किसी समय राजनगर नाम का एक शहर था | उस शहर का राजा बड़ा धनवान था | उसके खजाने में हीरे – जवाहरात की भरमार थी | उसके पास फौज भी बेशुमार थी | आस – पड़ोस के सब राजा उसकी धाक मानते थे | संसार में उसे किसी चीज़ की कमी न थी | 

लेकिन न जाने क्यों , वह राजा हमेशा उदास रहा करता था | मंत्रियो ने बहुत बार उससे इस उदासी का कारण पूछा , रानियों ने भी बहुत प्रयत्न किए | पर किसी को उसकी उदासी का कारण नहीं मालूम हो सका | आखिर लोग हार कर चुप रह गए | 

असल में उस राजा की उदासी का भेद यह था कि उसके कान गधे के कान जैसे थे | उस का यह भेद उसके नाई के सिवा और कोई नहीं जनता था | नाई को अपनी जान का डर था , इसलिए वह भेद छिपाए हुए था | 

जब पहली बार नाई ने राजा की हजामत बनाई तभी राजा ने उसे चेता दिया – ” अरे ! देख इधर ! मेरे राज में कोई यह भेद नहीं जनता | एक तू ही जनता है | इसलिए ख़बरदार ! अगर  किसी को इस की जरा भी भनक चली तो तेरी जान की खैर नहीं | बोटी – बोटी उड़वा दूँगा | समझ गया ना ?”

नाई ने कहा – ” जी हुजूर , खूब समझ गया | क्या मेरे बाल – बच्चे नही है ? महाराज बेफिक्र रहें | यह भेद कोई नहीं जान सकेगा |” महाराज ने खुश हो कर उस को पाँच अशर्फियाँ ईनाम में दी | 

महाराज को यह वचन दे कर नाई  घर आया | लेकिन उस के पेट में यह बात नही पच सकी | डर के मारे वह किसी से कुछ कह भी नही सकता था | बस फिर क्या था , उसका पेट फूल – फूल कर कुप्पा बन गया और वह बीमार रहने लगा | 

उस को बीमार देख कर उसकी पत्नी ने एक वैद्य को बुलाया | वैद्य ने आकर नाड़ी देखी और थोड़ी देर तक सोच – विचार कर कहा – ” देखो , तुम्हारे पेट में कोई भेद छिपा  है | इसी से तुम्हारा पेट फूल गया है और तुम बीमार पड़ गए हो |  तुम किसी से वह भेद खोल दो तो तुम्हारी बीमारी छू-मंतर हो जाय और तुम चंगे हो जाओ | अगर वह कोई बड़ा भेद हो तो , तुम और किसी से न सही अपनी पत्नी से तो कह दो | तुम इतना कर लो , तो और सब कुछ अपने आप ठीक  जाएगा |” यह कह कर वैद्य जी अपने घर चले गए | 

नाई की पत्नी भी वही खड़ी थी  | वैद्य के चले जाने के बाद उसने पूछा – ” अजी , यह भेद क्या है किस के कारण तुम्हारा  पेट फूल गया है ? मुझे क्यों नहीं बता देते ? तुम तो जानते हो मेरे पेट में बात कैसी आसानी से पच जाती है ? यह भेद मुझे  बता दो , मैं कसम खाती हूँ , किसी को जरा भी भनक नहीं लगने दूँगी | “

हाँ , नाई क्यों न जानता  ? वह अच्छी तरह जानता था कि उसकी बीवी के पेट में कोई बात नहीं पचती थी | उसकी  पत्नी एक चलती – फिरती रेडियो ही थी | उस ने कहा – ” हाँ , हाँ , मैं जनता हूँ , तुम बात छिपाने में कितनी होशियार हो | लेकिन मेरा यह भेद बिलकुल एक मामूली बात है | इसीलिए सबसे अच्छा यही होगा कि मैं जाकर उसी वैद्य को यह भेद बता आऊं |” यह कह कर वह वैद्य के घर चला गया | वैद्यजी घर पर ही थे | नाई  को फिर आता देख कर उन्होंने पूछा – ” क्यों , क्या बात है ? तुम फिर यहाँ क्यों आए  ? मैं अभी तो तुम्हारे यहाँ से आया हूँ ! “

“क्या कहूं वैद्यजी  ? आप तो यह कह कर चले आए की अपनी पत्नी को भेद खोल दो | उस समय मेरी बीवी वही खड़ी थी  | इसीलिए मैं आप से कुछ कह न सका |  लेकिन अब  कहता हूँ , सुनिए | मेरी पत्नी के पेट में छोटी सी बात भी नहीं पचती | आप उसको नहीं जानते | नहीं तो वैसी सलाह न देते | और यह तो कोई ऐसा वैसा रहस्य नहीं है | अगर कही यह रहस्य खुल गया तो मेरा सिर भुट्टे की तरह उड़ा दिया जाएगा   | लेकिन मैंने एक अच्छा उपाय सोच लिया है | अगर आप मुझे वचन दें कि यह भेद किसी  से नहीं खोलूँगा तो मैं आप ही को बता दूँ |” वैद्य ने मुँह पिचकाते हुए कहा – ” जा , जा , आया है बड़ा भेद खोलने वाला | जाकर और किसी को ढूंढ | मैं क्यों बिना मतलब ये बला अपने सिर मोल लूँ ?” ” लेकिन वैद्य जी | आप ही बताइए कि मैं और किसको ढूँढू ? कही ऐसा न हो कि मैं किसी से यह भेद कहूं और वह जाकर सारे शहर में ढिंढोरा पीट दे | उसे से अच्छा हो अगर आप ही कृपा करके मेरा बोझ हल्का कर दें | ‘ नाई ने गिड़गिड़ाते हुए कहा | 

