द्वितीय अध्याय – सांख्य और योग

[ श्रीकृष्ण का अर्जुन मोह छोड़ने का उपदेश ]

संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌ ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥ १ ॥

sañjaya uvāca
taṅ tathā kṛpayā.viṣṭamaśrupūrṇākulēkṣaṇam |
viṣīdantamidaṅ vākyamuvāca madhusūdanaḥ ৷৷ 2.1 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : संजय ने कहा : हे धृतराष्ट्र ! इस प्रकार करुणा से भरे हुए , आँखों में आंसू छलक रहे, दुःखित-हृदय अर्जुन से श्रीकृष्ण ने यह वचन कहा || १ ||

श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌ ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥ २ ॥

śrī bhagavānuvāca
kutastvā kaśmalamidaṅ viṣamē samupasthitam | anāryajuṣṭamasvargyamakīrtikaramarjuna ৷৷ 2.2 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्री भगवन ने अर्जुन से कहा : हे अर्जुन ! इस विषम समय में तुम्हे यह मोह कहाँ से आ गया ? ऐसे समय में इस प्रकार का मोह आर्य लोगों के लिए अनजाना है, स्वर्ग ले जाने वाला नहीं है, कीर्ति पर धब्बा लगाने वाला है || २ ||

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥ ३ ॥

klaibyaṅ mā sma gamaḥ pārtha naitattvayyupapadyatē.
kṣudraṅ hṛdayadaurbalyaṅ tyaktvōttiṣṭha parantapa৷৷ 2.3 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पार्थ ! नामर्दी की तरफ पग मत बढ़ाओ , तुम्हे यह शोभा नहीं देता | अरे शत्रुओं को सत्ता देने वाले ! हृदय की इस दुर्बलता को छोड़कर उठ खड़े हो जाओ || ३ ||

[ भोग ‘रुधिर-प्रदिग्ध’ हैं ]

अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥ ४ ॥

arjuna uvāca
kathaṅ bhīṣmamahaṅ saṅkhyē drōṇaṅ ca madhusūdana.
iṣubhiḥ pratiyōtsyāmi pūjārhāvarisūdana ৷৷ 2.4 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अर्जुन ने श्रीकृष्ण को उत्तर दिया : हे मधुसूदन ! मैं युद्ध में भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य के प्रति बाणों से कैसे युद्ध कर सकूँगा ? हे शत्रुओं का संहार करने वाले कृष्ण , ये दोनों तो पूजा के योग्य हैं || ४ ||

गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थका मांस्तु गुरूनिहैव भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌ ॥ ५ ॥

gurūnahatvā hi mahānubhāvān śrēyō bhōktuṅ bhaikṣyamapīha lōkē.
hatvārthakāmāṅstu gurūnihaiva bhuñjīya bhōgān rudhirapradigdhān ৷৷ 2.5 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इन पूजनीय गुरुओं , बड़े-बूढ़ों को मरकर जीने के अपेक्षा इस संसार में भीख मांगकर पेट भर लेना कहीं अधिक अच्छा है | यद्यपि ये बड़े-बूढ़े ‘अर्थ-काम’ हैं, धन-दौलत के लोभ में युद्ध खड़े हुए हैं, तथापि अगर मैं इन्हें मारूंगा तब तो इसी जगत में मुझे इनके रक्त से सने हुए — ‘रुधिर-प्रदिग्ध’ — भोग भोगने होंगे || ५ ||

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥ ६ ॥

na caitadvidmaḥ katarannō garīyō yadvā jayēma yadi vā nō jayēyuḥ.
yānēva hatvā na jijīviṣāmastēvasthitāḥ pramukhē dhārtarāṣṭrāḥ ৷৷ 2.6 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हम तो यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए भले की बात क्या है — क्या हमारे लिए यह भले की बात है कि हम उन्हें जीत लें , या यह भले की बात है कि वे हमें जीत लें | जिन लोगों की हत्या करने के बाद हमारे भीतर खुद जीने की इच्छा नहीं रहेगी, वे धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने आ खड़े हुए हैं || ६ ||

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌ ॥ ७ ॥

kārpaṇyadōṣōpahatasvabhāvaḥ pṛcchāmi tvāṅ dharmasaṅmūḍhacētāḥ.
yacchrēyaḥ syānniśicataṅ brūhi tanmē śiṣyastē.haṅ śādhi māṅ tvāṅ prapannam৷৷ 2.7 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : दया की भावना ने दोष बनकर मेरे स्वाभाव को ग्रस कर लिया है ;इस संकट-काल में मेरा धर्म क्या है — इस विषय में मेरा मन मूढ़ हो गया है | हे कृष्ण ! मैं आपको पूछता हूँ : जो  निश्चित रूप से मेरे लिए भले की बात हो वह बातलिये | मैं आपका शिष्य हूँ ; आपकी शरण में आया हूँ ; मुझे उपदेश दें || ७ ||

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्यात् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌ ।
अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌॥ ८ ॥

na hi prapaśyāmi mamāpanudyāt yacchōkamucchōṣaṇamindriyāṇām.
avāpya bhūmāvasapatnamṛddham rājyaṅ surāṇāmapi cādhipatyam ৷৷ 2.8 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : भले ही मुझे सारी पृथ्वी में निष्कंटक , धन-धान्य-संपन्न राज्य मिल जाय , परन्तु मुझे कोई ऐसी वस्तु नहीं दिखाई देती जो इन्द्रियों को सूखा डालने वाले इस शोक को दूर कर सकते || ८ ||

संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप ।
न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥ ९ ॥

sañjaya uvāca
ēvamuktvā hṛṣīkēśaṅ guḍākēśaḥ parantapa.
na yōtsya iti gōvindamuktvā tūṣṇīṅ babhūva ha ৷৷ 2.9 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अर्जुन की उक्त बात धृतराष्ट्र को सुनाकर फिर संजय ने कहा : हे पराक्रमी राजन ! इस प्रकार गुडाकेश (अर्जुन) हृषिकेश को उक्त बात कहने के बाद यह कहकर चुप हो गए कि : हे गोविन्द ! — ‘न योत्स्ये’ — मैं नहीं लड़ूँगा || ९ ||

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥ १० ॥

tamuvāca hṛṣīkēśaḥ prahasanniva bhārata.
sēnayōrubhayōrmadhyē viṣīdantamidaṅ vacaḥ ৷৷ 2.10 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे भारतवंशी धृतराष्ट्र ! दोनों सेनाओं के मध्य में खड़े होकर विषाद से ग्रसे हुए अर्जुन को श्रीकृष्ण ने हँसते हुए ये वचन कहे || १० ||

[ श्रीकृष्ण का उपदेश – आत्मा की अमरता ]

श्री भगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥

śrī bhagavānuvāca
aśōcyānanvaśōcastvaṅ prajñāvādāṅśca bhāṣasē.
gatāsūnagatāsūṅśca nānuśōcanti paṇḍitāḥ ৷৷ 2.11 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्रीभगवान ने अर्जुन से कहा : जिनके लिए शोक नहीं करना चाहिए , उनके लिए तू शोक कर रहा है, और साथ में ज्ञान की बातें करता है | पण्डित लोग न मरों के लिए शोक करते हैं , न जीवितों के लिए || ११ ||

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥ १२॥

na tvēvāhaṅ jātu nāsaṅ na tvaṅ nēmē janādhipāḥ.
na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarvē vayamataḥ param ৷৷ 2.12 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : न तो ऐसा ही है कि मैं किसी समय नहीं था; न ऐसा ही है कि तुम नहीं थे ; न ऐसा ही है कि ये सब राजा नहीं थे; और न कभी कोई ऐसा समय आएगा जब कि हम सब इसके बाद नहीं रहेंगे || १२ ||

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥ १३ ॥

dēhinō.sminyathā dēhē kaumāraṅ yauvanaṅ jarā.
tathā dēhāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati ৷৷ 2.13 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जैसे देह धारण करने वाले आत्मा को इस देह  में बालपन , यौवन और बुढ़ापा प्राप्त होता है, उसी प्रकार आत्मा को दूसरे देह की प्राप्ति हो जाती है | धीर व्यक्ति को इस बात से मोह में नहीं पड़ जाना चाहिए || १३ ||

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥ १४ ॥

mātrāsparśāstu kauntēya śītōṣṇasukhaduḥkhadāḥ.
āgamāpāyinō.nityāstāṅstitikṣasva bhārata৷৷2.14৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कुन्ती  के पुत्र ! आत्मा के अमर होते हुए भी आत्मा को उल्टा भान इसलिए होता है, उसे सर्दी-गर्मी , सुख-दुःख की अनुभूति इसलिए होती है क्योंकि आत्मा का ‘मात्रा’ से — इन्द्रियों  से — स्पर्श रहता है | सर्दी-गर्मी , सुख-दुःख का भान इन्द्रियों को होता है , शरीर को होता है, परन्तु इन्द्रियों तथा शरीर का आत्मा के साथ संपर्क होने के कारण वह भान आत्मा पर आरोपित हो जाता है | ये स्पर्श तो आते हैं-जाते हैं , अनित्य हैं , सदा नहीं रहते, इसलिए हे भारत! इन्हे सहन करो || १४ ||

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ १५॥

yaṅ hi na vyathayantyētē puruṣaṅ puruṣarṣabha.
samaduḥkhasukhaṅ dhīraṅ sō.mṛtatvāya kalpatē ৷৷ 2.15 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पुरुषों में श्रेष्ठ अर्जुन ! जिस पुरुष को ये दुःखी नहीं करते, जो दुःख और सुख में सामान रहता है , जो धीर है , विचलित नहीं होता , वह अमर जीवन को प्राप्त करने में समर्थ होता है || १५ ||

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥ १६ ॥

nāsatō vidyatē bhāvō nābhāvō vidyatē sataḥ.
ubhayōrapi dṛṣṭō.ntastvanayōstattvadarśibhiḥ ৷৷ 2.16 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो ‘नहीं’ (असत्य) है वह ‘हो’ (सत्य) नहीं सकता , जो ‘है’ (सत्य), उसका ‘अभाव’ नहीं हो सकता | तत्वदर्शी लोगों ने इन दोनों बातों के अन्त तक विचार करके यह ठीक-ठीक निष्कर्ष निकाल लिया है || १६ ||

