अष्टदश अध्याय – मोक्ष-संन्यास-योग

[ संन्यास तथा त्याग के लक्षण ]

अर्जुन उवाच
सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌ ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥ १॥

अर्जुन उवाच
saṅnyāsasya mahābāhō tattvamicchāmi vēditum.
tyāgasya ca hṛṣīkēśa pṛthakkēśiniṣūdana ৷৷ 18.1৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अर्जुन ने कहा : हे महाबाहु ! हे हृषिकेश ! हे केशिनिषूदन कृष्ण ! मैं ‘संन्यास’ तथा ‘त्याग’ का पृथक-पृथक तात्त्विक रूप, यथार्थ रूप जानना चाहता हूँ || १ ||

श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणा न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥ २॥

śrī bhagavānuvāca
kāmyānāṅ karmaṇāṅ nyāsaṅ saṅnyāsaṅ kavayō viduḥ.
sarvakarmaphalatyāgaṅ prāhustyāgaṅ vicakṣaṇāḥ ৷৷ 18.2 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्री भगवान् ने कहा : बुद्धिमान लोग काम्य कर्मों के त्याग को ‘संन्यास’ कहते हैं , और सब कर्मों के फलों के त्याग को विद्वान् लोग ‘त्याग’ कहते हैं || २ ||

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥ ३॥

tyājyaṅ dōṣavadityēkē karma prāhurmanīṣiṇaḥ.
yajñadānatapaḥkarma na tyājyamiti cāparē ৷৷ 18.3 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : कुछ मनीषियों का कथन है कि ‘कर्म’ सदा दोषयुक्त होता है , ( यह दोष रहित हो ही नहीं सकता इसलिये ) इसका ‘त्याग’ कर देना चाहिये ; दूसरे लोग कहते हैं कि ‘यज्ञ’, ‘दान’, ‘तप’ और ‘कर्म’ का कभी त्याग नहीं करना चाहिये || ३ ||

निश्चयं श्रृणु में तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥ ४॥

niścayaṅ śrṛṇu mē tatra tyāgē bharatasattama.
tyāgō hi puruṣavyāghra trividhaḥ saṅprakīrtitaḥ ৷৷ 18.4 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे भरतकुल में श्रेष्ठ !  इस त्याग के विषय में मेरा निर्णय सुनो ! हे पुरुषव्याघ्र — पुरुषों में व्याघ्र के समान तेजस्वी अर्जुन — ‘त्याग’ ( सत्त्व, रज, तम — इन ) तीन प्रकार का बताया गया है || ४ ||

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्‌ ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्‌॥ ५॥

yajñadānatapaḥkarma na tyājyaṅ kāryamēva tat.
yajñō dānaṅ tapaścaiva pāvanāni manīṣiṇām ৷৷ 18.5 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ‘यज्ञ’-‘दान’-‘तप’-‘कर्म’ — त्याज्य नहीं हैं, इन्हें तो करना ही चाहिये | ‘तज्ञ’-‘दान’-‘तप’ तो विद्वान को ( भी ) पवित्र कर देते हैं || ५ ||

एतान्यपि तु कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्‌॥ ६॥

ētānyapi tu karmāṇi saṅgaṅ tyaktvā phalāni ca.
kartavyānīti mē pārtha niśicataṅ matamuttamam ৷৷ 18.6 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : और ( सब प्रकार के ) ‘कर्म’ अगर आसक्ति और फलाशा छोड़कर किये जायें , तो ( सभी ) ‘कर्म’ करने हुए चाहिये | हे पार्थ ! यह मेरा निश्चित और अन्तिम मत है || ६ ||

नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥ ७॥

niyatasya tu saṅnyāsaḥ karmaṇō nōpapadyatē.
mōhāttasya parityāgastāmasaḥ parikīrtitaḥ ৷৷ 18.7 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो कर्म ‘नियत’ कर दिए गए हैं ( शास्त्रों में जिनका विधान किया गया है — ब्रह्मचारी को यह करना चाहिये , गृहस्थी को यह, वानप्रस्थी और संन्यासी को यह ), उनका त्याग उचित नहीं है | अज्ञानवश उनका त्याग कर देना ‘तामस-त्याग’ कहलाता है || ७ ||

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्‌ ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्‌॥ ८॥

duḥkhamityēva yatkarma kāyaklēśabhayāttyajēt.
sa kṛtvā rājasaṅ tyāgaṅ naiva tyāgaphalaṅ labhēt ৷৷ 18.8 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो व्यक्ति किसी ‘नियत’ कर्म का इसलिये त्याग कर देता है कि उसके करने में उसे मानसिक दुःख होता है या शारीरिक कष्ट होता है, या कष्ट की संभावना है, भय है , वह ‘राजस-त्याग’ करता है , और उसे ‘त्याग’ का फल नहीं मिलता || ८ ||

