम्भ हुआ l

थोड़ी-सी खींचा-तानी करते ही वासुकी गहरी सांस छोड़ने लगे और उनके विषाक्त श्वास से असुरगण की हालत खराब होने लगी, उन्होंने अहंकार के वशीभूत होकर स्वयं ही वासुकी का सिर पकड़ा था, अतः उनके लिए देवताओं के प्रति शिकायत करने का कोई मौका न था; अतः उन्हें चुपचाप यह कष्ट सहन करना पड़ा l इधर एक और विपत्ति आ खड़ी हुई, मंदराचल घूमते-घूमते सागरतल के कीचड में धंसने लगा, देवताओं के इंजिनियर विश्वकर्मा ने बहुत बुद्धि लगाई, परन्तु सागर के गहरे कीचड़ में इस पर्वत को ऊपर उठाये रखना संभव नहीं हो सका l असहाय होकर देव-असुर पूरे मन-प्राण से श्रीहरि को पुकारने लगे, भक्तवत्सल भगवान् फिर प्रकट हुए l भक्तों पर आया संकट देखकर नारायण स्वयं ही मंथन-कार्य की व्यवस्था करने लगे और बहु योजन आकार के एक विशाल कुर्म के रूप में सागरतल में प्रविष्ट होकर मन्दराचल को उन्होंने अपनी पीठ पर धारण कर लिया l देव-असुरगण अब दुगने उत्साह के साथ पुनः मंथन कार्य में जुट गए l

देवताओं तथा असुरों की मिलित शक्ति से वह विशाल पर्वत कुर्मावतार की पीठ पर तीव्र वेग के साथ घुमने लगा l सहसा एक तीव्र गंध उठा, जिससे देव तथा असुरों का सिर चकराने लगा और देखते-ही-देखते समुद्र के जल पर एक अत्यंत काला पदार्थ उतराने लगा l इस तीव्र गंध से लगभग सभी लोग मूर्छित हो गए l श्रीहरि ने इंद्र से कहा, “इंद्र, तुम तुरंत कैलाश जाओ क्यूंकि कैलाशपति महायोगी शिव के अतिरिक्त अन्य किसी में इस विष को पीने की क्षमता नहीं है l “इंद्र ने तत्काल ही प्रस्थान किया l

कैलाशपति समाधि में लीन थे एवं महामाया उनकी सेवा में लगी हुई थी l इंद्र ने जगदम्बा के चरणों में प्रणाम किया और उन्हें सारी बातें कह सुनाई l करुणामयी गौरी ने महादेव के कानो में ओंकार-ध्वनि करके उनकी समाधि को भंग किया l देवताओं के संकट की बात सुनकर शिव ने हलकी-सी मुस्कान के साथ इंद्र को आश्वस्त किया और नंदी बैल पर सवार होकर क्षीरसागर की ओर चल पड़े l

विष समुद्र में मक्खन की भाँती तैर रहा था, शंकर जी वहां पहुंचे और प्रसन्नवदन उसे पी लिया l जगत शीतल हुआ और सबको पुनः होश आने लगा l विष का पान करने से शिव जी का कंठ सदा के लिए नीला हो गया और तभी से उनका नाम ‘नीलकण्ठ’ पड़ गया l शिवजी सबको आशीर्वाद देकर वापस कैलाशधाम चले गए और मंथन कार्य फिर आरम्भ हुआ l सहसा जलराशि का भेदन करते हुए सुरभि नाम की एक अद्भुत गाय बाहर निकल आई, उस गाय में ऐसी आश्चर्यजनक क्षमता थी कि वह बिना बछड़े के ही दूध देती थी, और वह थोड़ा बहुत दूध नहीं देती थी – उसे दूहकर चाहे जितना दूध निकाला जा सकता था l श्री विष्णु की सलाह पर उसे यज्ञकर्ता ऋषियों को दान कर दिया गया l

सुरभि के बाद एक-एक कर ऐरावत नाम का एक विशाल तथा सुन्दर श्वेत हाथी तथा अनेक अद्भुत वस्तुएं सागर से निकलने लगी l नारायण ने प्रायः वे सभी इंद्र को दे दीं,तदुपरांत चारों दिशाओं को आलोकित करते हुए कौस्तुभ नाम की एक विशाल मणि निकली जिसे नारायण ने अपने गले में धारण कर लिया l

इसके बाद मंथन के वेग से एक परम सुंदरी युवती समुद्र के जल पर उतराने लगी, देव-असुरगण मुग्ध होकर उसकी ओर देखने लगे l देवी ने जल से बाहर आकर एक पंकज् माला विष्णु के गले में पहनाकर उन्हें पति के रूप में वरण किया l दिन-पर-दिन और महीने-पर-महीना समुद्र मंथन चलता रहा, उस विशाल पर्वत को लेकर खींचातानी करते-करते देव तथा असुर इतने थक गए कि अब उनके हाथ नहीं चल रहे थे और शरीर शिथिल होने लगा था, विशेषकर वासुकी तो खून की उलटी करते-करते बिलकुल ही अचेत तथा मृतप्राय हो गए l

तभी अतीव शीतल और सुगन्धित वायु प्रवाहित होने लगी, सबका शरीर नवीन बल तथा नए उत्साह से चेतनामय हो उठा, देवता तथा असुरगण हर्ष-विभोर होकर अनजाने ही एक सुर में जयध्वनि करने लगे, वे समझ गए कि उनके सारे श्रम को सार्थक करते हुए अमृत प्रकट हो गया है l हाथ में एक स्वर्ण-कलश लिए एक ज्योतिर्मय पुरुष बाहर आये, उनके नेत्र-मुख की भाव-भंगिमा अपूर्व थी l तरुण आयु वाले वे अमृतकुम्भ वहन करने के सर्वथा उपयुक्त थे l उन्हें ‘धन्वन्तरि’ नाम दिया गया l