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌ ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७॥

avināśi tu tadviddhi yēna sarvamidaṅ tatam.
vināśamavyayasyāsya na kaśicat kartumarhati ৷৷ 2.17 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिस आत्म-सत्ता से हमारा यह सारा शरीर व्याप्त है, वह अविनाशी है | इस अव्यय आत्म-सत्ता का कोई भी विनाश नहीं कर सकता || १७ ||

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥ १८॥

antavanta imē dēhā nityasyōktāḥ śarīriṇaḥ.
anāśinō.pramēyasya tasmādyudhyasva bhārata ৷৷ 2.18 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : यह देह ‘शरीर’ है, वह आत्मा ‘शरीरी’ है , इसलिए ‘शरीरी’ है क्योंकि यह शरीर उसका है (शरीर जिसका हो, संस्कृत में उसे ‘शरीरी’ कहते हैं ) | उस नित्य ‘शरीरी’ के आत्मा के , ये देह तो अन्तवाले हैं , नष्ट हो जाने वाले हैं , परन्तु वह आत्मा स्वयं अविनाशी है, अजेय है | इसलिए हे अर्जुन ! तू युद्ध कर || १८ ||

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌ ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥ १९॥

ya ēnaṅ vētti hantāraṅ yaścainaṅ manyatē hatam.
ubhau tau na vijānītō nāyaṅ hanti na hanyatē ৷৷ 2.19 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : आत्मा के विषय में जो यह समझता है की यह मारता है, या जो यह समझता है कि यह मारा जाता है, वे दोनों ही सत्य बात को नहीं जानते, यह आत्मा न तो मारता है , न मारा जाता है || १९ ||

न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ २०॥

na jāyatē mriyatē vā kadācin nāyaṅ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ.
ajō nityaḥ śāśvatō.yaṅ purāṇō na hanyatē hanyamānē śarīrē ৷৷ 2.20 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : यह आत्मा न कभी उत्पन्न होता है, न कभी मरता है | ऐसा भी नहीं है की एक बार जब यह अस्तित्व में आ गया तब फिर दोबारा होने का नहीं | यह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत है, पुरातन है | शरीर के वध हो जाने पर भी यह मरता नहीं है || २० ||

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌ ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌ ॥ २१॥

vēdāvināśinaṅ nityaṅ ya ēnamajamavyayam.
kathaṅ sa puruṣaḥ pārtha kaṅ ghātayati hanti kam ৷৷ 2.21৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पार्थ ! जो यह जान जाता है कि  आत्मा अविनाशी है, नित्य है, जो इस आत्मा को अजन्मा और अपरिवर्तनशील जान जाता है, वह पुरुष कैसे किसी को दूसरे से मरवा सकता है या स्वयं मार सकता है? || २१ ||

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ २२॥

vāsāṅsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti narō.parāṇi.
tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇānyanyāni saṅyāti navāni dēhī ৷৷ 2.22 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जैसे मनुष्य फ़टे-पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नए वस्त्र पहन लेता है, वैसे ही यह देही , जीवात्मा, पुराने-पुराने, जीर्ण-शीर्ण शरीरों को छोड़कर नए शरीरों को प्राप्त करता है, धारण कर लेता है || २२ ||

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥ २३॥

nainaṅ chindanti śastrāṇi nainaṅ dahati pāvakaḥ.
na cainaṅ klēdayantyāpō na śōṣayati mārutaḥ ৷৷ 2.23 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इस आत्मा को शस्त्र छेद नहीं सकते, न इसको अग्नि जला सकती है, और न इसे पानी गीला कर सकता है, न वायु इसे सूखा सकता है || २३ ||

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥ २४॥

acchēdyō.yamadāhyō.yamaklēdyō.śōṣya ēva ca.
nityaḥ sarvagataḥ sthāṇuracalō.yaṅ sanātanaḥ ৷৷ 2.24 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : आत्मा को छेदा नहीं जा सकता, जलाया नहीं जा सकता , गीला नहीं किया जा सकता, सुखाया नहीं जा सकता | यह नित्य है, सबके अंदर व्याप्त है, स्थिर है, अचल है, सनातन है || २४ ||

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥ २५॥

avyaktō.yamacintyō.yamavikāryō.yamucyatē.
tasmādēvaṅ viditvainaṅ nānuśōcitumarhasi ৷৷ 2.25 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : आत्मा ‘अव्यक्त’ है — इन्द्रियों से ग्रहण करने विषय नहीं है, ‘अचिन्त्य’ है — मन से ग्रहण करने विषय भी नहीं है, ‘अविकार्य’ है — सर्वथा विकार रहित उसे कहा जाता है | इसलिये उसे ऐसा समझकर हे अर्जुन ! तुम्हे शोक नहीं करना चाहिये || २५ ||

अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌ ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥ २६॥

atha cainaṅ nityajātaṅ nityaṅ vā manyasē mṛtam.
tathāpi tvaṅ mahābāhō naivaṅ śōcitumarhasi ৷৷ 2.26 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : यदि तुम आत्मा को सदा पैदा होने वाला और सदा मरने वाला भी समझते हो तो हे महाबाहु ! तुम्हे शोक करना बिलकुल उचित नहीं है || २६ ||

जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥ २७॥

jātasya hi dhruvō mṛtyurdhruvaṅ janma mṛtasya ca.
tasmādaparihāryē.rthē na tvaṅ śōcitumarhasi ৷৷ 2.27 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : क्योंकि जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मर चूका है, उसका जन्म भी सुनिश्चित है | इसलिए इस ‘अपरिहार्य’ — अर्थात जिसे टाला नहीं जा सकता — ऐसी बात के लिये तुम्हे शोक करना उचित नहीं है || २७ ||

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥ २८॥

avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata.
avyaktanidhanānyēva tatra kā paridēvanā ৷৷ 2.28 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : सब प्राणी आरम्भ में अव्यक्त हैं, मध्यभाग में व्यक्त और फिर अंत समय में अव्यक्त हो जाते हैं | हे भारत ! इसमें विलाप करने की क्या बात है ? || २८ ||

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌॥ २९॥

āścaryavatpaśyati kaśicadēnamāścaryavadvadati tathaiva cānyaḥ.
āścaryavaccainamanyaḥ śrṛṇōti śrutvāpyēnaṅ vēda na caiva kaśicat ৷৷ 2.29 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे अर्जुन ! आत्मा के विषय में जो-कुछ मैंने कहा है, उसे कोई तो आश्चर्य से देखता है; कोई उसका आश्चर्य-सरीखा वर्णन करता है ; कोई मानो इन बातों को ऐसे सुनता है जैसे ये आश्चर्य की बातें हों ; और कोई इसे सुनकर भी जान नहीं पाटा || २९ ||

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥ ३०॥

dēhī nityamavadhyō.yaṅ dēhē sarvasya bhārata.
tasmātsarvāṇi bhūtāni na tvaṅ śōcitumarhasi ৷৷ 2.30 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : यथार्थ-द्रिष्टि आत्मा की अमरता की है | हे भारत ! सबके शरीर में निवास करने वाला यह ‘देहि’ — देह का स्वामी ‘आत्मा’ — सदा ही अवध्य है , इसका कोई वध नहीं कर सकता, इसलिए तुम्हे किसी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिये || ३० ||

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ ३१॥

svadharmamapi cāvēkṣya na vikampitumarhasi.
dharmyāddhi yuddhāchrēyō.nyatkṣatriyasya na vidyatē ৷৷ 2.31 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इसके अतिरिक्त ‘स्व-धर्म’ — अपने कर्त्तव्य — को देखते हुए भी हिम्मत हारना उचित नहीं है | क्षत्रिय के लिये धर्म-युद्ध से बढ़कर और कोई कर्त्तव्य नहीं है || ३१ ||

यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌ ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥ ३२॥

yadṛcchayā cōpapannaṅ svargadvāramapāvṛtam.
sukhinaḥ kṣatriyāḥ pārtha labhantē yuddhamīdṛśam ৷৷ 2.32 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पार्थ ! यह युद्ध बिना प्रयत्न के अपने-आप प्राप्त, खुला हुआ स्वर्ग का द्वार है | वे क्षत्रिय सुखी हैं जिन्हे संयोग से इस प्रकार का युद्ध करने को मिलता है || ३२ ||

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥ ३३॥

atha caittvamimaṅ dharmyaṅ saṅgrāmaṅ na kariṣyasi.
tataḥ svadharmaṅ kīrtiṅ ca hitvā pāpamavāpsyasi ৷৷ 2.33 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : और यदि तुम इस धर्म-युद्ध को नहीं करोगे तो तुम स्व-धर्म और कीर्ति से च्युत हो जाओगे और पाप का भागी बनोगे || ३३ ||

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌ ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥ ३४॥

akīrtiṅ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti tē.vyayām.
saṅbhāvitasya cākīrtirmaraṇādatiricyatē ৷৷ 2.34 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : और सब लोग तुम्हारे अपयश की बातें करते रहेंगे , ऐसा अपयश जो कभी मिटने वाला नहीं | सम्मानित पुरुष के लिये अपयश होना मरने से भी अधिक बुरा है || ३४ ||

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌॥ ३५॥

bhayādraṇāduparataṅ maṅsyantē tvāṅ mahārathāḥ.
yēṣāṅ ca tvaṅ bahumatō bhūtvā yāsyasi lāghavam ৷৷ 2.35 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : बड़े-बड़े योद्धा , महारथी लोग यह समझेंगे कि तुम भय के कारण युद्ध से उपरत हो गए हो , विमुख हो गए हो | जिनके लिए तुम अब तक बहुत आदरणीय थे, उनकी दृष्टि में अब तुम छोटे हो जाओगे || ३५ ||

अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌ ॥ ३६॥

avācyavādāṅśca bahūn vadiṣyanti tavāhitāḥ.
nindantastava sāmarthyaṅ tatō duḥkhataraṅ nu kim ৷৷ 2.36 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : और तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सामर्थ्य की निंदा करते हुए बहुत-सी ऐसी बातें करेंगे जो न कहनी चाहिये | इससे अधिक दुःख की बात और क्या हो सकती है? || ३६ ||

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌ ।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥ ३७॥

hatō vā prāpsyasi svargaṅ jitvā vā bhōkṣyasē mahīm.
tasmāduttiṣṭha kauntēya yuddhāya kṛtaniścayaḥ ৷৷ 2.37 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अगर तुम युद्ध में मारे गये तो स्वर्ग को जाओगे, और जीत गए तब पृथ्वी का राज भोगोगे इसलिये , हे कुंती पुत्र ! युद्ध के लिये निश्चय करके उठ खड़े हो || ३७ ||