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन ।
सङ्‍गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥ ९॥

kāryamityēva yatkarma niyataṅ kriyatē.rjuna.
saṅgaṅ tyaktvā phalaṅ caiva sa tyāgaḥ sāttvikō mataḥ ৷৷ 18.9 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे अर्जुन ! जो व्यक्ति ‘नियत’ कर्म को अपना कर्तव्य समझ कर,  ( भले ही किसी प्रकार का कष्ट क्यों न हो ) यह तो करना ही है , ऐसा समझ कर करता है , और उस कर्म के प्रति आसक्ति तथा फलाशा दोनों को छोड़ कर कर्म करता है , उसका त्याग ‘सात्त्विक-त्याग’ माना जाता है || ९ ||

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥ १०॥

na dvēṣṭyakuśalaṅ karma kuśalē nānuṣajjatē.
tyāgī sattvasamāviṣṭō mēdhāvī chinnasaṅśayaḥ ৷৷ 18.10 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो व्यक्ति किसी अप्रिय कर्म से घृणा नहीं करता , किसी प्रिय कर्म में अनुरक्त नहीं हो जाता , वह ( वास्तविक अर्थों में ) त्यागी है , सत्त्वगुणी है, मेधावी है , संशय से रहित है || १० ||

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥ ११॥

na hi dēhabhṛtā śakyaṅ tyaktuṅ karmāṇyaśēṣataḥ.
yastu karmaphalatyāgī sa tyāgītyabhidhīyatē ৷৷ 18.11৷৷

हिन्दी में भावार्थ : किसी भी देहधारी के लिए कर्मों का पूर्ण त्याग संभव नहीं है , परन्तु जो कर्म के फल को त्याग देता है, वही त्यागी कहलाता है ( सिर्फ भगवा पेहेन कर सब काम छोड़ देना और अपने को संन्यासी कहते फिरना त्यागी का लक्षण नहीं है ) || ११ ||

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्‌ ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्‌॥ १२॥

aniṣṭamiṣṭaṅ miśraṅ ca trividhaṅ karmaṇaḥ phalam.
bhavatyatyāgināṅ prētya na tu saṅnyāsināṅ kvacit ৷৷ 18.12 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिन्होंने कर्म के फल का त्याग नहीं किया उन्हें मरने के बाद कर्मों का तीन प्रकार का फल मिलता है — प्रिय, अप्रिय तथा प्रियप्रिय ; परन्तु जिन्होंने कर्म-फल का त्याग कर दिया है उन्हें कोई फल नहीं मिलता ( अर्थात , उनके लिए ‘कर्म’ किसी प्रकार का बाधक नहीं होता ) || १२ ||

[ फलाशा तथा आसक्ति के त्याग का दार्शनिक आधार ]

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्‌॥ १३॥

pañcaitāni mahābāhō kāraṇāni nibōdha mē.
sāṅkhyē kṛtāntē prōktāni siddhayē sarvakarmaṇām ৷৷ 18.13 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे महाबाहु ! कर्म का फल जिन कारणों से मिलता है, उन कारणों को साँख्य-सिद्धान्त में बतलाया गया है कि वे पाँच कारण हैं | ( वे पाँच कारण क्या हैं ? ) — यह मुझ से सुनो || १३ ||

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌ ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌॥ १४॥

adhiṣṭhānaṅ tathā kartā karaṇaṅ ca pṛthagvidham.
vividhāśca pṛthakcēṣṭā daivaṅ caivātra pañcamam ৷৷ 18.14 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( वे पाँच कारण हैं : ) कार्य का स्थान, कर्ता, भिन्न-भिन्न प्रकार के साधन, भिन्न-भिन्न प्रकार की चेष्टाएँ तथा पाँचवाँ भाग्य — दैव ( अर्थात, वह कारण जो हमारी समझ से बाहर है ) || १४ ||

शरीरवाङ्‍मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५॥

śarīravāṅmanōbhiryatkarma prārabhatē naraḥ.
nyāyyaṅ vā viparītaṅ vā pañcaitē tasya hētavaḥ ৷৷ 18.15 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मनुष्य अपने शरीर, अपनी वाणी तथा अपने मन से जो भी कोई उचित या अनुचित कर्म प्रारम्भ करता है उसमें ये पाँच हेतु, पाँच कारण होते हैं || १५ ||

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥ १६॥

tatraivaṅ sati kartāramātmānaṅ kēvalaṅ tu yaḥ.
paśyatyakṛtabuddhitvānna sa paśyati durmatiḥ ৷৷ 18.16 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : तब ऐसी हालत में ( जब प्रत्येक कर्म के पाँच कारण हैं ) जो व्यक्ति केवल अपने को कर्म का कर्ता मानने लगता है , वह ऐसा असंस्कारी बुद्धि के कारण समझता है ; वह दुर्मति कुछ समझता ही नहीं || १६ ||

