सप्तम अध्याय – ज्ञान-विज्ञान योग

[ ज्ञान-विज्ञानं द्वारा समग्र ईश्वर का ध्यान ]

श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १॥

śrī bhagavānuvāca
mayyāsaktamanāḥ pārtha yōgaṅ yuñjanmadāśrayaḥ.
asaṅśayaṅ samagraṅ māṅ yathā jñāsyasi tacchṛṇu ৷৷ 7.1 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्री भगवान ने कहा : हे पार्थ ! ( कर्मफल में मन को ‘आसक्त’ न करके ) मुझे में मन को ‘आसक्त’ करके , ( संसार के भौतिक पदार्थों का आश्रय न लेकर ) मेरा आश्रय लेकर, जिस योग ( भक्ति-योग) का अभ्यास करता हु , असंदिग्ध तौर पर जिस प्रकार तुम मुझे ‘समग्र’ अर्थात पूर्ण रूप से जान जाओगे — वह सुनो || १ ||

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥ २॥

jñānaṅ tē.haṅ savijñānamidaṅ vakṣyāmyaśēṣataḥ.
yajjñātvā nēha bhūyō.nyajjñātavyamavaśiṣyatē ৷৷ 7.2 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मैं तुम्हे यह सारा विज्ञान-सहित ज्ञान बतलाऊंगा जिसे जान लेने के बाद इस लोक में जानने को फिर और कुछ शेष नहीं रह जाता || २ ||

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः॥ ३॥

manuṣyāṇāṅ sahasrēṣu kaśicadyatati siddhayē.
yatatāmapi siddhānāṅ kaśicanmāṅ vētti tattvataḥ ৷৷ 7.3 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हजारों मनुष्यों में से कोई-एक योग की सिद्धि के लिए यत्न करता है और जो लोग यत्न करते हुए योग की सिद्धि कर लेते हैं , उनमें से कोई-एक ही मुझे तात्विक रूप में जान पाता है || ३ ||

[ जगत में ईश्वर का स्वरुप तथा उसका दर्शन ]

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहङ्‍कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ ४॥

bhūmirāpō.nalō vāyuḥ khaṅ manō buddhirēva ca.
ahaṅkāra itīyaṅ mē bhinnā prakṛtiraṣṭadhā ৷৷ 7.4 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार – मेरा रूप ( मेरी प्रकृति ) इन आठ में बँटा हुआ है , विभक्त है || ४ ||

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्‌ ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्‌॥ ५॥

aparēyamitastvanyāṅ prakṛtiṅ viddhi mē parām.
jīvabhūtāṅ mahābāhō yayēdaṅ dhāryatē jagat ৷৷ 7.5 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : यह आठ प्रकार के भेदों  वाला मेरा ‘अपर’ रूप है, जड़ रूप है | हे महाबाहु ! मेरे ‘पर’ रूप को, चेतन (जीव ) रूप को भी जान लो जो ‘अपर’ रूप से भिन्न है और जिसके द्वारा यह संसार धारण किया जाता है || ५ ||

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥ ६॥

ētadyōnīni bhūtāni sarvāṇītyupadhāraya.
ahaṅ kṛtsnasya jagataḥ prabhavaḥ pralayastathā ৷৷ 7.6 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : संसार के सब प्राणी इन दोनों से ( जड़ प्रकृति तथा चेतन जीव से ) उत्पन्न होते हैं — यह समझ ले और मैं इस सम्पूर्ण जगत का ‘प्रभव’ अर्थात मूल हूँ, मैं ही इस सम्पूर्ण जगत का ‘प्रलय’ हूँ, अर्थात अन्त हूँ | ( इस जड़-चेतन का अधिष्ठाता मैं हूँ ; जैसे शरीर में आत्मा है, वह वह शरीर का अधिष्ठाता है, वैसे इस जड़-चेस्टन जगत का परमेश्वर अधिष्ठाता है ; जैसे आत्मा का दर्शन इस शरीर द्वारा ही होता है, वैसे परमात्मा का दर्शन इस जड़-चेतनमयी सृष्टि द्वारा ही होता है ) || ६ ||

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥ ७॥

mattaḥ parataraṅ nānyatkiñcidasti dhanañjaya.
mayi sarvamidaṅ prōtaṅ sūtrē maṇigaṇā iva ৷৷ 7.7 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे धनंजय ! ( मैं इस जड़-चेतन का प्रभव तथा प्रलय हूँ ), मुझ से परे अन्य कोई वस्तु नहीं है | जो-कुछ भी संसार में यह-सब है, वह-सब मुझ में उसी प्रकार पिरोया हुआ है जैसे मणियाँ धागे में पिरोई रहती हैं || ७ ||

bhagwat geeta chapter 7 in hindi

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥ ८॥

rasō.hamapsu kauntēya prabhāsmi śaśisūryayōḥ.
praṇavaḥ sarvavēdēṣu śabdaḥ khē pauruṣaṅ nṛṣu ৷৷ 7.8 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कुन्ती  के पुत्र अर्जुन ! जलों में रस , मैं हूँ , चन्द्र तथा सूर्य की प्रभा मैं हूँ , सब वेदों में ओंकार मैं हूँ, आकाश में शब्द मैं हूँ , पुरुषों में पौरुष मैं हूँ || ८ ||

