नवम अध्याय – राजविद्या-राजगुह्य-योग

[ गुह्य राजविद्या ]

श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्‌॥ १॥

śrī bhagavānuvāca
idaṅ tu tē guhyatamaṅ pravakṣyāmyanasūyavē.
jñānaṅ vijñānasahitaṅ yajjñātvā mōkṣyasē.śubhāt ৷৷ 9.1৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्री भगवान् ने कहा: मैं तुम्हे , क्योंकि तुम दोष-दृष्टि से रहित है, इसलिये गुह्य से भी गुह्य विज्ञान-सहित ज्ञान बतलाता हूँ जिसके जान लेने से तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे || १ ||

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्‌ ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्‌॥ २॥

rājavidyā rājaguhyaṅ pavitramidamuttamam.
pratyakṣāvagamaṅ dharmyaṅ susukhaṅ kartumavyayam ৷৷ 9.2 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( यह जो गुह्य से गुह्य रहस्य मैं बतलाने लगा हूँ ) यह विद्याओं में राजविद्या है , और गुह्य विद्याओं में अत्यंत गुह्य विद्या है | यह पवित्र विद्या है, अति उत्तम विद्या है , प्रत्यक्ष-फल देने वाली विद्या है, धर्म के अनुकूल विद्या है, साधन करने में बड़ी सुगम विद्या है ( परन्तु सुगम होने के कारण साधारण नहीं किन्तु ) अविनाशी विद्या है || २ ||

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥ ३॥

aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa.
aprāpya māṅ nivartantē mṛtyusaṅsāravartmani ৷৷ 9.3 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे परन्तप ! यह रहस्य एक ऐसा धर्म है, जिसे श्रद्धा न रखने वाले पुरुष नहीं पा सकते , और उसे न पा सकने के कारण मृत्युमय संसार के मार्ग में बार-बार लौट आते हैं || ३ ||

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः॥ ४॥

mayā tatamidaṅ sarvaṅ jagadavyaktamūrtinā.
matsthāni sarvabhūtāni na cāhaṅ tēṣvavasthitaḥ ৷৷ 9.4 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( मैं अव्यक्त हूँ फिर भी ) इस सारे संसार को मैंने अपने अव्यक्त रूप द्वारा व्याप्त किया हुआ है | मुझमें सब प्राणी स्थित हैं , निवास करते हैं , मैं उनमे स्थित नहीं हूँ , मैं उनमें निवास नहीं करता || ४ ||

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्‌ ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥ ५॥

na ca matsthāni bhūtāni paśya mē yōgamaiśvaram.
bhūtabhṛnna ca bhūtasthō mamātmā bhūtabhāvanaḥ ৷৷ 9.5 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( यद्यपि सब प्राणी मुझमें स्थित हैं ) तो भी सब प्राणी मुझ में स्थित नहीं हैं, देखो यह कैसी मेरी करनी है, कैसा योग-सामर्थ्य है ! मेरा आत्मा ( ममात्मा ) सब प्राणियों को उत्पन्न करने वाला ( भूत-भावनः ) है किन्तु फिर भी वह उनमें नहीं है , उनमें समाया हुआ ( भूतस्थ ) नहीं || ५ ||

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्‌ ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥ ६॥

yathā৷৷kāśasthitō nityaṅ vāyuḥ sarvatragō mahān.
tathā sarvāṇi bhūtāni matsthānītyupadhāraya ৷৷ 9.6 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिस प्रकार ( अपरिवर्तनशील ) आकाश में ( परिवर्तनशील ) प्रचण्ड वायु सदा स्थित रहती है , उसी प्रकार ये सब ( परिवर्तनशील )  प्राणी मुझ ( अपरिवर्तनशील ब्रह्म ) में निवास करते हैं — यह समझ लो || ६ ||

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्‌ ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्‌॥ ७॥

sarvabhūtāni kauntēya prakṛtiṅ yānti māmikām.
kalpakṣayē punastāni kalpādau visṛjāmyaham ৷৷ 9.7 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कुन्ती के पुत्र अरजुन ! सृष्टि के चक्र की समाप्ति पर सब भूत — जड़-चेतन — मेरी प्रकृति में समा जाते हैं और सृष्टि-चक्र के अगले चक्र के प्रारम्ब होने पर मैं ही फिर उनका सर्जन कर देता हूँ || ७ ||

