पुराने ज़माने की बात है | एक गाँव में धर्मपाल नाम का एक व्यापारी रहता था | उसके जैसा धर्मात्मा और बात का सच्चा आदमी मिलना मुश्किल था | दीन – दुखियों की सहायता करने में उससे बढ़ा – चढ़ा और कोई न था | सचमुच जैसा उसका नाम था वैसा ही उसका काम भी | इसलिए उसे गाँव के ही नहीं , बल्कि आस – पास के गांव के लोग भी उसकी बड़ी इज़्जत करते थे |  बदमाश , चोर और डाकू भी उसका नाम सुनते ही आदर से सिर झुका लेते थे | 

पहले धर्मपाल के संतान न थी | मुद्दत के बाद जब उस के एक लड़का हुआ तो उसने उसका नाम राजपाल रखा | एकलौता बेटा था ; इसलिए धर्मपाल ने उसे बड़े लाड – प्यार से पाला | 

यह राजपाल बड़ा शरारती निकला | उसके पिता जितने शरीफ़ थे वह उतना ही बदमाश साबित हुआ | ज्यों – ज्यों उसकी उम्र बढ़ती गई , त्यों – त्यों उसकी दुष्टता भी | हर साल वह कुछ न कुछ बुरी बातें सीखता जाता था | उसके पिता ने उस को बहुत कुछ समझाया – बुझाया | लेकिन उसने उनकी बातों पर कोई ध्यान न दिया | उस के पिता अमीर आदमी थे , इसलिए उसे रूपये – पैसे की कमी न थी | बस , वह रूपये पानी की तरह बहाने लगा | जहाँ रूपये – पैसे की कमी न हो वहांँ यार – दोस्तों की क्या कमी ? जिस तरह गुड़ की गंध पाते ही चीटियाँ जमा हो जाती है , उसी तरह पैसे वालों के पास यार – दोस्त भी अपना अड्डा जमा लेते है | इन यार लोगो ने राजपाल को दुनियांँ भर की बुरी लतें लगा दी | वह निधड़क शराब भी पीने लगा | रात – भर जुआ खेलता था | धीरे – धीरे उसकी सेहत बिगड़ने लगी पीला पड़ने लगा  दिन – दिन दुबला  हो चला | 

उस के पिता उस की यह हालत देखकर बड़े परेशान हुए | उन्होंने उसे अब तक कई बार समझाया – बुझाया था | लेकिन कभी जोर से डाँटा  – डपटा न था | वे सोचते थे – लड़का है , आगे चलकर खुद सुधर जाएगा |  पर जब उसके सुधरने का कोई लक्षण न दिख पड़ा और जब उसकी सेहत तेजी से बिगड़ने लगी , तब वे चुप न रह सके | एक दिन उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और खूब खरी – खोटी सुनाई | लेकिन राजपाल ने उनकी बातो की कोई परवाह न की | वह अपनी हरकतो से बाज नहीं आया | तब लाचार होकर उसके पिता ने रूपये – पैसे मिलने का रास्ता बंद कर दिया | उन्होंने ऐसा इंतजाम किया जिससे एक कानी – कौड़ी भी उसके हाथ न लगे | अब राजपाल के दिन बड़ी मुश्किल से कटने लगे | जब यारों ने देखा कि उसके पास रूपये – पैसे नहीं है तो वे उस से कतराने लगे | यहाँ तक कि कुछ ही दिनों में राजपाल को उस के सब दोस्तों ने छोड़ दिया | वह बिल्कुल अकेला पड़ गया | जब बाजार से घूम फिर कर घर आता तो पिता की डांट सुननी पड़ती | आखिर उसका जीना मुश्किल हो गया | एक रात सबकी आँख बचा कर वह घर से भाग निकला | 

सवेरे जब धर्मपाल उठा तो देखता क्या है कि लड़का लापता है | वह बहुत दुखी हुआ | उस के हृदय को बहुत चोट पहुँची | फिर भी पिता का प्यार कैसे छूटता ? उसने अपने नौकरों को बुलाया और उन्हें बहुत – सा रुपया देकर कहा – “देखो , राजपाल घर से भाग गया है | तुम लोग उसका पता लगा कर चुपचाप उसके पीछे हो जाओ |  तुम देखते रहो कि उसको किसी चीज़ की कमी या किसी तरह की तकलीफ न हो | “

नौकरो ने राजपाल का पता लगा लिया और वे उस के पीछे हो गए | राजपाल चलते – चलते एक गाँव में पंहुचा | उसे बड़े जोर की भूख लगी हुई थी | लेकिन पास एक कानी – कौड़ी भी न थी | जेबें बिलकुल खाली थीं | अब वह क्या करे ? उसके सामने ही मिठाई की एक दुकान थी | मिठाइयाँ देख कर उसके मुँह में पानी भर आया | उसने जा कर दूकानदार से पूछा – “क्यों भाई ! क्या थोड़ी – सी मिठाई मुझे दोगे !” 