यस्य नाहङ्‍कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७॥

yasya nāhaṅkṛtō bhāvō buddhiryasya na lipyatē.
hatvāpi sa imāōllōkānna hanti na nibadhyatē ৷৷ 18.17 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो अहंकार की भावना से मुक्त है ( अर्थात जो ‘निष्काम’ है ), जिसकी बुद्धि निर्लिप्त है ( अर्थात जो ‘निस्संग’ है ) , वह इन सब लोगों को मारता हुआ भी नहीं मारता , वह ( कर्म करता भी कर्मों के ) बन्धन में नहीं पड़ता || १७ ||

[ त्रिपुटी की विविधता ]

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥ १८॥

jñānaṅ jñēyaṅ parijñātā trividhā karmacōdanā.
karaṇaṅ karma kartēti trividhaḥ karmasaṅgrahaḥ ৷৷ 18.18 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : कर्म की प्रेरणा देने वाले त्रिक हैं — ‘ज्ञाता’, ‘ज्ञेय’ तथा ‘ज्ञान’ |  ( जब ज्ञान से कर्म होने लगता है तब ) कर्म के अंग हैं — ‘कर्ता’, ‘कर्म’ तथा ‘करण’ | ( ‘ज्ञाता’-‘ज्ञेय’-‘ज्ञान’ के त्रिक को वेदान्तशास्त्र में ‘त्रिपुटी’ कहा जाता है | ) || १८ ||

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छ्णु तान्यपि ॥ १९॥

jñānaṅ karma ca kartā ca tridhaiva guṇabhēdataḥ.
prōcyatē guṇasaṅkhyānē yathāvacchṛṇu tānyapi ৷৷ 18.19 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( इन छहों में ‘ज्ञान’-‘कर्म’-‘कर्ता’ — ये ही तीन मुख्य हैं ) सांख्यशास्त्र में गुणों के भेद के कारण ‘ज्ञान’-‘कर्म’-‘कर्ता’ — इन तीनो के तीन-तीन प्रकार के विविध भेद कहे गये हैं | इन भेदों को तुम भली प्रकार से सुनो || १९ ||

[ त्रिविध ज्ञान ]

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥ २०॥

sarvabhūtēṣu yēnaikaṅ bhāvamavyayamīkṣatē.
avibhaktaṅ vibhaktēṣu tajjñānaṅ viddhi sāttvikam ৷৷ 18.20 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिस ज्ञान के द्वारा ( मनुष्य ) सब भूतों में — जड़-चेतन में — एक ही अविनाशी सत्ता को देखता है , ( जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य ) विभक्तों में अविभक्त को देखता है, उस ज्ञान को तुम सात्त्विक-ज्ञान समझो || २० ||

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्‌ ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्‌॥ २१॥

pṛthaktvēna tu yajjñānaṅ nānābhāvānpṛthagvidhān.
vētti sarvēṣu bhūtēṣu tajjñānaṅ viddhi rājasam ৷৷ 18.21 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : और, जो ज्ञान ( अर्थात जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य ) सब भूतों में — जड़-चेतन में — उनकी पृथकता के कारण ( सत्ता को एक न देखकर ) विविध जानता है , उस ज्ञान को तुम राजसिक-ज्ञान समझो || २१ ||

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्‌।
अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम्‌॥ २२॥

yattu kṛtsnavadēkasminkāryē saktamahaitukam.
atattvārthavadalpaṅ ca tattāmasamudāhṛtam ৷৷ 18.22 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : परन्तु जो ज्ञान किसी एक कार्य को ही सब-कुछ मान लेता है, वह ‘अहैतुक’ है — कारण का पता नहीं लगाता, ‘अतत्त्वार्थ’ है — तत्त्व का पता नहीं लगाता, अल्प है — संकीर्ण है, सम्पूर्ण की दृष्टि से नहीं देखता, ऐसा ज्ञान तामस-ज्ञान कहलाता है || २२ ||

[ त्रिविध कर्म ]

नियतं सङ्‍गरहितमरागद्वेषतः कृतम।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥ २३॥

niyataṅ saṅgarahitamarāgadvēṣataḥ kṛtam.
aphalaprēpsunā karma yattatsāttvikamucyatē ৷৷ 18.23 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वह कर्म , जो ‘नियत’ है ( जिसे करना आवश्यक है, जो हमारा कर्तव्य-कर्म है ), जिसे आसक्ति के बिना और राग-द्वेष के बिना किया जाता है , जिसे फल की इच्छा से रहित व्यक्ति द्वारा किया जाता है, ऐसा कर्म सात्त्विक-कर्म कहलाता है || २३ ||