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्‌॥ ८॥

prakṛtiṅ svāmavaṣṭabhya visṛjāmi punaḥ punaḥ.
bhūtagrāmamimaṅ kṛtsnamavaśaṅ prakṛtērvaśāt ৷৷ 9.8 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मैं अपनी ‘प्रकृति’ को , अपनी माया को हाथ में लेकर , ‘प्रकृति’ के, अपने स्वभाव के वश में रहने वाले परतन्त्र सम्पूर्ण भूतों के समुदाय को बार-बार उत्पन्न करता हूँ || ८ ||

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥ ९॥

na ca māṅ tāni karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya.
udāsīnavadāsīnamasaktaṅ tēṣu karmasu ৷৷ 9.9 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे धनञ्जय ! ये सब कर्म मुझे ( काम करते हुए भी ) बंधन में नहीं डालते क्योंकि मैं ( कर्म करता हुआ भी ) उन कर्मों में उदासीन के समान आसक्ति को छोड़कर बरतता हूँ || ९ ||

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥ १०॥

mayā.dhyakṣēṇa prakṛtiḥ sūyatē sacarācaram.
hētunā.nēna kauntēya jagadviparivartatē ৷৷ 9.10 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कुन्ती के पुत्र अर्जुन ! मेरी देख-रेख में यह प्रकति इस चर तथा अचर जगत को उत्पन्न करती है , ( क्योंकि मैं इसकी देख-रेख कर रहा हूँ ) इस कारण यह सारा संसार का चक्र घूम रहा है || १० ||

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्‌।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्‌॥ ११॥

avajānanti māṅ mūḍhā mānuṣīṅ tanumāśritam.
paraṅ bhāvamajānantō mama bhūtamahēśvaram ৷৷ 9.11 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मानव शरीर का जब मैं आश्रय लेता हूँ तब मूढ़ लोक मेरी अवज्ञा करते हैं , अवहेलना करते हैं ( कोई किसी को छोटा, किसी को बड़ा , किसी को चाण्डाल , किसी को ब्राह्मण कहता है | ऊँच-नीच का ऐसा भेदभाव करते हुए और मनुष्य-मनुष्य में अन्तर डालते हुए ये लोग ऐसा इसलिये करते हैं ) क्योंकि वे मेरी परम प्रकृति को, उच्चतर प्रकृति को, सब प्राणियों में मैं ही बस रहा हूँ, सब प्राणियों का मैं ही महेश्वर हूँ — मेरे इस रूप को नहीं जान रहे होते ( जो मेरे उच्चतर रूप को जान जाते हैं और यह समझते हैं कि मैं ही सब मनुष्यों में विविध रूप में शरीर धारण करता हूँ वे सब मनुष्यों को एक-सामान दृष्टि से देखते हैं ) || ११ ||

[ आसुरी प्रकृति ]

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥ १२॥

mōghāśā mōghakarmāṇō mōghajñānā vicētasaḥ.
rākṣasīmāsurīṅ caiva prakṛtiṅ mōhinīṅ śritāḥ ৷৷ 9.12 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( जो मेरे परम रूप को नहीं जानते ) उनकी आशा व्यर्थ , कर्म व्यर्थ , ज्ञान व्यर्थ जाता है , वे विवेकहीन होते हैं , वे मोह में दाल रखने वाली राक्षसी तथा आसुरी प्रकृति का आश्रय लिये होते हैं ( राक्षसी और आसुरी स्वभाव के कारण वे मेरे परम रूप को नहीं जान पाते ) || १२ ||

[ दैवी प्रकृति ]

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्यम्‌॥ १३॥

mahātmānastu māṅ pārtha daivīṅ prakṛtimāśritāḥ.
bhajantyananyamanasō jñātvā bhūtādimavyayam ৷৷ 9.13 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इसके विपरीत , हे पार्थ ! महात्मा लोग दैवी प्रकृति का ( दैवीय-स्वभाव का ) आश्रय लेकर , मुझे प्राणिमात्र का आदिकारण समझ कर , अनन्य चित्त से मुझ अनश्वर ( ब्रह्म ) की उपासना करते हैं || १३ ||

