पँचम अध्याय – योग-मार्ग

[ सांख्य तथा योग की तुलना ]

अर्जुन उवाच
सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌॥ १॥

arjuna uvāca
saṅnyāsaṅ karmaṇāṅ kṛṣṇa punaryōgaṅ ca śaṅsasi.
yacchrēya ētayōrēkaṅ tanmē brūhi suniśicatam ৷৷ 5.1 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अर्जुन ने कहा : आप एक बार ‘कर्म-योग’ की प्रशंशा करते हो और फिर दूसरी बार ‘ज्ञान-योग’ (संन्यास) की प्रशंशा करते हो | इन दोनों में से एक मार्ग बतलाइये जो इन दोनों में से निश्चित रूप में अधिक श्रेयस्कर हो || १ ||

श्रीभगवानुवाच
सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ॥ २॥

śrī bhagavānuvāca
saṅnyāsaḥ karmayōgaśca niḥśrēyasakarāvubhau.
tayōstu karmasaṅnyāsātkarmayōgō viśiṣyatē ৷৷ 5.2 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्री भगवान् ने कहा : ज्ञान-योग और कर्म-योग — ये दोनों निःश्रेयस अर्थात परम कल्याण को देने वाले हैं, परन्तु इन दोनों में से कर्म को त्याग देने वाले ज्ञान-योग की अपेक्षा कर्म-योग (निष्काम कर्म ) अधिक  है || २ ||

ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्‍क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥ ३॥

jñēyaḥ sa nityasaṅnyāsī yō na dvēṣṭi na kāṅkṣati.
nirdvandvō hi mahābāhō sukhaṅ bandhātpramucyatē ৷৷ 5.3 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( जो व्यक्ति कर्म-योगी है, निष्काम कर्म करने वाला है , उसे ज्ञान-योगी ही समझो क्योंकि ) जो किसी से घृणा नहीं करता, किसी वस्तु की कामना नहीं करता, द्वन्द्वों से मुक्त है, हे महाबाहु अर्जुन ! उसमें सदा ज्ञान-मार्ग की, संन्यास-मार्ग की भावना भरी हुयी है | वह ( कर्मों के ) बंधन से सरलता से छूट जाता है || ३ ||

साङ्‍ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌॥ ४॥

sāṅkhyayōgau pṛthagbālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ.
ēkamapyāsthitaḥ samyagubhayōrvindatē phalam ৷৷ 5.4 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : बाल-बुद्धि के लोग ज्ञान-योग ( सांख्य )तथा कर्म-योग ( योग ) को पृथक-पृथक  बतलाते हैं , पंड़ित लोग नहीं | जो व्यक्ति इन दोनों में से किसी एक मार्ग पर भी ठीक तौर से डट जाता है , वह दोनों का फल पा लेता है || ४ ||

यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते ।
एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥ ५॥

yatsāṅkhyaiḥ prāpyatē sthānaṅ tadyōgairapi gamyatē.
ēkaṅ sāṅkhyaṅ ca yōgaṅ ca yaḥ paśyati sa paśyati ৷৷ 5.5 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : सांख्य-मार्ग वाले, कर्मों को त्यागने वाले , ज्ञान-योगी जिस स्थिति को पाते हैं , योग-मार्ग वाले, कर्मों को करने वाले , कर्म-योगी भी उसी स्थिति को पहुँचते हैं | जो व्यक्ति सांख्य और योग — इन दोनों को एक देखता है वही ठीक-ठीक देखता है || ५ ||

सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥ ६॥

saṅnyāsastu mahābāhō duḥkhamāptumayōgataḥ.
yōgayuktō munirbrahma nacirēṇādhigacchati ৷৷ 5.6 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे महाबाहु अर्जुन ! ज्ञान-मार्ग को कर्म-मार्ग के बिना पा सकना अत्यन्त दुस्साध्य है | जो ज्ञान-योगी मुनि कर्म-मार्ग में निष्ठापूर्वक लग जाता है वह शीघ्र ही ब्रह्म को जा पहुँचता है || ६ ||

