एक  बार टिड्डी दल के प्रकोप से सारी फसल मारी गयी और देश में दूर-दूर तक अकाल  फ़ैल गया | लोग घर-वार छोड़ कर भोजन की तलाश में भटकने लगे | महृषि उषस्ति चाणक्य भी अपना घर-बार छोड़कर अपनी पत्नी के साथ भिक्षा मांगने निकल पड़े |

एक दिन भिक्षा के लिए भटकते -भटकते  वे महावतों के गांव में पहुंच. वहां एक महावत बैठा हुआ उड़द की दाल की खिचड़ी खा रहा था | उषस्ति चाणक्य ने उसके पास जाकर कहा  – “भूखा हूँ ,भिक्षा दो |”

महावत बोला – “भगवन ! यह जो खिचड़ी खा रहा हूँ , मेरे पास देने के लिए इसके सिवाए और कुछ भी नहीं हैं |”

उषस्ति बोले – “तो  इस खिचड़ी में से ही मुझे थोड़ी भिक्षा दे दो | “

तब  महावत ने अपनी झूठी खिचड़ी में से ही भिक्षा के रूप में थोड़ी-सी खिचड़ी उषस्ति को दे दी |

फिर महावत बोला – “लो , यह पानी भी ले लो | “

उत्तर  में उषस्ति ने कहा – “ये मैं नहीं  लूँगा , क्योँकि यह तुम्हारा जूठा  है | “

यह सुनकर महावत को सुनकर बड़ी हैरानी हुई | उसने तना देते हुए कहा – “क्या यह खिचड़ी मेरी झूठी  नहीं है | “

उषस्ति ने उत्तर दिया , “बेशक यह खिचड़ी तुम्हारी झूठी  है | परन्तु भोजन के लिए कोई  दूसरा यथार्थ इस समय सुलभ नहीं हैं | इधर भूख के कारण मेरे प्राणों पर आ बनी थी | अतः जीवन रक्षा के लिए मैंने यह झूठी खिचड़ी ग्रहण कर ली है |  परन्तु पीने के लिए शुद्ध जल का अभी कोई संकट नहीं है | इसलिए झूठा पानी लेने की मुझे कोई विवशता नहीं है | “

उषस्ति ने कुछ खिचड़ी स्वयं खा ली और बाकी ले जाकर पत्नी को दे दी |  उधर पत्नी को भी किसी ने थोड़ा-सा अन्न दे दिया था जिसे खाकर उसने अपनी भूख बुझा ली थी | अतः वह खिचड़ी उसने संभाल कर रख छोड़ी |

दुसरे दिन महृषि उषस्ति को समाचार मिला कि एक निकटवर्ती राजा ने एक विशाल यज्ञ का अनुष्ठान रचा है | उषस्ति ने अपनी पत्नी को भी यह समाचार सुनाया और उससे कहा की यदि वहां मैं किसी तरह ठीक समय पर वहां पहुंच जाऊं तो मुझे विश्वास है कि राजा मुझे भी यज्ञ -कार्य  में शामिल कर लेगा और मुझे अच्छी दक्षिणा  भी मिल जाएगी | परन्तु रास्ते में खाने के लिए कुछ मिले ,तभी मैं वहां तक पहुंच सकता हूँ | भूखे तो मुझसे सफर भी नहीं होगा |

पत्नी  बोली – “भगवन ! कल की आपकी लायी हुई खिचड़ी सुरक्षित रखी हुई हैं | उससे आप अपनी भूख शांत कर सकते है | “

उषस्ति ने वह खिचड़ी ली और राजा के यज्ञ में शामिल होने के लिए चल पड़ा |

वहां जाकर उसने देखा की यज्ञ मंडप बन चूका हैं | यजमान और  पुरोहित तथा अन्य कार्यकर्ता पहुंच चुके हैं और यज्ञ की सारी तैयारी पूरी हो  चुकी है |

उषस्ति ने यज्ञ के ब्राह्मण , होता ,अध्वर्यु और उद्गाता सबको बारी-बारी से लक्ष्य करके कहा कि यदि तुम लोगो ने यज्ञ के विधि-विधान में कही कोई त्रुटि कर दी , तो कहीं भी मुँह दिखाने के लायक नहीं रहोगे |