धन्वन्तरि के बाहर आते ही असुरों ने अमृत के लोभ में उन्मत्त होकर उनके हाथ से कलश छीन लिया और असुरों के इस व्यवहार से नाराज होकर देवताओं ने असुरों पर आक्रमण कर दिया, परन्तु नारायण का संकेत पाके देवतागण शांत हो गए l अब असुरगण आपस में ही भयंकर लड़ाई करने लगे, हर कोई पहले अमृत पीने को लालायित था l परन्तु तभी मानो मंत्र के बल से सारा कोलाहल सहसा पूरी तौर से शांत हो गया क्यूंकि आकाश मार्ग से एक युवती असुरों के बीच में आ पहुची थी l उस सुन्दर स्त्री का मुख देखकर जो जहां था, वहीँ स्तब्ध रह गया और ऐसा नजारा था मानो वह सबके नेत्रों के मार्ग से उनके मन-प्राण खींचकर ले जा रही थी l वह हसते हुए असुरों से वार्तालाप करने लगी – “इधर से होकर गुजरते हुए भयानक शोरगुल सुनकर मैं देखने चली आई कि ऐसी क्या बात है, जिस पर इतने सारे योद्धा लोग झगड़ रहें हैं ? दैत्यों ने अमृत-कलश को सुंदरी के पास रखकर उसे विवाद का कारण बताया l इस पर वह हँसने लगी और कहा, “यह तो साधारण सी बात है, इसके लिए झगड़ा-फसाद ? चलो मैं सब निपटा देती हूँ l” इतना कहकर उसने कलश को अपनी कमर पर उठा लिया और बोली, “देवता और असुरगण – दोनों ओर पंक्तियाँ बनाकर बैठें, मैं सबकी योग्यता के अनुसार बँटवारा कर देती हूँ l”

देवी ने देवताओं के के बीच अमृत का वितरण आरम्भ किया और रूप्मुग्ध असुरगण रूप के मोह में भूले रहे, उन्हें तो देवी का हास्यरस अमृत से भी अधिक मधुर लग रहा था l

राहू नाम का एक असुर बड़ा ही चतुर था, उसे थोड़ा आभास हो गया था कि हो-ना-हो कुछ गलत हो रहा है इसलिए वह धीरे-से देवताओं की पंक्ति में जाकर चन्द्रमा तथा सूर्य के बीच में बैठ गया l राहू के हाथ में अमृत पड़ते ही चन्द्रमा तथा सूर्य देवता ने संकेत से विष्णु को उसके बारे में बताया और विष्णु जी ने सुदर्शन-चक्र से राहू का सिर काट डाला, पर इसी बीच वह झटपट अमृत को मुख में डालकर थोड़ा-सा निगल चूका था l इसीलिए उसका सिर भी बच गया और धड़ भी बच गया और इस प्रकार वह असुर दो भागों में भी बांटकर भी अमर हो गया l अमृत पी लेने के कारण वह देवताओं की एक निम्न श्रेणी – नवग्रह में शामिल हो गया l और इसी कारण वह अब भी बीच-बीच  में चन्द्र अथवा सूर्य को निगलने का प्रयास करता है और इसके फलस्वरूप ग्रहण लग जाता है l

इधर दूसरी तरफ देवताओं को देते-देते ही अमृत समाप्त हो गया l सहसा इस ओर ध्यान जाने पर देवी चौंक उठीं और अपूर्व लज्जापूर्ण भंगिमा के साथ असुरों से बोली, “अजी, बातों-बातों में ही मैंने तो सारा अमृत समाप्त कर डाला, तुम्हीं लोगों ने तो हास्य-विनोद में लगाकर मेरे मन को भुला दिया था l अब क्या होगा ? “उस देवी ने ऐसी करुण तथा असहाय दृष्टि से असुरों की ओर देखा कि वे लोग अमृत की बात बिलकुल ही भूल गए l असुरों ने सोचा – चलो, थोड़े-से अमृत के लिए क्यों इसके मन को दुःखाया जाए ? इसके सामने अमृत तो क्या, जीवन भी तुच्छ है !!

कुछ समय के बाद देवी आकाश में विलीन हो गयीं तब जाकर असुरों की तन्द्रा भंग हुई, असंयम का फल हाथो-हाथ पाकर लज्जावश उनमें से कोई भी दृष्टि उठाकर दुसरे की ओर नहीं देख सका और वहीँ दूसरी ओर अमृतपान से तृप्त देवतागण थे l वंचित तथा अपमानित असुरों ने नाराजगी में देवताओं पर धावा बोल दिया; परन्तु खेद ! उनके अच्छे दिन जा चुके थे उनका सारा प्रयास व्यर्थ सिद्ध हुआ और मृत्यु से बचे हुए मुट्ठी भर असुरों ने पाताल के अन्धकार में भागकर अपने प्राण बचाये l देवराज इंद्र ने स्वर्ग के सिंहासन पर आसीन होकर विश्व में शान्ति की स्थापना की l

जगत के अधीश्वर होकर भी श्रीहरि ने अपने आश्रित भक्तों के कल्याणार्थ एक कूर्म का शरीर धारण किया था l उनकी उसी असीम करुणा का स्मरण करते हुए हम लोग अब भी कूर्म के रूप में उनकी पूजा किया करते हैं l               

         

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