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥ ९॥

puṇyō gandhaḥ pṛthivyāṅ ca tējaścāsmi vibhāvasau.
jīvanaṅ sarvabhūtēṣu tapaścāsmi tapasviṣu ৷৷ 7.9 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : पृथ्वी में सुगन्ध मैं हूँ , अग्नि में तेज मैं हूँ , सब प्राणियों में जीवन मैं हूँ, तपस्वियों में तप मैं हूँ || ९ ||

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्‌ ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌॥ १०॥

bījaṅ māṅ sarvabhūtānāṅ viddhi pārtha sanātanam.
buddhirbuddhimatāmasmi tējastējasvināmaham ৷৷ 7.10 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पार्थ ! सब वस्तुओं का सनातन बीज मुझे समझो | बुद्धिमानों की बुद्धि मैं हूँ , तेजस्वियों का तेज मैं हूँ || १० ||

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्‌ ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥ ११॥

balaṅ balavatāmasmi kāmarāgavivarjitam.
dharmāviruddhō bhūtēṣu kāmō.smi bharatarṣabha ৷৷ 7.11 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : बलवानों का ‘काम’ और ‘राग’ से रहित बल मैं हूँ| हे भरत-कुल में श्रेष्ठ अर्जुन ! मैं सब प्राणियों में धर्म के विरुद्ध न रहने वाली लालसा हूँ || ११ ||

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२॥

yē caiva sāttvikā bhāvā rājasāstāmasāśca yē.
matta ēvēti tānviddhi natvahaṅ tēṣu tē mayi ৷৷ 7.12 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : और जो सात्त्विक , राजस तथा तामस ‘भाव’ हैं ( भाव अर्थात मनुष्य की प्रकृति-किसी की सात्त्विक प्रकृति होती है , सत्त्वगुण से उत्पन्न होने वाली; किसी की राजस , रजोगुण से उत्पन्न होने वाली , किसी की तामस तमोगुण से उत्पन्न होने वाली प्रकृति है ) – ये सब केवल मुझसे ही प्रकट होते हैं , मैं उनमे नहीं हूँ, वे मुझ में हैं || १२ ||

[ प्रकृति के गुणों के कारण भ्रम अर्थात मोह ]

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्‌ ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्‌॥ १३॥

tribhirguṇamayairbhāvairēbhiḥ sarvamidaṅ jagat.
mōhitaṅ nābhijānāti māmēbhyaḥ paramavyayam ৷৷ 7.13 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( यद्यपि प्रकृति के सत्व, रज , तम — ये तीन गुण मेरे कारण ही टिके हुए हैं तो भी ) यह सारा जगत प्रकृति के इन तीन गुणों को ही सब-कुछ समझ कर, इनके द्वारा भ्रम में पड़ कर मुझे नहीं पहचान पाता | ( इसलिये नहीं पहचान पाटा क्योंकि ) मैं इन तीन गुणों से परे हूँ और अविनाशी हूँ | ( और मनुष्य की दृष्टि इन तीन गुणों तक ही सीमित रह कर आगे नहीं जा पाती ) || १३ ||

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४॥

daivī hyēṣā guṇamayī mama māyā duratyayā.
māmēva yē prapadyantē māyāmētāṅ taranti tē ৷৷ 7.14 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : यह ( तीन गुणों वाली ) गुणमयी ( प्रकृति ) मेरी दैवी माया है ( दिव्य गुणों के कारण यह ‘दैवी’ है , अलौकिक है ) | इसका पार पाना कठिन है | जो लोग केवल मेरी शरण में आ जाते हैं वे इस माया ( रुपी नदी को ) पार कर जाते हैं || १४ ||

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५॥

na māṅ duṣkṛtinō mūḍhāḥ prapadyantē narādhamāḥ.
māyayāpahṛtajñānā āsuraṅ bhāvamāśritāḥ ৷৷ 7.15 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : परन्तु माया से जिनकी बुद्धि हर ली जाती है, जिन्होंने आसुरी भाव धारण कर लिया है, बुरे काम करने वाले मूर्ख , नराधम लोग मेरी शरण में नहीं आते ( इसलिये वे माया रुपी नदी को पार भी नहीं कर पाते ) || १५ ||

[ भक्तों के चार प्रकार ]

जो भगवान् की शरण में आ जाते हैं उनका वर्णन करते हुए गीता ने शरणागत भक्तों के चार प्रकार बतलाये हैं :