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७॥

yōgayuktō viśuddhātmā vijitātmā jitēndriyaḥ.
sarvabhūtātmabhūtātmā kurvannapi na lipyatē ৷৷ 5.7 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : कर्म-योगी जिसकी आत्मा पवित्र है, जिसने अपने मन तथा इन्द्रियों को जीत लिया है, सब प्राणियों का आत्मा ही जिसका आत्मा हो गया है, वह कर्म करता हु भी उसमे लिप्त नहीं होता || ७ ||

[ कर्मफल त्याग ]

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌ ।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌ ॥ ८॥

naiva kiṅcitkarōmīti yuktō manyēta tattvavit.
paśyan śrṛṇavanspṛśañjighrannaśnangacchansvapan śvasan ৷৷ 5.8 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो युक्त है , योग-मार्गी है, कर्म-योगी है , वह तत्ववित्त है, तत्त्व को जान जाता है | इसलिए उसे देखते हुए , सुनते हुए , स्पर्श करते हुए , सूंघते हुए , खाते हुए , चलते हुए , सोते हुए , और श्वास लेते हुए यही समझना चाहिए कि मई कुछ नहीं कर रहा || ८ ||

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌॥ ९॥

pralapanvisṛjangṛhṇannunmiṣannimiṣannapi.
indriyāṇīndriyārthēṣu vartanta iti dhārayan ৷৷ 5.9 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( इसी प्रकार ) बोलते हुए , त्यागते हुए , ग्रहण करते हुए , पलकें खोलते हुए , पलकें मीचते हुए भी यह माने कि केवल इन्द्रियां अपने विषयों में बरत रही हैं || ९ ||

bhagwat geeta chapter 5 in hindi

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १०॥

brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṅ tyaktvā karōti yaḥ.
lipyatē na sa pāpēna padmapatramivāmbhasā ৷৷ 5.10 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो व्यक्ति आसक्ति को त्याग कर ब्रह्म में अर्पण करके कर्म करता है , वह पाप से लिप्त नहीं होता, ठीक ऐसे जैसे कमल का पत्ता ( पानी में रहता हुआ भी ) पानी से अलिप्त रहता है || १० ||

कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि ।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति संग त्यक्त्वात्मशुद्धये॥ ११॥

kāyēna manasā buddhyā kēvalairindriyairapi.
yōginaḥ karma kurvanti saṅgaṅ tyaktvā৷৷tmaśuddhayē ৷৷ 5.11 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : कर्म-योगी लोग आसक्ति को त्याग कर , आत्मशुद्धि के लिए केवल शरीर , केवल मन , केवल बुद्धि तथा केवल इन्द्रियों से काम करते हैं || ११ ||

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्‌ ।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥ १२॥

yuktaḥ karmaphalaṅ tyaktvā śāntimāpnōti naiṣṭhikīm.
ayuktaḥ kāmakārēṇa phalē saktō nibadhyatē ৷৷ 5.12 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : कर्मयोगी कर्मों के फलों की आसक्ति को त्याग कर नैष्ठिक अर्थात परम शान्ति को प्राप्त करता है | जो कर्मयोगी नहीं वह ( क्योंकि कर्म तो वह करता है और आसक्ति का तयाँ नहीं करता इसलिये ) कामना से प्रेरित होकर फल में आसक्त होने के कारण बंधन में कस जाता है || १२ ||

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्‌ ॥ १३॥

sarvakarmāṇi manasā saṅnyasyāstē sukhaṅ vaśī.
navadvārē purē dēhī naiva kurvanna kārayan ৷৷ 5.13 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : सब कर्मों को मन से , आंतरिक रूप से त्याग कर , अपने को वश में रखने वाला कर्मयोगी नौ द्वारों वाले इस शरीर रुपी नगर में सुख से निवास करता है | इस भावना से रहता हुआ वह न कोई कर्म करता है, न करवाता है || १३ ||