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्‍कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्‌॥ २४॥

yattu kāmēpsunā karma sāhaṅkārēṇa vā punaḥ.
kriyatē bahulāyāsaṅ tadrājasamudāhṛtam ৷৷ 18.24 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : परन्तु जो कर्म फल की प्राप्ति की इच्छा वाले व्यक्ति द्वारा, अहंकार की भावना से प्रेरित होकर किया जाता है, जिसमें बहुत परिश्रम लगता है, ऐसा कर्म राजस-कर्म कहलाता है || २४ ||

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्‌ ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥ २५॥

anubandhaṅ kṣayaṅ hiṅsāmanapēkṣya ca pauruṣam.
mōhādārabhyatē karma yattattāmasamucyatē ৷৷ 18.25 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो कर्म , क्या ‘परिणाम’ होगा, क्या ‘हानि’ हो जायगी, किस-किस की ‘हिंसा’ होगी, अपना ‘सामर्थ्य’ भी उस काम को करने का है या नहीं — इन सब बातों पर विचार किये बिना मूर्खता से किया जाता है, वह तामस-कर्म कहलाता है || २५ ||

[ त्रिविध कर्ता ]

मुक्तसङ्‍गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥ २६॥

muktasaṅgō.nahaṅvādī dhṛtyutsāhasamanvitaḥ.
siddhyasiddhyōrnirvikāraḥ kartā sāttvika ucyatē ৷৷ 18.26 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( ‘ज्ञान’ के बिना ‘कर्म’ नहीं होता, ‘कर्ता’ के बिना ‘कर्म’ नहीं होता, इसलिए ‘कर्ता’ का त्रिविध क्या है ? ) जो कर्ता आसक्ति से मुक्त है, जो अहंकार की बातें नहीं करता , जो धैर्य और उत्साह से युक्त है, जो सफलता एवं विफलता में निर्विकार रहता है, वह कर्ता सात्त्विक कहलाता है || २६ ||

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७॥

rāgī karmaphalaprēpsurlubdhō hiṅsātmakō.śuciḥ.
harṣaśōkānvitaḥ kartā rājasaḥ parikīrtitaḥ ৷৷ 18.27 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो कर्ता राग से, आसक्ति से प्रेरित है, जो अपने कर्मों का फल पाने के लिए उत्सुक रहता है, जो लोभी है, जिसका स्वभाव हिंसा करने का है, जो अपवित्र है, जो हर्ष और शोक से लिपायमान है, वह कर्ता राजसिक कहलाता है || २७ ||

आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८॥

ayuktaḥ prākṛtaḥ stabdhaḥ śaṭhō naiṣkṛtikō.lasaḥ.
viṣādī dīrghasūtrī ca kartā tāmasa ucyatē ৷৷ 18.28 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो कर्ता ‘अयुक्त’ है — कहीं चित्त नहीं टिका सकता ; ‘प्राकृत’ है — प्रकृति से जैसा आया था वैसे-का-वैसा बना है, अशिक्षित है, असंस्कृत है ; ‘स्तब्ध’ है — हठी है; ‘शठ’ है — धोखेबाज है ; ‘नैष्कृतिक’ है — निस+कृत=काटना, छेद करना — दूसरों के काम में छेद करता रहता है ; ‘अलस’ है — आलसी है ; ‘विषादी’ है — हर समय संसार में दुःख-ही-दुःख देखता है; ‘दीर्घसूत्री’ है — हर काम को या तो टालता जाता है या हर काम में देर लगा देता है , वह करता तामस कहलाता है || २८ ||

[ त्रिविध बुद्धि ]

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय॥ २९॥

buddhērbhēdaṅ dhṛtēścaiva guṇatastrividhaṅ śrṛṇu.
prōcyamānamaśēṣēṇa pṛthaktvēna dhanañjaya ৷৷ 18.29 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे धनञ्जय ! अब तुम सत्त्व-रज-तम — इन तीन गुणों के अनुसार ‘बुद्धि’ और ‘धृति’ तीन भेदों को सुनो जिन्हें मैं पूरी तरह से अलग-अलग करके बतलाता हूँ || २९ ||

प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ ३०॥

pravṛttiṅ ca nivṛttiṅ ca kāryākāryē bhayābhayē.
bandhaṅ mōkṣaṅ ca yā vētti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī ৷৷ 18.30 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्ति-मार्ग और निवृत्ति-मार्ग के भेद को समझती है, जो करने योग्य कार्य और न करने योग्य कार्य में भेद कर सकती है, जो इस बात को समझती है कि किस्से डरना चाहिए और किससे नहीं डरना चाहिए, क्या वस्तु आत्मा को बन्धन में डालती है , क्या बन्धन से छुड़ा देती है , वह बुद्धि सात्त्विकी होती है || ३० ||