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६॥

caturvidhā bhajantē māṅ janāḥ sukṛtinō.rjuna.
ārtō jijñāsurarthārthī jñānī ca bharatarṣabha ৷৷ 7.16 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे भरत-कुल में श्रेष्ट अर्जुन ! चार प्रकार के सुकर्मी मेरी भक्ति करते हैं | वे हैं – आर्त ( दुःखी ), जिज्ञासु, अर्थार्थी ( प्रत्येक बात में अर्थ देखने वाला ) तथा ज्ञानी || १६ ||

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥ १७॥

tēṣāṅ jñānī nityayukta ēkabhakitarviśiṣyatē.
priyō hi jñāninō.tyarthamahaṅ sa ca mama priyaḥ ৷৷ 7.17 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : उन सब में ज्ञानी व्यक्ति, जो सदा ब्रह्म के साथ युक्त रहता है, जो एक-भक्ति है, अनन्य-भक्ति वाला है, सब से विशिष्ट है, सब से श्रेष्ठ है क्योंकि मैं इस प्रकार के ज्ञानी भक्त को अत्यन्त प्रिय हूँ , और वह मुझे अत्यंत प्रिय है || १७ ||

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्‌ ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्‌॥ १८॥

udārāḥ sarva ēvaitē jñānī tvātmaiva mē matam.
āsthitaḥ sa hi yuktātmā māmēvānuttamāṅ gatim ৷৷ 7.18 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वैसे तो उक्त सभी श्रेष्ठ हैं, परन्तु ज्ञानी को तो मैं अपना आत्मा ही मानता हूँ क्योंकि वह अपनी आत्मा को मेरे साथ युक्त करके, जोड़ कर, मुझ में स्थित हो कर अति उत्तम गति को पाता है || १८ ||

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥ १९॥

bahūnāṅ janmanāmantē jñānavānmāṅ prapadyatē.
vāsudēvaḥ sarvamiti sa mahātmā sudurlabhaḥ ৷৷ 7.19 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अनेक जन्मों के अनन्तर यह अनुभव हो जाने से कि – “जो-कुछ है सब वासुदेव ही है ” – ज्ञानवान मुझे पा लेता है | ऐसा महात्मा अत्यन्त कठिनता से मिलता है | ( ‘वासुदेव’ का अर्थ है — ‘सर्वभूताधिवासश्च वसुदेवस्ततो ह्यहम’ – ‘ मैं सब प्राणियों में वास करता हूँ इसलिये मेरा नाम वासुदेव है ‘ ) || १९ ||

[ ईश्वर के अतिरिक्त अन्य देवताओं के उपासक ]

जो अपने को भगवान् के अर्पण नहीं करते , उन्हीं की भक्ति में सराबोर नहीं रहते , वे भगवान् के अतिरिक्त भिन्न-भिन्न कामनाओं की पूर्ति के उद्देश्य से अन्य देवताओं की उपासना में लगे रहते हैं | कामनाओं की पूर्ति के उद्देश्य से भगवान् के अतिरिक्त अन्य देवताओं के उपासकों के विषय में गीता में कहा है : —

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥ २०॥

kāmaistaistairhṛtajñānāḥ prapadyantē.nyadēvatāḥ.
taṅ taṅ niyamamāsthāya prakṛtyā niyatāḥ svayā ৷৷ 7.20 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अपनी-अपनी प्रकृति अर्थात स्वभाव के अनुसार प्रेरित हुए-हुए , भिन्न-भिन्न कामनाओं के कारण जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे भिन्न-भिन्न नियमों का आश्रय लेकर ( भगवान् के अतिरिक्त ) अन्य देवताओं की उपासना करते हैं | ( अमुक कामना अमुक नियम के अनुसार पूरी होनी चाहिए – इस खडपच में पड़कर लोग भगवान् में दिल लगाने के स्थान में कामनाओं को पूर्ण करने वाले देवताओं की उपासना करने लगते हैं और संसार में भिन्न-भिन्न मतवादों को खड़ा कर देते हैं ) || २० ||

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्‌ ॥ २१॥

yō yō yāṅ yāṅ tanuṅ bhaktaḥ śraddhayārcitumicchati.
tasya tasyācalāṅ śraddhāṅ tāmēva vidadhāmyaham ৷৷ 7.21 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो-जो भक्त श्रद्धापूर्वक जिस-जिस देवता के रूप की पूजा करना चाहता है मैं देवता के उस-उस रूप में उसकी श्रद्धा को अचल बना देता हूँ || २१ ||

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्‌॥ २२॥

sa tayā śraddhayā yuktastasyārādhanamīhatē.
labhatē ca tataḥ kāmānmayaiva vihitān hi tān ৷৷ 7.22 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ऐसा भक्त उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की आराधना करना चाहता है और उससे ही वह अपनी कामनाओं को पा जाता है , परन्तु वास्तव में उन कामनाओं को मैं ही पूर्ण कर रहा होता हूँ || २२ ||