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥ ३८॥

sukhaduḥkhē samē kṛtvā lābhālābhau jayājayau.
tatō yuddhāya yujyasva naivaṅ pāpamavāpsyasi ৷৷ 2.38 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : सुख-दुःख को, लाभ और हानि को, जय और पराजय को एक-समान समझकर , फिर युद्ध के लिये जुट जाओ , इस प्रकार तुम्हे पाप नहीं लगेगा || ३८ ||

एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु ।
बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥ ३९॥

ēṣā tē.bhihitā sāṅkhyē buddhiryōgē tvimāṅ śrṛṇu.
buddhyāyuktō yayā pārtha karmabandhaṅ prahāsyasi ৷৷ 2.39 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्रीकृष्ण करते हैं : हे पार्थ ! अब तक मैंने जो-कुछ कहा है वह सांख्य-बुद्धि के अनुसार कहा ; अब योग-बुद्धि के अनुसार तुम्हे क्या करना चाहिए — यह सुनो, जिस योग-बुद्धि से युक्त हो कर तुम कर्म तो करोगे, परन्तु कर्म के बंधन को परे फेंक डोज || ३९ ||

यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते ।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥ ४०॥

nēhābhikramanāśō.sti pratyavāyō na vidyatē.
svalpamapyasya dharmasya trāyatē mahatō bhayāt ৷৷ 2.40 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : यहाँ, अर्थात कर्म-योग में प्रारम्भ किये हुए कर्म का कभी नाश नहीं होता, और उल्टा फल मिल जाय — ऐसा दोष भी नहीं होता | कर्म-योग रुपी धर्म का थोड़ा-सा भी आचरण बड़े भय से मनुष्य की रक्षा करता है || ४० ||

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌ ॥ ४१॥

vyavasāyātmikā buddhirēkēha kurunandana.
bahuśākhā hyanantāśca buddhayō.vyavasāyinām ৷৷ 2.41 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कुरुनन्दन ! कर्म-योग के इस मार्ग में ‘व्यवसायात्मिका’ बुद्धि तो एक ही है ; ‘अव्यवसायी’ लोगो की बुद्धियाँ एक न होकर अनेक शाखाओं में बंटी होती हैं , और अनन्त होती हैं || ४१ ||

यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥ ४२॥

yāmimāṅ puṣpitāṅ vācaṅ pravadantyavipaśicataḥ.
vēdavādaratāḥ pārtha nānyadastīti vādinaḥ ৷৷ 2.42 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पार्थ ! अविपाश्चित अर्थात अज्ञानी लोग, वेद  का नाम लेकर उसके बाद-विवाद में, कर्म-काण्ड में उलझे रहते हैं, और जो फूलों के समान सुन्दर वाणी बोल-बोलकर ये कहते हैं कि  जो-कुछ हम कह रहे हैं उसके सिवाय दूसरा कोई मार्ग सत्य नहीं || ४२ ||

कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्‌ ।
क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥ ४३॥

kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām.
kriyāviśēṣabahulāṅ bhōgaiśvaryagatiṅ prati ৷৷ 2.43 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ये लोग लालसा में फंसे हुए, स्वर्ग के पीछे पड़े हुए , जन्म और कर्म-फल देने वाली, योग और ऐश्वर्य देने वाली (यज्ञ-यागादि की) अनेक क्रियाओं की बातें करते हैं — (ऐसा यज्ञ करोगे तो यह कर्म-फल मिलेगा, वैसा करोगे तो वह कर्म-फल मिलेगा –ऐसी बातें करते हैं ) || ४३ ||

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌ ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥ ४४॥

bhōgaiśvaryaprasaktānāṅ tayāpahṛtacētasām.
vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyatē ৷৷ 2.44 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : उक्त प्रकार के लोग जो भोग और ऐश्वर्य की बातों में ही गर्क हैं, जिनके चित्त योग और ऐश्वर्य की कामना से ही हरे हुए हैं , उनकी बुद्धि समाधि में व्यवसायात्मक नहीं होती, स्थिर नहीं होती, (वे जब समाधि में, एकांत बैठते हैं, तब मन चंचल हो उठता है — हमने इस ‘भोग’ की आकांक्षा की थी, यह ‘ऐश्वर्य’ चाहा था, यह नहीं मिला, वह नहीं मिला — इस परेशानी में पड़ जाते हैं, उनका मन शांत नहीं होता) || ४४ ||

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌॥ ४५॥

traiguṇyaviṣayā vēdā nistraiguṇyō bhavārjuna.
nirdvandvō nityasattvasthō niryōgakṣēma ātmavān ৷৷ 2.45 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे अर्जुन ! वेदों के वर्णन का विषय (प्रकृति के) तीन गुण हैं, तुम तीनों गुणों से अलग हो जाओ, द्वंद्वों से मुक्त हो जाओ, योग-क्षेम की चिंता छोड़ दो, (आत्मा के) सत्व-भाव में नित्य स्थित हो जाओ और आत्म-बल वाला बनो || ४५ ||