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥ ३१॥

yayā dharmamadharmaṅ ca kāryaṅ cākāryamēva ca.
ayathāvatprajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī ৷৷ 18.31৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पार्थ ! जिस बुद्धि के द्वारा मनुष्य धर्म और अधर्म को, कार्य और अकार्य को ठीक-ठीक नहीं समझ पाता , वह बुद्धि राजसी होती है || ३१ ||

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥ ३२॥

adharmaṅ dharmamiti yā manyatē tamasā৷৷vṛtā.
sarvārthānviparītāṅśca buddhiḥ sā pārtha tāmasī ৷৷ 18.32 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पार्थ ! जिस बुद्धि के द्वारा अन्धकार के आवरण से घिरा हुआ मनुष्य अधर्म को धर्म समझने लगता है , और सब बातों को उल्टा देखने लगता है, वह बुद्धि तामसी होती है || ३२ ||

[ त्रिविध धृति ]

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ ३३॥

dhṛtyā yayā dhārayatē manaḥprāṇēndriyakriyāḥ.
yōgēnāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī ৷৷ 18.33 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पार्थ ! जिस धृति के द्वारा मनुष्य मन, प्राण, इन्द्रियाँ — इनकी गतिविधियों को एक केन्द्र में टिकाये रखता है, उन्हें इधर-उधर नहीं भागने देता , वह धृति सात्त्विक होती है || ३३ ||

यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन।
प्रसङ्‍गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥ ३४॥

yayā tu dharmakāmārthān dhṛtyā dhārayatē.rjuna.
prasaṅgēna phalākāṅkṣī dhṛtiḥ sā pārtha rājasī ৷৷ 18.34 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे अर्जुन ! जिस धृति के द्वारा मनुष्य धर्म, अर्थ, काम — इनके साथ चिपका रहता है, फल की इच्छा बनाये रखता है , हे पार्थ ! वह धृति राजसिक होती है || ३४ ||

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५॥

yayā svapnaṅ bhayaṅ śōkaṅ viṣādaṅ madamēva ca.
na vimuñcati durmēdhā dhṛtiḥ sā pārtha tāmasī ৷৷ 18.35 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पार्थ ! जिस धृति के द्वारा मूर्ख मनुष्य निद्रा, भय , शोक, विषाद , मद — इनको नहीं त्यागता , वह धृति तामसिक होती है || ३५ ||

[ त्रिविध सुख ]

सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥ ३६॥

sukhaṅ tvidānīṅ trividhaṅ śrṛṇu mē bharatarṣabha.
abhyāsādramatē yatra duḥkhāntaṅ ca nigacchati ৷৷ 18.36 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे भरत-श्रेष्ठ ! अब तुम मुझसे तीन प्रकार के सुख के विषय में सुनो — ऐसे सुख के विषय में जिसमें दीर्घकाल तक रहने के कारण मनुष्य रम जाता है , और जिसमें उसके दुःख का अन्त  हो जाता है | ( सुख में रम जाना ‘असत्यात्मक’ — सकारात्मक — अनुभव है, दुःख का अन्त हो जाना ‘नास्त्यात्मक’ — नकारात्मक — अनुभव है ) || ३६ ||

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥ ३७॥

yattadagrē viṣamiva pariṇāmē.mṛtōpamam.
tatsukhaṅ sāttvikaṅ prōktamātmabuddhiprasādajam ৷৷ 18.37 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो सुख प्रारम्ब में विष जैसा प्रतीत होता है, अन्त में अमृत के समान होता है, जो आत्मनिष्ठ बुद्धि के प्रसाद से प्राप्त होता है, वह सात्त्विक सुख है || ३७ ||

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌ ॥ ३८॥

viṣayēndriyasaṅyōgādyattadagrē.mṛtōpamam.
pariṇāmē viṣamiva tatsukhaṅ rājasaṅ smṛtam ৷৷ 18.38 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो सुख विषय तथा इन्द्रियों के संयोग से उत्पन्न होता है , जो शुरू में अमृत के समान परन्तु परिणाम में विष के समान होता है , वह सुख राजसिक है || ३८ ||

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥ ३९॥

yadagrē cānubandhē ca sukhaṅ mōhanamātmanaḥ.
nidrālasyapramādōtthaṅ tattāmasamudāhṛtam ৷৷ 18.39 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो सुख प्रारम्भ और अन्त में आत्मा को मोह में फँसाये रखता है , जो सुख निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होता है , वह सुख तामसिक है || ३९ ||

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः॥ ४०॥

na tadasti pṛthivyāṅ vā divi dēvēṣu vā punaḥ.
sattvaṅ prakṛtijairmuktaṅ yadēbhiḥ syātitrabhirguṇaiḥ ৷৷ 18.40 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इस पृथ्वी लोक पर कोई ( मनुष्य ) ऐसा नहीं है और देवलोक में कोई देवता ऐसा नहीं है जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न सत्त्व-रज-तम — इन तीन गुणों से मुक्त हो || ४० ||