उषस्ति की बातों  को सुनकर वे सब डर गए और एक तरफ चुप होकर बैठ गए |

तभी राजा ने उषस्ति से कहा -“श्रीमान ! मैं आपका परिचय प्राप्त करना चाहता हूँ |”

उषस्ति ने उत्तर दिया – “मैं उषस्ति चाणक्य हूँ | “

यह सुनकर राजा बहुत प्रशन्न हुआ और बोला – “भगवन ! इस यज्ञ के लिए मैंने आपकी बहुत खोज कराई थी ,पर आपका कहीं कुछ पता नहीं लगा | जब आप नहीं मिले ,तभी  अन्य पंडितो को यज्ञ के लिए आमंत्रित किया |  यह मेरा सौभाग्य है की आप ठीक समय पर पधार गए | आपसे मेरी प्राथना हैं कि अब आप ही इस यज्ञ के समस्त कार्य-कलाप का सञ्चालन कीजिये | “

उषस्ति ने कहा  -“राजन ! यदि आपकी यही इच्छा है , तो मैं भी इसके लिए तैयार हूँ | पर मेरी एक शर्त हैं , वह शर्त यह है कि कुल जितनी दक्षिणा आप इन सब पंडितो को देंगे , उतनी ही दक्षिणा मुझे अकेले को देनी होगी | ये सब पंडित मेरे सहायक के रूप में कार्य करेंगे |”

राजा ने यह शर्त स्वीकार कर ली |

उषस्ति चाणक्य ने यज्ञ के समस्त कार्य-कलाप का संचालन किया और निश्चित समय पर यज्ञ विधि -विधान  सहित पूरा हो गया |  अन्त में महृषि उषस्ति चाणक्य ने राजा को आशीर्वाद दिया और अन्य पंडितो को भी स्नेहपूर्वक उनकी भूलों से अवगत कराया |

इस कथा में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि संकट की घड़ी में मनुष्य को क्या करना चाहिए |

अकाल के कारण उषस्ति को अपना घर-वार छोड़ना पड़ा ,भिक्षा मांग कर गुजारा करना पड़ा ,द्वार -द्वार भटकना पड़ा और विशेष होकर अन्त में एक दिन झूठी खिचड़ी के लिए भी हाथ फैलाना पड़ा | परन्तु उसने झूठा पानी लेने से इन्कार कर दिया अर्थात जीवन-रक्षा के लिए आपदधर्म के रूप में उसने जूठी खिचड़ी तो खाली, पर इतना विवेक उसमे अवस्य रहा कि अपने स्वाभिमान के रक्षा के लिए उसने जूठा पानी स्वीकार नहीं किया क्योंकि पानी का अकाल नहीं था |

यज्ञ की दक्षिणा के लिए पूर्वाग्रह भी उसी स्वाभिमान की निशानी है | विपत्ति में पड़  कर भी जो मनुष्य अपनी योग्यता और विद्या को प्रकट नहीं कर सकता वह भूखा ही मरता है | समय पर अपने व्यक्तित्व को उजागर करने के ही व्यक्ति सम्मान के साथ रोटी कमा सकता है , अन्यथा ऊँचे आदर्शो का भी पालन नहीं हो सकता | संकट के समय आपद्धर्म का पालन करके जीवन-रक्षा उचित है ,परन्तु आपदधर्म केवल संकट-काल के लिए ,सामान्य स्थितियों के लिए नहीं |

2 COMMENTS

  1. muhe apke is kahani ka yah line bahut hi jyada pasand aya hai

    “बेशक यह खिचड़ी तुम्हारी झूठी है | परन्तु भोजन के लिए कोई दूसरा यथार्थ इस समय सुलभ नहीं हैं | इधर भूख के कारण मेरे प्राणों पर आ बनी थी | अतः जीवन रक्षा के लिए मैंने यह झूठी खिचड़ी ग्रहण कर ली है | परन्तु पीने के लिए शुद्ध जल का अभी कोई संकट नहीं है | इसलिए झूठा पानी लेने की मुझे कोई विवशता नहीं है | “

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here