षष्ठ अध्याय – ध्यान-योग या आत्म-संयम-योग

[ कर्म-योगी तथा ज्ञान-योगी एक ही हैं ]

श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥॥ १॥

śrī bhagavānuvāca
anāśritaḥ karmaphalaṅ kāryaṅ karma karōti yaḥ.
sa saṅnyāsī ca yōgī ca na niragnirna cākriyaḥ ৷৷ 6.1৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्री भगवन ने कहा : जो व्यक्ति अपने कर्त्तव्य-कर्म को करते हुए कर्म-फल पर आश्रित नहीं रहता (कर्म-फल मिलेगा, इस आशा में कर्म नहीं करता अपितु यह उसका कर्त्तव्य है, यह समझ कर करता है ), वह सन्यासी भी है, योगी भी है | यह समझना कि जिसने अग्निहोत्र आदि कर्मों को छोड़ दिया या जिसने सब कर्म छोड़ दिये, निठल्ला बैठ गया, वह सन्यासी है, वह ही योगी है — यह गलत है || १ ||

यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्‍कल्पो योगी भवति कश्चन॥ २॥

yaṅ saṅnyāsamiti prāhuryōgaṅ taṅ viddhi pāṇḍava.
na hyasaṅnyastasaṅkalpō yōgī bhavati kaścana ৷৷ 6.2 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पांडव! जिसे ‘ज्ञान-योग’ (संन्यास ) कहते हैं, उसी को ‘कर्म-योग’ समझो क्योंकि ( जैसे संन्यासी सब संकल्पों को, फल की आशाओं को, कर्म का त्याग करके छोड़ देता है वैसे ) कोई भी कर्म-योगी जब तक संकल्प का, फल की आशा का त्याग नहीं करता, तब तक वह कर्म-योगी नहीं होता || २ ||

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३॥

ārurukṣōrmunēryōgaṅ karma kāraṇamucyatē.
yōgārūḍhasya tasyaiva śamaḥ kāraṇamucyatē ৷৷ 6.3 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जब साधक ‘कर्म-योग’ के लक्ष्य को पाने के लिये ऊपर चढ़ रहा होता है तब उसका साधन ‘कर्म’ होता है, जब वह लक्ष्य पर आरूढ़ हो जाता है, वहाँ तक पहुंच जाता है तब ( वहाँ टिके रहने का ) साधन ‘शम’ अर्थात शांति होता है || ३ ||

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते॥ ४॥

yadā hi nēndriyārthēṣu na karmasvanuṣajjatē.
sarvasaṅkalpasaṅnyāsī yōgārūḍhastadōcyatē ৷৷ 6.4 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( तो मुनि ‘योगारूढ़’ कब कहलाता है ? ) जब कोई मनुष्य इन्द्रियों के विषयों में या कर्मों में आसक्त नहीं रहता, सब संकल्पों को त्याग देता है, तब उसे ‘योगारूढ़’ कहते हैं ( अर्थात वह व्यक्ति ‘कर्म-योग’ की ऊपर की मंजिल पर चढ़ गया ) || ४ ||

[ आत्मोद्धार ]

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌ ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ ५॥

uddharēdātmanā৷৷tmānaṅ nātmānamavasādayēt.
ātmaiva hyātmanō bandhurātmaiva ripurātmanaḥ ৷৷ 6.5 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मनुष्य को चाहिए कि वह अपना उद्धार अपने-आप ही करे , अपने-आपको कभी नीचे न गिरने दे | मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है, स्वयं ही अपना शत्रु है || ५ ||

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्‌॥ ६॥

bandhurātmā৷৷tmanastasya yēnātmaivātmanā jitaḥ.
anātmanastu śatrutvē vartētātmaiva śatruvat ৷৷ 6.6 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिसने अपने आत्मा से अपने को ( अपने मन को ) जीत लिया है , उसका आत्मा उसका मित्र है : जो ‘अनात्मा’ है — जिसने अपने आत्मा से अपने मन को नहीं जीता , वह अपने ही साथ शत्रु का-सा बर्ताव करता है || ६ ||

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥ ७॥

jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ.
śītōṣṇasukhaduḥkhēṣu tathā mānāpamānayōḥ ৷৷ 6.7 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिसने आत्मा अर्थात अपने मन को जीत लिया है , जो संपूर्ण रूप से शान्त हो गया है , उसका ‘परम-आत्मा’ सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख, मान-अपमान में सम रहता है , एक-सरीखा रहता है ( उसमे क्षोभ नहीं पैदा होता ) || ७ ||

ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः॥ ८॥

jñānavijñānatṛptātmā kūṭasthō vijitēndriyaḥ.
yukta ityucyatē yōgī samalōṣṭāśmakāñcanaḥ ৷৷ 6.8 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिसका आत्मा ज्ञान तथा विज्ञान से तृप्त है, जो कूटस्थ है, अपरिवर्तनशील है, जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत  लिया है , जिसके लिये मिट्टी का ढेला , पत्थर और सुवर्ण एक-समान हैं, ऐसे कर्म-योगी को ‘युक्त’ अर्थात भगवान में जुड़ा हुआ कहा जाता है || ८ ||

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९॥

suhṛnmitrāryudāsīnamadhyasthadvēṣyabandhuṣu.
sādhuṣvapi ca pāpēṣu samabuddhirviśiṣyatē ৷৷ 6.9 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष योग्य , बंधु , साधू तथा पापी – इन सब में जो सम-बुद्धि रखता है , उसे विशेष व्यक्ति ही समझना चाहिए || ९ ||

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥ १०॥

yōgī yuñjīta satatamātmānaṅ rahasi sthitaḥ.
ēkākī yatacittātmā nirāśīraparigrahaḥ ৷৷ 6.10 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : योगी की चाहिए कि एकान्त में अकेला बैठकर , अपने चित्त तथा आत्मा को वश में रखकर, वासना से रहित होकर , परिग्रह की भावना को छोड़कर , अपने मन को परमात्मा के साथ लगातार जोड़े || १० ||

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्‌॥ ११॥

śucau dēśē pratiṣṭhāpya sthiramāsanamātmanaḥ.
nātyucchritaṅ nātinīcaṅ cailājinakuśōttaram ৷৷ 6.11 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : स्वच्छ स्थान पर अपना स्थिर आसान बिछा कर, ऐसी जगह जो न अधिक ऊँची हो, न अधिक नीची हो, और आसन पर पहले कुशा, मृगछाला और उस पर वस्त्र बिछाकर || ११ ||

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥ १२॥

tatraikāgraṅ manaḥ kṛtvā yatacittēndriyakriyaḥ.
upaviśyāsanē yuñjyādyōgamātmaviśuddhayē ৷৷ 6.12 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वहां मन को एकाग्र कर, चित्त तथा इन्द्रियों की क्रियाओं को रोक कर , आसन पर बैठकर आत्म-शुध्दि अर्थात अन्तःकरण या मन की शुद्धि के लिये योग में जुट जाय || १२ ||

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌॥ १३॥

samaṅ kāyaśirōgrīvaṅ dhārayannacalaṅ sthiraḥ.
saṅprēkṣya nāsikāgraṅ svaṅ diśaścānavalōkayan ৷৷ 6.13 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अपनी पीठ , सर और गर्दन को सीधा अर्थात एक सीध में तथा अचल रखकर अर्थात बिना हिले-डुले , स्थिर होता हुआ, नासा के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर , अन्य किसी दिशा में न देखते हुए || १३ ||

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥ १४॥

praśāntātmā vigatabhīrbrahmacārivratē sthitaḥ. manaḥ saṅyamya maccittō yukta āsīta matparaḥ ৷৷ 6.14 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : प्रशान्त मन वाला , भय से रहित, ब्रह्मचर्य के व्रत में टिका हुआ , मन का संयम करके , मुझ में ही चित्त गाड़कर, मत्परायण होकर, मुझ से सम्बन्ध जोड़कर बैठ जाए || १४ ||

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥ १५॥

yuñjannēvaṅ sadā৷৷tmānaṅ yōgī niyatamānasaḥ.
śāntiṅ nirvāṇaparamāṅ matsaṅsthāmadhigacchati ৷৷ 6.15 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वश में किए हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरंतर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्ति को प्राप्त होता है || १५||

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥ १६॥

nātyaśnatastu yōgō.sti na caikāntamanaśnataḥ.
na cātisvapnaśīlasya jāgratō naiva cārjuna ৷৷ 6.16 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है || १६||

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ १७॥

yuktāhāravihārasya yuktacēṣṭasya karmasu.
yuktasvapnāvabōdhasya yōgō bhavati duḥkhahā ৷৷ 6.17 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है || १७ ||

[ ध्यान-योगी या योग-युक्त के लक्षण — समाधि अवस्था ]

जैसे द्वितीय अध्याय ( ५४-७१) में ‘स्थित-प्राज्ञ’ के लक्षण कहे हैं, जैसे पंचम अध्याय (१८-२८) में ‘कर्म-योगी’ के लक्षण कहे गए हैं , वैसे ही छठे अध्याय में १८वें श्लोक से ‘ध्यान-योगी’ के लक्षण कहे गए हैं | वे लक्षण क्या हैं ?

यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ॥ १८॥

yadā viniyataṅ cittamātmanyēvāvatiṣṭhatē.
niḥspṛhaḥ sarvakāmēbhyō yukta ityucyatē tadā ৷৷ 6.18 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जब  अपने वश में किया हुआ चित्त केवल आत्मा में स्थित हो जाता है तब वह सब कामनाओं से निस्पृह हो जाता है ( उसे किसी कामना की आकांक्षा नहीं रहती ) , ऐसे व्यक्ति को ‘युक्त’ कहा जाता है ( युक्त अर्थात ध्यान से युक्त — ध्यान-योगी ) || १८ ||

यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ १९॥

yathā dīpō nivātasthō nēṅgatē sōpamā smṛtā.
yōginō yatacittasya yuñjatō yōgamātmanaḥ ৷৷ 6.19 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिस प्रकार वायु-रहित स्थान में पड़ा हुआ दीपक काँपता नहीं है — यह उपमा उस योगी की मणि गयी है जिसका चित्त वश में है , और जो आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ने का उद्योग कर रहा है || १९ ||

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥ २०॥

yatrōparamatē cittaṅ niruddhaṅ yōgasēvayā.
yatra caivātmanā৷৷tmānaṅ paśyannātmani tuṣyati ৷৷ 6.20 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिस अवस्था में पहुंचकर , योग के अभ्यास द्वारा, चित्त निरुद्ध और उपराम को पा जाता है , जिस अवस्था में ( अपने ) के द्वारा ही आत्मा (परमात्मा) को पहचान कर अपने में संतोष पाता है | ( यहाँ चित्त-निरोध शब्द पातंजल योग-दर्शन के ‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः’ का स्मरण करता है ) || २० ||

सुखमात्यन्तिकं यत्तद्‍बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्‌ ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥ २१॥

sukhamātyantikaṅ yattadbuddhigrāhyamatīndriyam.
vētti yatra na caivāyaṅ sthitaścalati tattvataḥ ৷৷ 6.21 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिस अवस्था में पहुंचकर अतीन्द्रिय ( इन्द्रियों से प्राप्त न होने वाले ) किन्तु बुद्धिग्राह्य ( बुद्धि से प्राप्त होने वाले ) अत्यधिक ( परम ) सुख को अनुभव करता है , और जिस अवस्था में स्थित होकर यह अपने तत्व से ( अपने मूल से ) चलायमान नहीं होता, डिगता नहीं  || २१ ||

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥ २२॥

yaṅ labdhvā cāparaṅ lābhaṅ manyatē nādhikaṅ tataḥ.
yasminsthitō na duḥkhēna guruṇāpi vicālyatē ৷৷ 6.22 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिसे पा जाने पर यह समझता है कि इससे बड़ा दूसरा कोई लाभ नहीं है , और जिसमें स्थित हो जाने पर यह बड़े-से-बड़े दुःख से विचलित नहीं होता  || २२ ||

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥ २३॥

taṅ vidyād duḥkhasaṅyōgaviyōgaṅ yōgasaṅjñitam.
sa niścayēna yōktavyō yōgō.nirviṇṇacētasā ৷৷ 6.23 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : उसकी योग संज्ञा समझो ( उसका नाम योग है ) | योग है दुःख के साथ जो हमारा संयोग है उससे अलग हो जाना — ‘दुःख-संयोग का वियोग’ | इस योग का अभ्यास बिना ऊबे और दृढ संकल्प से करना चाहिए  || २३ ||

सङ्‍कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥ २४॥

saṅkalpaprabhavānkāmāṅstyaktvā sarvānaśēṣataḥ.
manasaivēndriyagrāmaṅ viniyamya samantataḥ ৷৷ 6.24 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : संकल्प से उत्पन्न होने वाली सब कानमाओं का पूर्ण रूप से त्याग करके , मन से ही सब इन्द्रियों को सब ओर से नियम में लाकर ( वश में करके)  || २४ ||