[ स्वभावज कर्म ]

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ ४१॥

brāhmaṇakṣatriyaviśāṅ śūdrāṇāṅ ca paraṅtapa.
karmāṇi pravibhaktāni svabhāvaprabhavairguṇaiḥ ৷৷ 18.41 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे परंतप — शत्रुओं को तपाने वाले अर्जुन ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के अपने-अपने स्वभाव से उत्पन्न हुए सत्त्व-रज-तम — इन गुणों के कारण इनके कर्म अलग-अलग बंटे हुए हैं || ४१ ||

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌॥ ४२॥

śamō damastapaḥ śaucaṅ kṣāntirārjavamēva ca.
jñānaṅ vijñānamāstikyaṅ brahmakarma svabhāvajam ৷৷ 18.42 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : शान्त-स्वभाव, आत्म-संयम, तपस्या, पवित्रता, सहन-शक्ति , सरलता , ज्ञान , अनुभव, आस्तिकता – ये ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं || ४२ ||

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥ ४३॥

śauryaṅ tējō dhṛtirdākṣyaṅ yuddhē cāpyapalāyanam.
dānamīśvarabhāvaśca kṣātraṅ karma svabhāvajam ৷৷ 18.43 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वीरता, तेज, धीरता, चतुरता, युद्ध में पीठ न दिखाना, दानशीलता और हुकूमत करना — ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं || ४३ ||

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥ ४४॥

kṛṣigaurakṣyavāṇijyaṅ vaiśyakarma svabhāvajam.
paricaryātmakaṅ karma śūdrasyāpi svabhāvajam ৷৷ 18.44 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : कृषि, गो-रक्षा, व्यापार — ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं ; शूद्र का स्वाभाविक कर्म सेवा करना है || ४४ ||

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥ ४५॥

svē svē karmaṇyabhirataḥ saṅsiddhiṅ labhatē naraḥ.
svakarmanirataḥ siddhiṅ yathā vindati tacchṛṇu ৷৷ 18.45 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अपने-अपने कर्म में जो व्यक्ति ( अपने स्वभाव के अनुसार ) लगा रहता है, वह सिद्धि को प्राप्त कर लेता है | अपने कर्म में ही लगे रहने से मनुष्य सिद्धि को जैसे प्राप्त कर लेता है — वह सुनो || ४५ ||

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ ४६॥

yataḥ pravṛttirbhūtānāṅ yēna sarvamidaṅ tatam.
svakarmaṇā tamabhyarcya siddhiṅ vindati mānavaḥ ৷৷ 18.46 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिससे सब प्राणी जन्म लेते हैं , जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, उस परमात्मा की , अपने कर्म से पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है || ४६ ||

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌ ॥ ४७॥

śrēyānsvadharmō viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt.
svabhāvaniyataṅ karma kurvannāpnōti kilbiṣam ৷৷ 18.47 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अपना धर्म — ‘स्व-धर्म’ — यदि ठीक तरह पालन न किया जा सके, और दूसरे का धर्म — ‘पर-धर्म’ — यदि पालन करने में आसान हो, तो भी ‘स्व-धर्म’ का पालन करना अधिक अच्छा है | स्वभाव के अनुसार ‘नियत’ कर्म को करने वाले व्यक्ति को पाप नहीं लगता || ४७ ||

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्‌।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८॥

sahajaṅ karma kauntēya sadōṣamapi na tyajēt.
sarvārambhā hi dōṣēṇa dhūmēnāgnirivāvṛtāḥ ৷৷ 18.48 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कौन्तेय ! मनुष्य को अपने सहज स्वभाव के अनुसार जो कार्य हो उसे छोड़ना नहीं चाहिए चाहे उसमें दोष भी क्यों न हो, क्योंकि जैसे आग धुएँ से ढकी रहती है वैसे सब कर्म किसी-न-किसी दोष से ढके रहते हैं || ४८ ||

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९॥

asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ.
naiṣkarmyasiddhiṅ paramāṅ saṅnyāsēnādhigacchati ৷৷ 18.49 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिसने सब कहीं से आसक्ति को खींच लिया है, जिसने मन को जीत लिया है, जिसने कामनाओं को त्याग दिया है , वह इस प्रकार के संन्यास द्वारा उस परम सिद्धि को पा लेता है जिसे ‘नैष्कर्म्य’ — ‘कर्म का न होना’ कहा जा सकता है || ४९ ||

[ परम-सिद्धि की प्राप्ति ]

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥ ५०॥

siddhiṅ prāptō yathā brahma tathāpnōti nibōdha mē.
samāsēnaiva kauntēya niṣṭhā jñānasya yā parā ৷৷ 18.50 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कौन्तेय ! ‘ सिद्धि’ को प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ति ‘ब्रह्म’ को , जो ज्ञान की पराकाष्ठा है, कैसे प्राप्त कर लेता है , यह मुझ से संक्षेप में सुनो || ५० ||