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥ ४६॥

yāvānartha udapānē sarvataḥ saṅplutōdakē.
tāvānsarvēṣu vēdēṣu brāhmaṇasya vijānataḥ ৷৷ 2.46 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : चारों तरफ पानी की बाढ़ आ जाने पर कुएँ का जितना अर्थ या प्रयोजन रह जाता है, उतना ही प्रयोजन ज्ञान-प्राप्त ब्राह्मण (कर्म-योगी) के लिये सब (कर्म-काण्ड) का रह जाता है || ४६ ||

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ ४७॥

karmaṇyēvādhikārastē mā phalēṣu kadācana.
mā karmaphalahēturbhūrmā tē saṅgō.stvakarmaṇi ৷৷ 2.47 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : तुम्हे केवल कर्म करने का अधिकार है — अर्थात केवल कर्म करना तुम्हारे हाथ में है ; कर्मों के फलों पर तुम्हारा अधिकार कभी नहीं है अर्थात फल मिलना या न मिलना कभी भी तुम्हारे वश में नहीं है ; इसलिये अमुक कर्म का अमुक फल अवश्य मिले — यह हेतु, यह इच्छा मन में रख कर काम करने वाला तुम न बनो ; अकरम अर्थात कर्म के त्याग के प्रति तुम्हारा अनुराग न हो || ४७ ||

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय ।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ ४८॥

yōgasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṅ tyaktvā dhanañjaya.
siddhyasiddhyōḥ samō bhūtvā samatvaṅ yōga ucyatē ৷৷ 2.48 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे धनंजय ! योगस्थ हो कर , कर्म-योग में स्थित होकर , कर्म के फल की आसक्ति को छोड़कर, कर्म की सिद्धि या असिद्धि दोनों अवश्थाओं में समता की मनोवृत्ति को धारण करके कर्म करो | कर्म-फल मिलने या न मिलने दोनों अवस्थाओं में मन की सम अवस्था रहे — इसी को योग कहते हैं || ४८ ||

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥ ४९॥

dūrēṇa hyavaraṅ karma buddhiyōgāddhanañjaya.
buddhau śaraṇamanviccha kṛpaṇāḥ phalahētavaḥ ৷৷ 2.49 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे धनजय ! ‘बुद्धि-योग’ (कर्म-योग, निष्काम-कर्म ) से कर्म (कर्म-काण्ड , सकाम-कर्म ) बहुत घटिया है | तुम बुद्धि-योग (कर्म-योग, निष्काम-कर्म ) में शरण ग्रहण करो, फल हेतु कर्म करने वाले (कर्म-काण्डी  , सकाम-कर्मी  ) कृपण हैं , दीन या निचले दर्जे के हैं (क्योंकि दीन-भाव से फल की याचना करते हैं , भीखमंगे हैं ) || ४९ ||

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌॥ ५०॥

buddhiyuktō jahātīha ubhē sukṛtaduṣkṛtē.
tasmādyōgāya yujyasva yōgaḥ karmasu kauśalam ৷৷ 2.50 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो बुद्धि-योगी हैं, वह सुकृत तथा दुष्कृत दोनों यहीं छोड़ देता है | इसलीये तुम योग (कर्म-योग) में जुट जाओ | योग सब कामो को कुशलता से करने का नाम है || ५० ||

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌॥ ५१॥

karmajaṅ buddhiyuktā hi phalaṅ tyaktvā manīṣiṇaḥ.
janmabandhavinirmuktāḥ padaṅ gacchantyanāmayam ৷৷ 2.51 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मनीषी , ग्यानी लोग, जो बुद्धि-योगी हैं, कर्म-योगी हैं, वे कर्मों से प्राप्त होने वाले फलों को त्यागकर , जैम के बंधन से मुक्त होकर, दुखहिं दशा को प्राप्त होते हैं || ५१ ||

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥ ५२॥

yadā tē mōhakalilaṅ buddhirvyatitariṣyati.
tadā gantāsi nirvēdaṅ śrōtavyasya śrutasya ca ৷৷ 2.52 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जब तुम्हारी बुद्धि मोह की दलदल को पार कर जायेगी , तब तुम उस सबके (कर्म-काण्ड के विषय में जो कुछ भी सुना है ) प्रति उदासीन हो जाओगे || ५२ ||

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥ ५३॥

śrutivipratipannā tē yadā sthāsyati niścalā.
samādhāvacalā buddhistadā yōgamavāpsyasi ৷৷ 2.53 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : कर्म-काण्डपरक स्वर्ग-नरक करने वालों श्रुतियों से (सुनी हुयी बातों से ) तुम्हारी बुद्धि विक्षिप्त चलायमान हो रही है | जब यह बुद्धि निश्चल हो जायेगी , समाधि में टिक जायेगी , तब तुम्हे ‘कर्म-योग’ का रहस्य प्राप्त होगा || ५३ ||

[ स्थित-प्रज्ञ के लक्षण ]

अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥ ५४॥

arjuna uvāca
sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya kēśava.
sthitadhīḥ kiṅ prabhāṣēta kimāsīta vrajēta kim ৷৷ 2.54 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अर्जुन ने कहा : हे केशव ! जो व्यक्ति स्थिर-बुद्धि वाला है , स्थित-प्रज्ञा हैं जो समाधिस्थ है (जिसका वर्णन आपने अभी किया), वह किस प्रकार का होता है ? इस प्रकार के स्थिर-बुद्धि वाले , स्थिर-प्रज्ञा और समाधिस्थ व्यक्ति को किस ढंग से बोलना चाहिये , किस ढंग से बैठना चाहिए, किस ढंग से चलना चाहिये (उसके लक्षण क्या होते हैं ) || ५४ ||