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥ १४॥

na kartṛtvaṅ na karmāṇi lōkasya sṛjati prabhuḥ.
na karmaphalasaṅyōgaṅ svabhāvastu pravartatē ৷৷ 5.14 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( हम अपने ‘कर्ता ‘ समझकर कर्म-फल का त्याग नहीं करते | श्रीकृष्ण कहते हैं कि  ) प्रभु ने न किसी को ‘कर्ता’ बनाया है , ‘न’ कर्म बनाया है, न कर्म-फल के साथ संयोग अर्थात उसके प्रति ‘आसक्ति’ ही बनाई है | यह तो मनुष्य का अपना स्वभाव है ( जिससे वह अपने को ‘कर्ता’ मान बैठता है ) , वही स्वभाव हम सब में प्रवृत्त हो रहा है ( अपने स्वभाव के कारण हम अपने को ‘कर्ता’ मानते रहते हैं , अपने को ‘कर्ता’ न मानें तो कर्म अपने-आप निष्काम हो जाता है | ‘स्वभाव’ का अर्थ ‘प्रकृति’ भी किया जाता है | ‘प्रकृति’ ही सब कुछ करती है , हम कुछ नहीं करते ) || १४ ||

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥ १५॥

nādattē kasyacitpāpaṅ na caiva sukṛtaṅ vibhuḥ.
ajñānēnāvṛtaṅ jñānaṅ tēna muhyanti jantavaḥ ৷৷ 5.15 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( न प्रभु ने किसी को ‘कर्ता’ बनाया है , न वह स्वयं ‘कर्ता’ है, वह तो ‘अकर्ता’ होकर ही सब-कुछ कर रहा है, ठीक ऐसे जैसे कर्म-योगी के लिए कहा गया कि  वह कर्म करता हुआ भी नहीं करता | ) वह विभु न किसी के पाप को लेता है, न पुण्य को | ज्ञान पर अज्ञान का पर्दा पड़ा रहता है , इसलिए प्राणी मोह में पड़े रहते हैं ( और जब कोई दुःख की बात होती है तब कहते हैं , परमात्मा ने दुःख दिया , जब सुख की बात होती है, तब कहते हैं परमात्मा ने सुख दिया | जब वह ‘कर्ता’ ही नहीं है तब उसे दुःख-सुख का कारण कहना अज्ञानवश ही होता है ) || १५ ||

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्‌॥ १६॥

jñānēna tu tadajñānaṅ yēṣāṅ nāśitamātmanaḥ.
tēṣāmādityavajjñānaṅ prakāśayati tatparam ৷৷ 5.16 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : परन्तु जिनका ज्ञान से अज्ञान नष्ट हो जाता है, उनका ज्ञान सूर्य के प्रकाश की भाँति उस परम ब्रह्म को प्रकाशित कर देता है || १६ ||

तद्‍बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७॥

tadbuddhayastadātmānastanniṣṭhāstatparāyaṇāḥ.
gacchantyapunarāvṛttiṅ jñānanirdhūtakalmaṣāḥ ৷৷ 5.17 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : और उस परम ब्रह्म में जिनकी बुद्धि रम जाती है , जिनका अंतःकरण उसी में लीन हो जाता है, जो तन्निष्ठ हो जाते हैं , तत्परायण हो जाते हैं , उनके पाप ज्ञान से बिलकुल धुल जाते हैं और वे उस दशा में पहुँच जाते हैं जहाँ से लौटना नहीं होता || १७ ||

[ कर्मयोगी के लक्षण ]