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥ १४॥

satataṅ kīrtayantō māṅ yatantaśca dṛḍhavratāḥ.
namasyantaśca māṅ bhaktyā nityayuktā upāsatē ৷৷ 9.14 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( दैवी प्रकृति के सत्त्वगुणी महात्मा लोग ) सदा मेरे कीर्तन करते हुए , गुणगान करते हुए , निरन्तर यत्न करते हुए , अपने निश्चय पर डेट हुए, नित्य मेरे साथ भक्ति की डोर में बंधे हुए , मेरी उपासना करते हैं || १४ ||

[ सब जगह ‘मैं-ही-मैं’ हूँ ]

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥ १५॥

jñānayajñēna cāpyanyē yajantō māmupāsatē.
ēkatvēna pṛthaktvēna bahudhā viśvatōmukham ৷৷ 9.15 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( इस ‘भक्ति-यज्ञ’ के अलावा ) दूसरे लोग ‘ज्ञान-यज्ञ’ से भजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं | बहुत करके कई लोग मेरी एकत्व रूप में, कई नाना रूप में उपासना करते हैं , मैं तो विश्वतोमुख हूँ , सब कहीं रहने वाला हूँ || १५ ||

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्‌ ।
मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्‌ ॥ १६॥

ahaṅ kraturahaṅ yajñaḥ svadhā.hamahamauṣadham.
maṅtrō.hamahamēvājyamahamagnirahaṅ hutam ৷৷ 9.16 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( भगवान् की लोग नाना रूपों में उपासना करते हैं परन्तु ) मैं ही श्रौत-यज्ञ ( क्रतु ) हूँ , मैं ही स्मार्त-यज्ञ ( यज्ञ ) हूँ ; मैं ही पितरों को दिया जाने वाला पिण्डदान ( स्वधा ) हूँ ; मैं ही अग्नि को दी जाने वाली औषधि ( सामग्री ) हूँ , मैं ही मंत्र हूँ, मैं ही घृत हूँ , मैं ही अग्नि हूँ , मैं ही आहुति हूँ || १६ ||

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥ १७॥

pitā.hamasya jagatō mātā dhātā pitāmahaḥ.
vēdyaṅ pavitramōṅkāra ṛk sāma yajurēva ca ৷৷ 9.17 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मैं इस जगत का पिता हूँ , माता हूँ , धारण करने वाला हूँ , पितामह हूँ , मैं ही जानने योग्य हूँ , मैं पवित्र ओंकार हूँ , ऋग-साम-यजुर्वेद मैं ही हूँ || १७ ||

गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌ ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌॥ १८॥

gatirbhartā prabhuḥ sākṣī nivāsaḥ śaraṇaṅ suhṛt.
prabhavaḥ pralayaḥ sthānaṅ nidhānaṅ bījamavyayam ৷৷ 9.18 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : गति मैं हूँ , पोषक मैं हूँ , प्रभु मैं हूँ , साक्षी मैं हूँ , निवास मैं हूँ , शरण मैं हूँ , सुहृद मैं हूँ , संसार की उत्पत्ति-विनाश-स्थिति मैं हूँ , मैं ही विश्राम का स्थान हूँ , अनश्वर बीज मैं हूँ || १८ ||

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्‌णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥ १९॥

tapāmyahamahaṅ varṣaṅ nigṛhṇāmyutsṛjāmi ca.
amṛtaṅ caiva mṛtyuśca sadasaccāhamarjuna ৷৷ 9.19 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मैं ही तपता हूँ , मैं ही वर्षा को रोक रखता और बरसने देता हूँ , मैं अमृत हूँ साथ ही मृत्यु भी मैं ही हूँ , मैं सत  भी हूँ , असत भी हूँ || १९ ||

[ कर्मकांडियों तथा भक्तिमार्गियों में भेद ]

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्‍वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्‌॥ २०॥

traividyā māṅ sōmapāḥ pūtapāpā yajñairiṣṭvā svargatiṅ prārthayantē.
tē puṇyamāsādya surēndralōkamaśnanti divyāndivi dēvabhōgān৷৷9.20৷৷