श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌ ।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥ ५५॥

śrī bhagavānuvāca
prajahāti yadā kāmān sarvān pārtha manōgatān.
ātmanyēvātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadōcyatē ৷৷ 2.55 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्री भगवन ने कहा : हे पार्थ ! जब मनुष्य अपने मन में गति करने वाली सब कामनाओं को त्याग देता है, और जब वह अपने आप से अपने में ही संतुष्ट रहने लगता है, (अपने संतोष के लिये बहार के विषयों पर आश्रित नहीं रहता), तब वह ‘स्थित-प्रज्ञा’ (स्थिर-बुद्धि वाला ) कहलाता है || ५५ ||

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥ ५६॥

duḥkhēṣvanudvignamanāḥ sukhēṣu vigataspṛhaḥ.
vītarāgabhayakrōdhaḥ sthitadhīrmunirucyatē ৷৷ 2.56 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिसका मन दुःखों में उद्विग्न , बेचैन नहीं हो जाता , सुखो में जिसकी लालसा मिट जाती है, जो राग, भय और क्रोध से मुक्त हो जाता है, वह स्त्री-बुद्धि वाला व्यक्ति ‘मुनि’ कहलाता है || ५६ ||

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌ ।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ ५७॥

yaḥ sarvatrānabhisnēhastattatprāpya śubhāśubham.
nābhinandati na dvēṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā ৷৷ 2.57 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिसे किसी वस्तु के प्रति स्नेह नहीं , जो शुभ को  प्राप्त करके प्रसन्न नहीं होता, अशुभ को प्राप्त करके अप्रसन्न नहीं होता, उसकी ‘प्रज्ञा’ (बुद्धि) दृढ़ता से स्थिर हो गई है || ५७ ||

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ ५८॥

yadā saṅharatē cāyaṅ kūrmō.ṅgānīva sarvaśaḥ.
indriyāṇīndriyārthēbhyastasya prajñā pratiṣṭhitā ৷৷ 2.58 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से सिकोड़ कर अपने खोल के अंदर खींच लेता है, उसी प्रकार जब कोई पुरुष इन्द्रियों के विषयों में से अपनी इन्द्रियों को खींच लेता है तब समझो की उसको प्रज्ञा (बुद्धि) स्थिर हुयी || ५८ ||

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥ ५९॥

viṣayā vinivartantē nirāhārasya dēhinaḥ.
rasavarjaṅ rasō.pyasya paraṅ dṛṣṭvā nivartatē ৷৷ 2.59 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : देहदारी मनुष्य के निराहार होने पर विषय तो निवृत्त हो जाते हैं , परन्तु उन विषयों का रास, उनके प्रति लालसा बानी रहती है | यह लालसा पर-ब्रह्म का दर्शन करने पर निवृत्त हो जाती है || ५९ ||

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥ ६०॥

yatatō hyapi kauntēya puruṣasya vipaśicataḥ.
indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṅ manaḥ ৷৷ 2.60 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कुंती के पुत्र अर्जुन ! पुरुष चाहे कितना ही यत्न करे, कितना ही विवेकशील हो, ये मैथ डालने वाली इन्द्रियां बलपूर्वक मन को (विषयों की तरफ) खींच ही लेती हैं || ६० ||

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ ६१॥

tāni sarvāṇi saṅyamya yukta āsīta matparaḥ.
vaśē hi yasyēndriyāṇi tasya prajñā pratiṣṭhitā ৷৷ 2.61 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इसलिये इन सब इन्द्रियों को वश में करके, ‘युक्त’ होकर , मेरे साथ जुड़कर, ‘मत्पर’ होकर , मुझ में ही राम कर बैठो | जिस व्यक्ति की इन्द्रियां उसके वश में हैं उसकी प्रज्ञा (बुद्धि) स्थिर हो जाती है || ६१ ||

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते ।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ ६२॥

dhyāyatō viṣayānpuṅsaḥ saṅgastēṣūpajāyatē.
saṅgāt saṅjāyatē kāmaḥ kāmātkrōdhō.bhijāyatē ৷৷ 2.62 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इन्द्रियों के विषयों का ध्यान करते-करते पुरुष का उन विषयों के साथ ‘संग’ पैदा हो जाता है; विषयों के लगातार संग से , शयन से उनके प्रति ‘कामना’ पैदा हो जाती है ; कामना पैदा हो जाने के बाद (जब उसकी पूर्ति में बाधा पड़ती है तब ) क्रोध पैदा होता है || ६२ ||

क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ ६३॥

krōdhādbhavati saṅmōhaḥ saṅmōhātsmṛtivibhramaḥ.
smṛtibhraṅśād buddhināśō buddhināśātpraṇaśyati ৷৷ 2.63 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : क्रोध से अत्यंत मूढ़-भाव पैदा हो जाता है, मूढ़-भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है , स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि का नाश हो जाता है , बुद्धि के नष्ट हो जाने से व्यक्ति ही नष्ट हो जाता है || ६३ ||