शनैः शनैरुपरमेद्‍बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌ ॥ २५॥

śanaiḥ śanairuparamēd buddhyā dhṛtigṛhītayā.
ātmasaṅsthaṅ manaḥ kṛtvā na kiñcidapi cintayēt ৷৷ 6.25 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : धैर्ययुक्त बुद्धि से धीरे-धीरे शांत होता जाय और मन को आत्मा में पिरोकर अन्य किसी वस्तु का भी विचार न करे  || २५ ||

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्‌ ।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्‌ ॥ २६॥

yatō yatō niścarati manaścañcalamasthiram.
tatastatō niyamyaitadātmanyēva vaśaṅ nayēt ৷৷ 6.26 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जहाँ-जहाँ चंचल और अस्थिर मन भागे वहाँ-वहाँ से उसका नियमन करके ( काबू में लाकर ) उसे आत्मा के ( अपने ) वश में ले आये  || २६ ||

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्‌ ।
उपैति शांतरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्‌॥ २७॥

praśāntamanasaṅ hyēnaṅ yōginaṅ sukhamuttamam.
upaiti śāntarajasaṅ brahmabhūtamakalmaṣam ৷৷ 6.27 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इस प्रकार के योगी को जिसका मन भलीभाँति शांत हो गया है , जिसके मन के राजसिक विचार ( मन के आवेश ) शान्त हो गए हैं , जो ब्रह्मभूत — परमात्मा के साथ — एक हो गया है , जो निष्पाय है, उसे उत्तम सुख प्राप्त होता है  || २७ ||

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ २८॥

yuñjannēvaṅ sadā৷৷tmānaṅ yōgī vigatakalmaṣaḥ.
sukhēna brahmasaṅsparśamatyantaṅ sukhamaśnutē ৷৷ 6.28 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इस प्रकार वह योगी , जिसके सब पाप दूर हो गए हैं , आत्मा को सदा ध्यान-योग में लगता हुआ, सरलता से ब्रह्म के संस्पर्श से उत्पन्न होने वाले सुख का अनुभव करता है  || २८ ||

[ सम-भाव ]

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥ २९॥

sarvabhūtasthamātmānaṅ sarvabhūtāni cātmani.
īkṣatē yōgayuktātmā sarvatra samadarśanaḥ ৷৷ 6.29 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : सर्वत्र ‘सम-भाव’ से देखने वाला योग-युक्त व्यक्ति सब प्राणियों में अपने को और अपने में सब प्राणियों को देखता है  || २९ ||

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥ ३०॥

yō māṅ paśyati sarvatra sarvaṅ ca mayi paśyati.
tasyāhaṅ na praṇaśyāmi sa ca mē na praṇaśyati ৷৷ 6.30 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो मुझे सब जगह देखता है और सब वस्तुओं को मुझ में देखता है वह मेरी दृष्टि से ओझल नहीं होता और मैं उसकी दृष्टि से ओझल नहीं होता  || ३० ||

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥ ३१॥

sarvabhūtasthitaṅ yō māṅ bhajatyēkatvamāsthitaḥ.
sarvathā vartamānō.pi sa yōgī mayi vartatē ৷৷ 6.31৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो एकत्व में स्थिर होकर ( मेरे साथ एकत्व बुद्धि को मन में रख कर ) सब प्राणियों में स्थित रहने वाले मेरी उपासना करता है वह सब तरह से बर्तता हुआ भी मुझ में ही बर्तता है ( बहार से वह कितना भी व्यवहारिक जगत में डूबा हो, भीतर से वह ब्रह्म में ही लीन रहता है ) || ३१ ||

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥ ३२॥

ātmaupamyēna sarvatra samaṅ paśyati yō.rjuna.
sukhaṅ vā yadi vā duḥkhaṅ saḥ yōgī paramō mataḥ ৷৷ 6.32 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे अर्जुन ! जो व्यक्ति , सुख हो या दुःख हो, सब तरफ ‘आत्मौपम्य-दृष्टि’ से सम-भाव से देखता है , वह परम-योगी समझा जाता है || ३२ ||

[ मन की चंचलता ]

अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्‌ ॥ ३३॥

arjuna uvāca
yō.yaṅ yōgastvayā prōktaḥ sāmyēna madhusūdana.
ētasyāhaṅ na paśyāmi cañcalatvāt sthitiṅ sthirām ৷৷ 6.33 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अर्जुन ने कहा : हे मधुसूदन ! जो यह आपने साम्य-बुद्धि का ‘बुद्धि-योग’ बतलाया है ( मन के ) चंचल होने के कारण ( बुद्धि-योग में )कोई स्थिर प्राप्त कर सकेगा — यह मुझे तो नहीं दीखता | ( मन के चंचल होने के कारण साधक बुद्धि-योग के एकाग्रता , आसान आदि साधनों द्वारा मन को स्थिर कर ले — ऐसा मुझे नहीं दीखता ) || ३३ ||

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्‌ ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्‌॥ ३४॥

cañcalaṅ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavaddṛḍham.
tasyāhaṅ nigrahaṅ manyē vāyōriva suduṣkaram ৷৷ 6.34 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कृष्ण ! मन ( बड़ा ) चंचल है, मैथ डालने वाला है , बलवान है , हठी है | मैं तो मानता हूँ कि उसका निग्रह करना वायु को वश में करने के सामान दुष्कर है, कठिन है || ३४ ||

[ मन के संयम का उपाय ]

श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्‌ ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ ३५॥

śrī bhagavānuvāca
asaṅśayaṅ mahābāhō manō durnigrahaṅ calaṅ.
abhyāsēna tu kauntēya vairāgyēṇa ca gṛhyatē ৷৷ 6.35 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्री भगवन ने कहा : हे महाबाहु ! निस्संदेह मन का निग्रह करना बहुत कठिन है , यह चंचल है, किन्तु हे कुन्ती के पुत्र अर्जुन ! यह ‘अभ्यास’तथा ‘वैराग्य’से वश में किया जा सकता है || ३५ ||

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥ ३६॥

asaṅyatātmanā yōgō duṣprāpa iti mē matiḥ. vaśyātmanā tu yatatā śakyō.vāptumupāyataḥ ৷৷ 6.36 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिसने अपने-आप को वश में नहीं किया उसके लिए योग को प्राप्त करना अत्यंत कठिन है — ऐसा मेरा मत है | परन्तु जिसने अपने को ( अपने शरीर, मन, बुद्धि को ) यत्न के द्वारा वश में कर लिया है , वह उपायों द्वारा योग को प्राप्त कर सकता है || ३६ ||

अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥ ३७॥

arjuna uvāca
ayatiḥ śraddhayōpētō yōgāccalitamānasaḥ.
aprāpya yōgasaṅsiddhiṅ kāṅ gatiṅ kṛṣṇa gacchati ৷৷ 6.37 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अर्जुन ने कहा : हे कृष्ण ! अगर कोई श्रद्धा से युक्त साधक योग-मार्ग पर चल पड़ा परन्तु यत्न पूरा न होने के कारण उसका मन योग से विचलित हो गया , वह योग-भ्रष्ट हो गया और वह योग की सिद्धि को, योग के उद्देश्य को न पा सका , तो वह किस गति को प्राप्त करता है ? || ३७ ||

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥ ३८॥

kaccinnōbhayavibhraṣṭaśchinnābhramiva naśyati.
apratiṣṭhō mahābāhō vimūḍhō brahmaṇaḥ pathi ৷৷ 6.38 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे महाबाहु ! कहीं दोनों ओर  से स्थान-भ्रष्ट हुआ-हुआ , दोनों में से किसी तरफ भी न जमा हुआ , ब्रह्म-प्राप्ति के मार्ग पर किंकर्तव्य-विमूढ़ हुआ-हुआ वह बादल की तरह नष्ट  जाता? ( जैसे बादल न बरसे तो आकाश में बना रहे, बरसे तो खेती को लाभ दे , परन्तु आकाश में ही छिन्न-भिन्न हो जाय, तो न इधर का रहे, न उधर का रहे ,जिसे मनुष्य पा न सके, उचित है या ऐसे मार्ग पर पग ही न धरे ? ) || ३८ ||

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥ ३९॥

ētanmē saṅśayaṅ kṛṣṇa chēttumarhasyaśēṣataḥ.
tvadanyaḥ saṅśayasyāsya chēttā na hyupapadyatē ৷৷ 6.39 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कृष्ण ! इस मेरे संशय को आप बिलकुल छिन्न-भिन्न कर सकते हैं | आपके बिना अन्य कोई इस संशय को छिन्न-भिन्न करने वाला नहीं मिल सकता || ३९ ||