” नहीं , यह कभी नहीं हो सकता | तुम्हारा  भेद सुनने वाला कोई नहीं मिलता तो मैं क्या करूँ ? कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारा भेद सुनते ही मेरा भी पेट फूलने लग जाय | मैं ऐसा बुद्धू नहीं जो जान बुझ कर आग में कूद पडूँ | जा , जा ! अगर तेरा भेद सुनने वाला कोई नहीं मिला तो जाकर किसी दिवार से या पेड़ से या सॉंप के बिल से कह दे |” वैद्य ने चिढ़ कर जवाब दिया | 

नाई  ने सोचा – ” वाह ! यह तो खूब अच्छी सूझी | सचमुच ही जाकर किसी बांबी में अपना भेद क्यों न खोल दूँ ?” यह सोच कर दौड़ता – दौड़ता वह शहर के बाहर चला गया  | वही नज़दीक की झाड़ियों में एक बांबी थी | नाइ ने चारो ओर  देखा तो आस पास आदमी क्या कोई पशु – पक्षी भी नज़र न आया | बस , उस बांबी से मुँह सटाकर उसने पेट का भेद खोल दिया – ” हमारे राजा के कान , गधे समान है | ” इतना कहते ही उसकी छाती पर से  मानो एक पहाड़ हट गया | वह बिलकुल चंगा हो कर खुशी – खुशी घर लौट आया | 

नाई ने जिस बांबी में अपना भेद खोला था उसी के ऊपर कुछ दिन के बाद एक बांसो का झुरमुट उग आया | 

उसके दो तीन महीने बाद राजा के यहाँ कोई भोज हुआ | उस भोज की चहल – पहल के लिए सब तरह के बाजे बजानेवाले बुलाए गए | उन में से एक बाँसुरी वाला भी था जिस के पास कोई अच्छी बाँसुरी न थी | उसने सोचा – ‘ चलो शहर के बाहर जो बांसो का झुरमुट है उस में एक बांस काट कर एक नयी बाँसुरी बना लूँ | ‘ यह सोच कर संयोग से वह उसी बांबी वाले झुरमुट के पास जा पहुँचा और एक बाँस काट कर अच्छी सी बाँसुरी बना ली | उस ने वह  बाँसुरी राजा के दरबार में बजाने के लिए रख छोड़ी | 

भोज के दिन वह बाँसुरी वाला ठीक समय राजमहल में हाज़िर हुआ | सब बाजे वालो के बाद उसकी भी बारी आयी और उसने खुशी – खुशी बाँसुरी उठाई | लेकिन यह क्या ? बाँसुरी से एकाएक यह क्या शब्द निकला ? ‘राजा के कान , गधे के सामान !’ सारे दरबारी चौंक पढ़े और उसकी ओर अचरज से देखने लगे | बाँसुरी वाले को काटो तो खून नहीं ! उसने फिर बजाया | फिर वही सुर निकला – ” राजा के कान , गधे के सामान !’ 

राजा का मुँह गुस्से से लाल हो उठा | तलवार खींच कर वह बाँसुरी वाले की और झपटा कि एक ही बार में उसका काम तमाम कर डे | लेकिन – “ठहरिये , महाराज ! जरा सोच – विचार लीजिए ! इस में मेरा कोई दोष नहीं | यह बाँसुरी आप ही आप ऐसा बोल उठी है | विश्वास न हो तो एक बार आप ही जाँच कर लीजिए |” बाँसुरी वाले ने डरते – डरते कहा | 

“अच्छा , मैं अभी इसकी जाँच करता हूँ | अगर तेरी बात सच न निकली तो बस , जिन्दा गड़वा दूँगा |” यह कह कर राजा ने बाँसुरी उठाई और बजाने लगा | बाँसुरी से फिर वही सुर निकला – ‘ राजा के कान , गधे सामान !’

सब लोग सन्नाटे में आ गए | राजा माथे पे हाथ रख कर बैठ गया और थोड़ी देर तक सोचता रहा | फिर उसने धीरे धीरे अपना मुकुट उतार कर नीचे रख दिया और कहा –  ” इस बाँसुरी का कहना ठीक है | मैं ही अब तक आप सब लोगो को धोखा देता आया हूँ | सचमुच मेरे कान गधे के सामान है | ” 

राजा के लम्बे लम्बे कान देख कर सब लोग अचरज में डूब गए | उन में से कुछ लोगो ने राजा को समझा कर कहा   – ” अगर आपके गधे के समान है तो इस में आपका क्या दोष ? जब भगवान की ऐसी मर्ज़ी है तो आप क्या कर सकते है ?” इस तरह उन्होंने बहुत तरह से समझाया कि गधे के से कान होने में कोई हर्ज़ नहीं है | 

धीरे – धीरे राजा की सारी उदासी दूर हो गई | अब वह निश्चिन्त हो कर राज करने लगा | लेकिन जब कभी वह बाँस के उस झुरमुट के पास पहुंच जाता है तो सुनता है – ‘राजा के कान , गधे के समान | ‘

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