बुद्ध्‌या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१॥

buddhyā viśuddhayā yuktō dhṛtyā৷৷tmānaṅ niyamya ca.
śabdādīn viṣayāṅstyaktvā rāgadvēṣau vyudasya ca ৷৷ 18.51 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर , अपने-आपको धैर्य — अर्थात दृढ़ता — पूर्वक संयम में रखकर, शब्द आदि इन्द्रियों के विषयों की त्याग कर , राग और द्वेष को नष्ट करके || ५१ ||

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥ ५२॥

viviktasēvī laghvāśī yatavākkāyamānasaḥ.
dhyānayōgaparō nityaṅ vairāgyaṅ samupāśritaḥ ৷৷ 18.52 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : एकान्त-स्थान का सेवन करने वाला , अल्प आहार करने वाला , वाणी-शरीर-मन को वश में  रखने वाला, सदा ध्यान तथा एकाग्रता में तत्पर, वैराग्य की शरण लिये हुए || ५२ ||

अहङकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्‌।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ ५३॥

ahaṅkāraṅ balaṅ darpaṅ kāmaṅ krōdhaṅ parigraham.
vimucya nirmamaḥ śāntō brahmabhūyāya kalpatē ৷৷ 18.53 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अहंकार, बल, दर्प, काम , क्रोध और धन-सम्पत्ति को छोड़ कर , ममता से रहित होकर जो शान्त स्वभाव का हो जाता है, वह — ‘ब्रह्मभूय’ — अर्थात ब्रह्म के साथ एकाकार होने के योग्य — हो जाता है || ५३ ||

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्‌ ॥ ५४॥

brahmabhūtaḥ prasannātmā na śōcati na kāṅkṣati.
samaḥ sarvēṣu bhūtēṣu madbhaktiṅ labhatē parām ৷৷ 18.54 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ‘ब्रह्मभूत’ — अर्थात ब्रह्म के साथ एकाकार होने पर साधक ‘प्रसन्नात्मा’ हो जाता है, न उसे कोई शोक होता है, न उसे कोई इच्छा रहती है | ऐसा व्यक्ति सब प्राणियों को सम-दृष्टि से देखने लगता है और मेरी परम भक्ति को प्राप्त कर लेता है || ५४ ||

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्‌॥ ५५॥

bhaktyā māmabhijānāti yāvānyaścāsmi tattvataḥ.
tatō māṅ tattvatō jñātvā viśatē tadanantaram ৷৷ 18.55 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( वह ) भक्ति के द्वारा इस बात को जान लेता है कि मैं तात्विक रूप में कितना हूँ , और कौन हूँ | उसके अनन्तर मुझे तत्त्व रूप में जान लेने पर वह मुझ में प्रवेश पा जाता है || ५५ ||

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्‌॥ ५६॥

sarvakarmāṇyapi sadā kurvāṇō madvyapāśrayaḥ.
matprasādādavāpnōti śāśvataṅ padamavyayam ৷৷ 18.56 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मेरा आश्रय पाकर सदा सब प्रकार के कर्मों को करता हुआ वह मेरे प्रसाद से , मेरी कृपा से शाश्वत अमर पद को प्राप्त करता है || ५६ ||

[ संकटों से पार होने का उपाय ]

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७॥

cētasā sarvakarmāṇi mayi saṅnyasya matparaḥ.
buddhiyōgamupāśritya maccittaḥ satataṅ bhava ৷৷ 18.57 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अपने चित्त से सब कर्मों को मुझे समर्पित करके, मुझे ही अपना लक्ष्य समझता हुआ, ‘बुद्धि-योग’ का आश्रय लेकर, तुम ‘मच्चित्त’ हो जाओ, अपने चित्त को निरन्तर मुझ में लगाए रखो || ५७ ||

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्वमहाङ्‍कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥ ५८॥

maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi.
atha cēttvamahaṅkārānna śrōṣyasi vinaṅkṣyasi ৷৷ 18.58 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ‘मच्चित्त’ होकर — अपने चित्त को मुझ में लगा कर, तुम मेरी कृपा से सब संकटों को पार कर जाओगे ; परन्तु अगर अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनोगे , तो विनष्ट हो जाओगे || ५८ ||

[ प्रकृति का वेग ]