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥ १८॥

vidyāvinayasaṅpannē brāhmaṇē gavi hastini.
śuni caiva śvapākē ca paṇḍitāḥ samadarśinaḥ ৷৷ 5.18 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( जैसे द्वितीय अध्याय में ‘स्थित-प्रज्ञ’ के लक्षण कहे गए हैं | कर्म-योगी के लक्षण क्या हैं ? जब कर्म-योगी की बुद्धि परम ब्रह्म में रम जाती है, उसका अन्तःकरण ब्रह्म में लीन हो जाता है, वह तन्निष्ठ हो जाता है , तत्परायण हो जाता है  , उनके पाप ज्ञान-वारि से बिलकुल धुल जाते हैं तब ) वह पंडित हो जाता है, उसका अज्ञान जाता रहता है, वह समदर्शी हो जाता है, सबको एक दृष्टि से देखता है, विद्या तथा विनय से युक्त ब्राह्मण में , गाय, हाथी, कुत्ते तथा चांडाल में उसकी भेद-बुद्धि नहीं रहती, वह सबको सामान देखता है || १८ ||

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥ १९॥

ihaiva tairjitaḥ sargō yēṣāṅ sāmyē sthitaṅ manaḥ.
nirdōṣaṅ hi samaṅ brahma tasmādbrahmaṇi tē sthitāḥ ৷৷ 5.19 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( ज्ञान द्वारा ) जिनका मन साम्यावस्था में स्थिर हो जाता है वे यहीं-के-यहीं , इस पृथ्वी पर ही संसार को जीत लेते हैं | क्योंकि ब्रह्म भी निर्दोष तथा सम है, सब में एक समान है , इसलिये ये साम्य-बुद्धि वाले व्यक्ति ब्रह्म में स्थिर रहते हैं || १९ ||

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्‌ ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ २०॥

na prahṛṣyētpriyaṅ prāpya nōdvijētprāpya cāpriyam.
sthirabuddhirasammūḍhō brahmavidbrahmaṇi sthitaḥ ৷৷ 5.20 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो व्यक्ति प्रिय वस्तु को प्राप्त कर प्रसन्न नहीं होता , अप्रिय को प्राप्त कर उद्विग्न नहीं होता , जिसकी बुद्धि स्थिर है, जो मोह में नहीं फंसता , वह ब्रह्मवेत्ता है, ब्रह्म में स्थित है || २० ||

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्‌ ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१॥

bāhyasparśēṣvasaktātmā vindatyātmani yatsukham.
sa brahmayōgayuktātmā sukhamakṣayamaśnutē ৷৷ 5.21 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो व्यक्ति बाह्य विषयों के स्पर्श में आसक्त नहीं रहता , वह आत्मा में जो सुख वर्तमान रहता है, उसे प्राप्त करता है | ऐसा व्यक्ति ‘ब्रह्मयोग’ से युक्त हो जाता है ( अपने आप को विषयों से छूटकर ब्रह्म में जुड़ा हुआ अनुभव करता है ) और अक्षय सुख का उपभोग करता है || २१ ||

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२॥

yē hi saṅsparśajā bhōgā duḥkhayōnaya ēva tē.
ādyantavantaḥ kauntēya na tēṣu ramatē budhaḥ ৷৷ 5.22 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कुंती के पुत्र अर्जुन ! बाह्य विषयो के स्पर्श से, संयोग से जो भोग प्राप्त होते हैं , वे दुःख को ही पैदा करते हैं, इन भोगों का आदि है और अन्त भी है ( जिस भोग का आदि होगा उसका अन्त  भी होगा , भोग का अन्त  होगा तो दुःख होगा , यह सोचकर ) बुद्धिमान लोग उन भोगों में रत नहीं होते || २२ ||

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्‌ ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥ २३॥

śaknōtīhaiva yaḥ sōḍhuṅ prākśarīravimōkṣaṇāt.
kāmakrōdhōdbhavaṅ vēgaṅ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ ৷৷ 5.23 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( श्रीकृष्ण ने जिस प्रकार के ‘कर्म-योगी’ का चित्र खींचा क्या वह इस जन्म में संभव है ? — इस शंका का अर्जुन के मन में उठ खड़ा होना स्वाभाविक है | इसलिये श्रीकृष्ण कहते हैं : ) शरीर के छूटने से पहले , जो ‘काम’ और ‘क्रोध’ से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन कर सकता है ( ‘काम’ और ‘क्रोध’ के वशीभूत नहीं होता ) वही युक्त है, अर्थात कर्म-योगी है, वह मनुष्य सुखी है || २३ ||