श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥ ४०॥

śrī bhagavānuvāca
pārtha naivēha nāmutra vināśastasya vidyatē.
nahi kalyāṇakṛtkaśicaddurgatiṅ tāta gacchati ৷৷ 6.40 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्री भगवान् ने कहा : ऐसे मनुष्य का विनाश न तो यहाँ होता है , न वहाँ | हे तात ! कोई भी कल्याण-कार्य करने वाला कभी दुर्गति को नहीं प्राप्त करता || ४० ||

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥ ४१॥

prāpya puṇyakṛtāṅ lōkānuṣitvā śāśvatīḥ samāḥ.
śucīnāṅ śrīmatāṅ gēhē yōgabhraṣṭō.bhijāyatē ৷৷ 6.41৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिस स्थान को पुण्यशाली लोग पाते हैं उसे पाकर,वहां बहुत समय तक रहने के उपरान्त वह योग-भ्रष्ट, पवित्र और श्रीमान लोगों के घर में जन्म लेता है || ४१ ||

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्‌ ।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्‌॥ ४२॥

athavā yōgināmēva kulē bhavati dhīmatām.
ētaddhi durlabhataraṅ lōkē janma yadīdṛśam ৷৷ 6.42 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अथवा, वह बुद्धिमान योगियों के कुल में ही जन्म लेता है | श्रीमान लोगों के स्थान में योगियों के कुल में ही जो जन्म लेता है वह तो इस संसार में और भी दुर्लभ है || ४२ ||

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्‌ ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥ ४३॥

tatra taṅ buddhisaṅyōgaṅ labhatē paurvadēhikam.
yatatē ca tatō bhūyaḥ saṅsiddhau kurunandana ৷৷ 6.43 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कुरुनन्दन ! वहां वह पूर्वजन्म के ‘बुद्धि-संयोग’ को  (संस्कारों को ) फिर पा जाता है और ( जहाँ से पहले छोड़ा था ) वहाँ से फिर ‘संसिद्धि’ ( मोक्ष ) पाने के लिए यत्न करता है || ४३ ||

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥ ४४॥

pūrvābhyāsēna tēnaiva hriyatē hyavaśō.pi saḥ.
jijñāsurapi yōgasya śabdabrahmātivartatē ৷৷ 6.44 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वह अपने पिछले जन्म के अभ्यास के द्वारा विवश-सा होकर योग की ओर खिंचता है क्योंकि योग का जिज्ञासु तक भी सकाम विधि-विधान करने वाले से , ‘शब्द-ब्रह्म’ तक सीमित रेहन जाने वाले से, ब्रह्म की सिर्फ शाब्दिक चर्चा करने वाले से आगे निकल जाता है || ४४ ||

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम्‌॥ ४५॥

prayatnādyatamānastu yōgī saṅśuddhakilbiṣaḥ.
anēkajanmasaṅsiddhastatō yāti parāṅ gatim ৷৷ 6.45 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वहाँ  से आगे, प्रयत्न से योग के लिये परिश्रम करता हुआ योगी पाप से छूटकर अनेक जन्म-जन्मांतरों में अपने आप को पूर्ण बनता हुआ परम गति को प्राप्त होता है || ४५ ||

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥ ४६॥

tapasvibhyō.dhikō yōgī jñānibhyō.pi matō.dhikaḥ.
karmibhyaścādhikō yōgī tasmādyōgī bhavārjuna ৷৷ 6.46 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : योगी तपस्वियों से बड़ा है, वह ज्ञानियों से भी बड़ा माना जाता है | योगी कर्मकांडियों से भी बड़ा है , इसलिये  हे अर्जुन ! तुम भी योगी हो जाओ || ४६ ||

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥ ४७॥

yōgināmapi sarvēṣāṅ madgatēnāntarātmanā.
śraddhāvānbhajatē yō māṅ sa mē yuktatamō mataḥ ৷৷ 6.47 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : सब योगियों में भी उसे मैं युक्ततम ( सबसे अधिक मेरे साथ जुड़ा हुआ , सर्वश्रेष्ठ ) मानता हूँ जो मुझ में अपने अंतरात्मा को डालकर ( मुझ में मन पिरोकर ) श्रद्धा-पूर्वक मेरा भजन करता है || ४७ ||

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः |

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