” हाँ , हाँ , दूँगा क्यों नहीं? आओ, जितनी चाहिए खा लो !” – दूकानदार ने कहा | “पर मेरे पास तो एक कानी -कौड़ी भी नहीं !” राजपाल ने जवाब दिया | 

“कुछ परवाह नहीं , पैसे तुमसे मांगता कौन है ?” यह कह कर दूकानदार ने बड़े प्रेम से सभी मिठाइयाँ दी | राजपाल ने भर – पेट मिठाई खाई | फिर दूकानदार को धन्यवाद दे कर चलता बना | असल में वह दूकान धर्मपाल के नौकरो की थी | उन्होंने जब देखा कि राजपाल भूख से बेहाल है तो उन्होंने सामने ही एक मिठाई की दूकान खोल दी | 

दोपहर होते – होते राजपाल एक नदी के किनारे पहुँचा | नहीं लबालब भरी हुई थी | राजपाल यह नदी पार होना चाहता था | लेकिन पार हो तो कैसे ? इतने में उस पर से एक नाव आ गई | नाव वाले ने राजपाल को देखकर कहा – “आओ , हम तुम्हे उस पार उतार दे ! ” 

“पर मेरे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है ” राजपाल ने कहा | 

” कोई हर्ज़ नहीं |हम तुमसे पैसा नहीं मांगते ! ” उन्होंने कहा और राजपाल को पार उतार दिया | राजपाल ने उनको धन्यवाद दिया और अपनी राह ली| 

ये मल्लाह भी धर्मपाल के नौकर ही थे | जब उन्होंने देखा कि राजपाल को नदी पार करनी होगी तो उन्हों ने एक नाव किराए पर ले ली और राजपाल को पार उतर दिया | 

शाम होते – होते राजपल एक पहाड़ी के पास पंहुचा और धीरे – धीरे उस पर चढ़ने लगा | थोड़ी देर के बाद चढ़ते – चढ़ते वह बहुत थक गया और जब आगे न चढ़ा गया तो एक चट्टान पर बैठ गया | इतने में धर्मपाल के नौकर जो उसके पीछे पीछे आ रहे थे , एक डोली लेकर आए और बोले – “बाबू जी ! अगर आप बहुत थक गए हो तो आइए , इस डोली में बैठ जाइए | हम आप को ऊपर पहुंचा देंगे |” राजपाल ने फिर बताया कि वह कुछ पैसे न दे सकेगा | लेकिन डोली वालो ने इस की कुछ परवाह न की और उसे डोली पर चढ़ा लिया | 

इसी तरह बहुत दिनों तक धर्मपाल के नौकर राजपाल के पीछे लगे रहे और हमेशा उस की मदद करते रहे | आखिर राजपाल को शक हुआ कि “ये लोग कौन है जो कदम कदम पर आकर मेरी मदद करते है ? जरूर इसमें कोई न कोई रहस्य है !” यह सोच कर उसने एक बार अपनी मदद करने वालो से पूछा – ” आप लोग कौन है और क्यों बार बार मेरी मदद करते है ! ” तब नौकरो ने कहा – “हम लोग आप के पिता के नौकर हैं | आप को परदेश  में कोई तकलीफ न हो , इस ख्याल से उन्होंने हमें आप के पीछे भेज दिया है |”

नौकरो की ये बात सुनते ही राजपाल बहुत पछताया | उसे बड़ा अफ़सोस हुआ और उस ने अब अपनी चाल – चलन सुधारने का द्रृढ – निश्चय कर लिया | यह नौकरो के साथ – साथ तुरंत घर लौटा | घर पहुँचते ही वह पिता के पैरो पड़ गया और माफ़ी माँगी | 

उसने कहा – “पिता जी ! मुझे माफ़ कीजिए ! आज तक मैंने बहुत शरारतें कीं  | अब आगे से मैं आप का सच्चा सपूत बनूँगा |”

अपने इकलौते बेटे को राह पर आते देख धर्मपाल भी फूले न समाए | उन्होंने उसे उठा कर बड़े प्रेम से गले लगा लिया | 

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