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४॥

yō.ntaḥsukhō.ntarārāmastathāntarjyōtirēva yaḥ.
sa yōgī brahmanirvāṇaṅ brahmabhūtō.dhigacchati ৷৷ 5.24 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो व्यक्ति ( बाहर के विषयों में सुख खोजने के स्थान में ) अपने भीतर ही सुख पा जाता है, अपने अन्तर में आराम पा जाता है, अपने भीतर ही ज्योति पा जाता है , वह योगी ब्रह्म रूप हो जाता है और ब्रह्म अर्थात परम निर्वाण अर्थात मुक्ति को ( ब्रह्म-निर्वाण को ) पा जाता है || २४ ||

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥ २५॥

labhantē brahmanirvāṇamṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ.
chinnadvaidhā yatātmānaḥ sarvabhūtahitē ratāḥ ৷৷ 5.25 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वे ऋषि जिनकी द्वैध-बुद्धि छूट गयी है  ( जो सबको आत्मवत समझते हैं – ‘शनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ) , जिनके पाप क्षीड़ हो गए हैं ( ज्ञान रुपी पवित्र जल से जिनका पाप रुपी पंग्क् धुल गया है — ‘ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः’), जिन्होंने अपने को संयम में ढाल लिया है, जो सब प्राणियों के हिट में रत हैं, वे ब्रह्म अर्थात परम , निर्वाण अर्थात मुक्ति को (ब्रह्म-निर्वाण को ) प्राप्त करते हैं || २५ ||

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्‌ ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्‌ ॥ २६॥

kāmakrōdhaviyuktānāṅ yatīnāṅ yatacētasām.
abhitō brahmanirvāṇaṅ vartatē viditātmanām ৷৷ 5.26 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो यति वीडितात्मा हैं, आत्मा को जान गए हैं , जो काम तथा क्रोध से रहित हो गए हैं , जिन्होंने अपने चित्त को मन को संयत कर लिया है , अपने वाश में कर लिया है , उन्हें परम मुक्ति ( ब्रह्म-निर्वाण ) आस-पास या सम्मुख रखा हुआ-सा मिल जाता है || २६ ||

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७॥

sparśānkṛtvā bahirbāhyāṅścakṣuścaivāntarē bhruvōḥ.
prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantaracāriṇau ৷৷ 5.27 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : बाह्य विषयों के स्पर्श को बाहर करके , दृष्टि को भौहों के बीच में जमाकर , नासिका में चलने वाले प्राण तथा अपां को समान करके — || २७ ||

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८॥

yatēndriyamanōbuddhirmunirmōkṣaparāyaṇaḥ.
vigatēcchābhayakrōdhō yaḥ sadā mukta ēva saḥ ৷৷ 5.28 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इन्द्रियों , मन तथा बुद्धि को वश में करने वाला , मोक्ष पाने के लिए कटिबद्ध , इच्छा , भय तथा क्रोध से रहित जो मुनि है वह सदा मुक्त ही है || २८ ||

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्‌ ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥ २९॥

bhōktāraṅ yajñatapasāṅ sarvalōkamahēśvaram.
suhṛdaṅ sarvabhūtānāṅ jñātvā māṅ śāntimṛcchati ৷৷ 5.29 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो मेरे विषय में यह जानता है कि  मैं ‘यज्ञ’ और ‘तप’ का भोक्ता हूँ , सब लोकों का महेश्वर हूँ , सब प्राणियों का सुहृद हूँ — वह ऐसा जानकार शान्ति को प्राप्त होता है || २९ ||

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पंचमोऽध्यायः |

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here