हिन्दी में भावार्थ : तीनों वेदों को जानने वाले , सोम-रस का पान करने वाले , पाप से रहित कर्मकांडी लोग यज्ञों द्वारा मेरी उपासना करते हुए स्वर्ग प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं | वे अपने पुण्य-कर्मों को लेकर इंद्रा-लोक में पहुँचते हैं , वहाँ द्युलोक में दिव्य देव-दुर्लभ भोगों को भोगते हैं || २० ||

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्य मर्त्यलोकं विशन्ति।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ २१॥

tē taṅ bhuktvā svargalōkaṅ viśālaṅ kṣīṇē puṇyē martyalōkaṅ viśanti.
ēva trayīdharmamanuprapannā gatāgataṅ kāmakāmā labhantē ৷৷ 9.21 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( परन्तु ) वे उस विशाल स्वर्ग-लोक का आनन्द भोग लेने के बाद , जब उनका संचित पुण्य क्षीण हो जाता है , समाप्त हो जाता है, तब फिर मर्त्य-लोक में आ जाते हैं | इस प्रकार तीनों वेदों की शरण में आने वाले ये कर्म-कांडी लोग कामनाओं की कामना करते रहने के कारण ( कामकामाः ) जन्म-मरण के चक्कर काटा करते हैं || २१ ||

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्‌ ॥ २२॥

ananyāśicantayantō māṅ yē janāḥ paryupāsatē.
tēṣāṅ nityābhiyuktānāṅ yōgakṣēmaṅ vahāmyaham ৷৷ 9.22 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( इसके विपरीत ) जो लोग अनन्य-भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं , मुझमें रत रहने वाले उन भक्तजनों के ‘योग-क्षेम’ का भार मैं उठाता हूँ || २२ ||

[ अन्य देवतोपासकों तथा भक्तिमार्गियों में भेद ]

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्‌॥ २३॥

yē.pyanyadēvatā bhaktā yajantē śraddhayā.nvitāḥ.
tē.pi māmēva kauntēya yajantyavidhipūrvakam ৷৷ 9.23 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कुन्ती के पुत्र अर्जुन ! जो भक्त अन्य देवताओं की भी श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं , वे भी मेरी ही पूजा करते हैं।  भले ही उनकी यह पूजा विधिपूर्वक नहीं होती ( विधिरहित होने पर भी वे मुझे ही भजते हैं ) || २३ ||

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥ २४॥

ahaṅ hi sarvayajñānāṅ bhōktā ca prabhurēva ca.
na tu māmabhijānanti tattvēnātaścyavanti tē ৷৷ 9.24 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : क्योंकि सब यज्ञों का , अर्थात सब प्रकार की पूजाओं का भोगने वाला , उनका स्वामी तो मैं ही हूँ | वे लोग मेरे सच्चे स्वरुप को नहीं पहचानते इसलिये गिर जाया करते हैं , विधि-रहित पूजा किया करते हैं || २४ ||

यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्‌॥ २५॥

yānti dēvavratā dēvān pitṛnyānti pitṛvratāḥ.
bhūtāni yānti bhūtējyā yānti madyājinō.pi mām ৷৷ 9.25 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : देवों की पूजा करने वाले देवों को , पितरों की पूजा करने वाले पितरों को , भूतों की पूजा करने वाले भूतों को और मेरी पूजा करने वाले मुझ को प्राप्त होते हैं || २५ ||

[ राजविद्या का साधन है — समर्पण ]

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ २६॥

patraṅ puṣpaṅ phalaṅ tōyaṅ yō mē bhaktyā prayacchati.
tadahaṅ bhaktyupahṛtamaśnāmi prayatātmanaḥ ৷৷ 9.26 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो-कोई मुझे भक्ति के साथ पट्टी, फूल, फल या थोड़ा-सा जल भी अर्पित करता है उस प्रयतचित्त अर्थात भक्ति-भाव से कुछ-न-कुछ करने की इच्छा वाले भक्त की भेंट को मैं ( प्रसन्नता से ) ग्रहण कर लेता हूँ || २६ ||

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्‌ ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्‌ ॥ २७॥

yatkarōṣi yadaśnāsi yajjuhōṣi dadāsi yat.
yattapasyasi kauntēya tatkuruṣva madarpaṇam ৷৷ 9.27 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कुन्ती के पुत्र अर्जुन ! तुम जो-कुछ करते हो ; जो कुछ खाते हो ; जो कुछ होम-हवन करते हो और जो कुछ भी दान में देते हो , जो कुछ तपस्या करते हो , उस सब को मुझे अर्पण करते हुए करो || २७ ||

शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्य से कर्मबंधनैः ।
सन्न्यासयोगमुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥ २८॥

śubhāśubhaphalairēvaṅ mōkṣyasē karmabandhanaiḥ.
saṅnyāsayōgayuktātmā vimuktō māmupaiṣyasi ৷৷ 9.28 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इस प्रकार बरतने से ( कर्म करके भी ) कर्मों के शुभ तथा अशुभ फल रुपी बन्धनों से तू मुक्त रहेगा | अपने मन को कर्मों के त्याग के मार्ग ( संन्यास-योग ) में दृढ़तापूर्वक लगाकर तुम मुक्त हो जाओगे और ‘मामुपैष्यसि’ — मुझे पा जाओगे || २८ ||

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्‌ ॥ २९॥

samō.haṅ sarvabhūtēṣu na mē dvēṣyō.sti na priyaḥ.
yē bhajanti tu māṅ bhaktyā mayi tē tēṣu cāpyaham ৷৷ 9.29 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मैं सब प्राणियों के लिये एक-सा हूँ | मुझे किसी से न द्वेष है, न प्रेम | जो भक्तिपूर्वक मुझे पूजते हैं वे मुझ में हैं और मैं उनमे हूँ || २९ ||

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्‌ ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥ ३०॥

api cētsudurācārō bhajatē māmananyabhāk.
sādhurēva sa mantavyaḥ samyagvyavasitō hi saḥ ৷৷ 9.30 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी व्यक्ति भी अनन्य भाव से मुझे भजता है तो उसे साधू ही मानना चाहिए क्योंकि उसने अच्छे ( मार्ग पर चलने का ) संकल्प कर लिया है || ३० ||

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥ ३१॥

kṣipraṅ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṅ nigacchati.
kauntēya pratijānīhi na mē bhaktaḥ praṇaśyati ৷৷ 9.31 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( जब दुराचारी व्यक्ति अनन्यभाव से मुझे भजता है तब ) वह जल्द ही धर्मात्मा बन जाता है , उसे चिरस्थायी शांति प्राप्ति हो जाती है | हे कुन्ती के पुत्र अर्जुन ! तुम निश्चित रूप से यह जान लो — ‘न मे भक्तः प्रणश्यति’ — मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता || ३१ ||

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम्‌॥ ३२॥

māṅ hi pārtha vyapāśritya yē.pi syuḥ pāpayōnayaḥ.
striyō vaiśyāstathā śūdrāstē.pi yānti parāṅ gatim ৷৷ 9.32 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे अर्जुन ! चाहे कोई निचले कुल में ही उत्पन्न क्यों न हुआ हो, अगर वह मेरी शरण में आ जाता है , चाहे स्त्रियाँ हों , वैश्य हों, शूद्र हों — वे भी परम गति को ( मोक्ष को ) प्राप्त करते हैं || ३२ ||

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्‌॥ ३३॥

kiṅ punarbrāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣayastathā.
anityamasukhaṅ lōkamimaṅ prāpya bhajasva mām ৷৷ 9.33 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( जब नीच कुल में उत्पन्न व्यक्ति भगवान् की शरण में आ जाने से परम गति को प्राप्त करते हैं ) तब पुण्यवान ब्राह्मणों और भक्त राजर्षियों की बात ही क्या ? यह संसार अनित्य है, दुखपूर्ण है , ( ऐसे अनित्य तथा दुखपूर्ण ) संसार को पाकर ( तुम्हारा कल्याण इसी में है कि ) तुम मेरा भजन करो || ३३ ||

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:॥ ३४॥

manmanā bhava madbhaktō madyājī māṅ namaskuru.
māmēvaiṣyasi yuktvaivamātmānaṅ matparāyaṇaḥ ৷৷ 9.34 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मुझ में मन लगाओ , मेरा भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे प्रणाम करो, इस प्रकार से अपने को मेरे साथ जोड़कर, ‘मत्परायण’ होकर तुम मुझे ही पाओगे || ३४ ||

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्री कृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराजगुह्ययोगो नाम नवमोऽध्यायः |

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