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌ ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥ ६४॥

rāgadvēṣaviyuktaistu viṣayānindriyaiścaran.
ātmavaśyairvidhēyātmā prasādamadhigacchati ৷৷ 2.64 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो व्यक्ति राग-द्वेष हो कर , अपनी इन्द्रियों को अपने वश करके , अपने अंतःकरण को विशेष प्रकार से बना कर, शिक्षित करके संसार के विषयों में विशारता है, वह प्रसन्नता को प्राप्त होता है || ६४ ||

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥ ६५॥

prasādē sarvaduḥkhānāṅ hānirasyōpajāyatē.
prasannacētasō hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhatē ৷৷ 2.65 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जब मनुष्य प्रसन्नता के भाव में रहने लगता है, तब उसके सब दुःख दूर हो जाते हैं | प्रसन्न चित्त वाले व्यक्ति की बुद्धि शीघ्र स्थिर हो जाती है || ६५ ||

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्‌ ॥ ६६॥

nāsti buddhirayuktasya na cāyuktasya bhāvanā.
na cābhāvayataḥ śāntiraśāntasya kutaḥ sukham ৷৷ 2.66 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो व्यक्ति ब्रह्म के साथ ‘युक्त’ अर्थात जुड़ा नहीं है उसमे स्थिर-बुद्धि नहीं होती, जो व्यक्ति ब्रह्म के साथ ‘युक्त’ नहीं है उसमे ‘भावना’ भी नहीं होती | जिसमे ‘भावना’ नहीं उसमे ‘शांति’ भी नहीं , जिसे ‘शान्ति’ नहीं उसे ‘सुख’ कहाँ ? || ६६ ||

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥ ६७॥

indriyāṇāṅ hi caratāṅ yanmanō.nuvidhīyatē.
tadasya harati prajñāṅ vāyurnāvamivāmbhasi ৷৷ 2.67 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जब मन सांसारिक विषयों में भटकती हुयी इन्द्रियों के पीछे जाने लगता है तब वह मनुष्य की मति को हर लेता है, जैसे वायु, जल में नाव को बहा ले जाती है || ६७ ||

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ ६८॥

tasmādyasya mahābāhō nigṛhītāni sarvaśaḥ.
indriyāṇīndriyārthēbhyastasya prajñā pratiṣṭhitā ৷৷ 2.68 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इसलिये, हे महाबाहु ! जिस की इन्द्रियां इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार से दूर खींच ली गयी हैं, उसी की बुद्धि स्थिर समझनी चाहिए || ६८ ||

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥ ६९॥

yā niśā sarvabhūtānāṅ tasyāṅ jāgarti saṅyamī.
yasyāṅ jāgrati bhūtāni sā niśā paśyatō munēḥ ৷৷ 2.69 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : सब प्राणियों के लिए जो रात होती है — उसमें संयमी पुरुष जागता रहता है, जिसमे सब प्राणी जागते होते हैं वह आँखें खोल कर देखने वाले मुनि के लिए रात होती है || ६९ ||

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌ ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७०॥

āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṅ samudramāpaḥ praviśanti yadvat.
tadvatkāmā yaṅ praviśanti sarvē sa śāntimāpnōti na kāmakāmī ৷৷ 2.70 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : चारों ओर से पानी भरते जाने पर भी जिसकी मर्यादा अचल रहती है, ऐसे समद्र में जिस प्रकार पानी प्रवेश करता जाता है, उसी प्रकार जिस व्यक्ति में सब विषय प्रवेश करते जाते हैं और समुद्र की तरह अचल रहता है, उसकी शान्ति भंग नहीं होती, ऐसा ही व्यक्ति सच्ची शान्ति को प्राप्त करता है , और जो कामनाओं , इच्छाओं के पीछे भागता है, जो ‘कामकामी’ है, कामनाओं की कामना करता रहता है, उसे शांति प्राप्त नहीं होती || ७० ||

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥ ७१॥

vihāya kāmānyaḥ sarvānpumāṅścarati niḥspṛhaḥ.
nirmamō nirahaṅkāraḥ sa śāṅtimadhigacchati ৷৷ 2.71 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो पुरुष सब कामनाओं को, इच्छाओं को त्याग देता है, ‘निस्पृह’ होकर — लालसा से रहित होकर , ‘निर्मम’ होकर — ममता से रहित होकर, ‘निरहंकार’ होकर — अहंकार से रहित होकर, ‘मैं’ की भावना को छोड़कर विचरता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है || ७१ ||

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥ ७२॥

ēṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṅ prāpya vimuhyati.
sthitvā.syāmantakālē.pi brahmanirvāṇamṛcchati ৷৷ 2.72 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे अर्जुन ! यही ब्राह्मी-स्थिति है ( संसार में स्थित होने के स्थान में ब्रह्म में स्थित हो जाना है ), इसे प्राप्त हो जाने पर कोई भी ‘मोह’ नहीं रहता | अगर अंतकाल में भी किसी को यह स्थिति प्राप्त हो जाय तो वह ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त होता है, ब्रह्म में लीन हो जाता है या महान निर्वाण को प्राप्त करता है || ७२ ||

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः |

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