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्‌ ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३॥

antavattu phalaṅ tēṣāṅ tadbhavatyalpamēdhasām.
dēvāndēvayajō yānti madbhaktā yānti māmapi ৷৷ 7.23 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : परन्तु इन अलप-बुद्धि वालों को जो फल मिलता है वह नाशवान होता है | देवताओं की पूजा करने वाले लोग देवताओं को पाते हैं किन्तु मेरे भक्त मेरे ही पास पहुँचते हैं || २३ ||

[ अज्ञान के कारण ईश्वर के विषय में भ्रम ]

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्‌ ॥ २४॥

avyaktaṅ vyakitamāpannaṅ manyantē māmabuddhayaḥ.
paraṅ bhāvamajānantō mamāvyayamanuttamam ৷৷ 7.24 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : बुद्धि-हीन लोग मुझ अव्यक्त को ( देवताओं के रूप में ) व्यक्ति हुआ मानने लगते हैं ( तभी वे भगवान् की भिन्न-भिन्न देवताओं के रूप में, व्यक्ति रूप में उपासना करते हैं ) | मेरे परम अविनाशी और जिसके सम्मुख दूसरा कोई उत्तम नहीं है ऐसे रूप को न जानते हुए ( वे ऐसा करते हैं ) || २४ ||

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्‌॥ २५॥

nāhaṅ prakāśaḥ sarvasya yōgamāyāsamāvṛtaḥ.
mūḍhō.yaṅ nābhijānāti lōkō māmajamavyayam ৷৷ 7.25 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मैं अपनी योग-माया से ढके रहने के कारण सबको प्रकट रूप में प्रकाशित नहीं होता | योग-माया से ढके रहने के कारण यह मूढ़ मनुष्य मुझ अज तथा अव्यय को नहीं पहचानता || २५ ||

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ २६॥

vēdāhaṅ samatītāni vartamānāni cārjuna.
bhaviṣyāṇi ca bhūtāni māṅ tu vēda na kaścana ৷৷ 7.26 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे अर्जुन ! ( मुझे तो मूढ़ मनुष्य नहीं पहचान पाते , परन्तु ) मैं उन सब प्राणियों को जानता हूँ जो अतीत में हो चुके हैं , जो इस समय विद्यमान हैं और जो भविष्य में होने वाले हैं ; मुझे कोई नहीं जानता || २६ ||

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥ २७॥

icchādvēṣasamutthēna dvandvamōhēna bhārata.
sarvabhūtāni saṅmōhaṅ sargē yānti parantapa ৷৷ 7.27 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे भारत ! हे परंतप ! इस संसार में इच्छा तथा द्वेष से उत्पन्न होने वाले सुख-दुःखादि द्वंद्वों के मोह से सब प्राणी भ्रम में फँसे रहते हैं ( और मेरा ध्यान करने के स्थान में संसार के विषयों में उलझे रहते हैं ) || २७ ||

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्‌ ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ २८॥

yēṣāṅ tvantagataṅ pāpaṅ janānāṅ puṇyakarmaṇām.
tē dvandvamōhanirmuktā bhajantē māṅ dṛḍhavratāḥ ৷৷ 7.28 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : परन्तु जिन पुण्यात्मा मनुष्यों के पाप का अन्त हो गया है , वे सुख-दुःखादि द्वन्द्वों के मोह से , भ्रम से मुक्त हो कर दृढ़-व्रत होकर मेरी भक्ति करते हैं || २८ ||

[ ज्ञान के कारण मोक्ष-प्राप्ति ]

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्‌॥ २९॥

jarāmaraṇamōkṣāya māmāśritya yatanti yē.
tē brahma tadviduḥ kṛtsnamadhyātmaṅ karma cākhilam ৷৷ 7.29 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो लोग मेरा आश्रय लेकर, मेरी शरण में आकर, जरा तथा मरण से मुक्ति पाने के  लिये , जन्म तथा मृत्य से छुटकारा पाने का यत्न करते हैं वे ब्रह्म को , सम्पूर्ण अध्यात्मज्ञान को और अखिल कर्म के रहस्य को जान जाते हैं || २९ ||

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥ ३०॥

sādhibhūtādhidaivaṅ māṅ sādhiyajñaṅ ca yē viduḥ.
prayāṇakālē.pi ca māṅ tē viduryuktacētasaḥ ৷৷ 7.30 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : और जो अधिभूत , अधिदेव  तथा अधियज्ञ सहित मुझे जान जाते हैं वे भगवान् के साथ युक्त-चित्त होने वाले मृत्यु के समय भी मेरा ही स्मरण करते हैं || ३० ||

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः |

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