यदहङ्‍कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥ ५९॥

yadahaṅkāramāśritya na yōtsya iti manyasē.
mithyaiṣa vyavasāyastē prakṛtistvāṅ niyōkṣyati ৷৷ 18.59 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : यदि ‘अहंकार’ के वश में होकर तुम यह मान रहे हो कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तो तुम्हारा ये निश्चय व्यर्थ है, ‘प्रकृतिस्त्वाम् नियोक्ष्यति’ — ‘प्रकृति’, अर्थात संसार का संचालन करने वाली सत्ता तुम से जो काम लेना चाहती है उस काम में तुम्हे जबर्दस्ती जोत देगी या तुम्हारी प्रकृति अर्थात तुम्हारा स्वभाव तुम्हे युद्ध करने के लिए विवश कर देगा || ५९ ||

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्‌॥ ६०॥

svabhāvajēna kauntēya nibaddhaḥ svēna karmaṇā.
kartuṅ nēcchasi yanmōhātkariṣyasyavaśō.pi tat ৷৷ 18.60 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कौन्तेय ! तुम मोहवश जिस काम को नहीं करना चाहते उसे तुम अपने स्वभाव से उत्पन्न होने वाले कर्म से बंधा हुआ विवश होकर करोगे || ६० ||

[ ईश्वर की शरण का गुह्य उपदेश ]

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥ ६१॥

īśvaraḥ sarvabhūtānāṅ hṛddēśē.rjuna tiṣṭhati.
bhrāmayansarvabhūtāni yantrārūḍhāni māyayā ৷৷ 18.61 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे अर्जुन ! ईश्वर सब प्राणियों के ह्रदय-प्रदेश में बैठा हुआ है और वह ( वहाँ से ) उनको इस प्रकार घुमा रहा है मानो वे किसी यन्त्र पर चढ़े हुए हों || ६१ ||

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥ ६२॥

tamēva śaraṇaṅ gaccha sarvabhāvēna bhārata.
tatprasādātparāṅ śāntiṅ sthānaṅ prāpsyasi śāśvatam ৷৷ 18.62 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे भारत ! तू ‘सर्वभाव’ से , अपन संपूर्ण अस्तितत्व को समेट कर उसी की शरण में जा | उसकी कृपा से तुम्हे परम शान्ति और शाश्वत भाव प्राप्त होगा || ६२ ||

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‍गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३॥

iti tē jñānamākhyātaṅ guhyādguhyataraṅ mayā.
vimṛśyaitadaśēṣēṇa yathēcchasi tathā kuru ৷৷ 18.63 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : यह ज्ञान मैंने तुम्हे बतलाया , ऐसा ज्ञान जो सब रहस्यों से बड़ा रहस्य है | इस ज्ञान पर पूरी तरह से विचार करके — ‘ यथा इच्छसि तथा कुरु ‘ — जैसा चाहे वैसा करो || ६३ ||

सर्वगुह्यतमं भूतः श्रृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्‌ ॥ ६४॥

sarvaguhyatamaṅ bhūyaḥ śrṛṇu mē paramaṅ vacaḥ.
iṣṭō.si mē dṛḍhamiti tatō vakṣyāmi tē hitam ৷৷ 18.64 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अब तुम मेरे परम वचन को फिर सुन लो — यह गुह्य, गुह्यतर, गुह्यतम वचन है | क्योंकि तुम मेरे परम प्रिय हो इसलिए मैं तुम्हे बतलाऊँगा कि तुम्हारे लिए क्या हितकर है || ६४ ||

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ ६५॥

manmanā bhava madbhaktō madyājī māṅ namaskuru.
māmēvaiṣyasi satyaṅ tē pratijānē priyō.si mē ৷৷ 18.65 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अपने को मुझ में लगाओ, मेरा भक्त बनो , मेरा पूजन करो, मुझे नमस्कार करो , ऐसा करने तुम मुझ तक पहुँच जाओगे | क्योंकि तुम मेरे प्रिय हो इसलिए मैं तुम्हें सचमुच इस बात का वचन देता हूँ || ६५ ||

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ ६६॥

sarvadharmānparityajya māmēkaṅ śaraṇaṅ vraja.
ahaṅ tvā sarvapāpēbhyō mōkṣayiṣyāmi mā śucaḥ ৷৷ 18.66 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : सब धर्मों को छोड़ कर तुम केवल मेरी शरण में आ जाओ | तुम दुःखी मत हो , मैं तुम्हे सब पापों से मुक्त कर दूँगा || ६६ ||

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७॥

idaṅ tē nātapaskāya nābhaktāya kadācana.
na cāśuśrūṣavē vācyaṅ na ca māṅ yō.bhyasūyati ৷৷ 18.67 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इस गुह्य उपदेश को किसी ऐसे व्यक्ति को कभी मत देना जो तपस्वी नहीं है, जिसमें सेवा-भाव नहीं है, या जो मेरी निन्दा करता रहता है || ६७ ||

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥ ६८॥

ya imaṅ paramaṅ guhyaṅ madbhaktēṣvabhidhāsyati.
bhakitaṅ mayi parāṅ kṛtvā māmēvaiṣyatyasaṅśayaḥ ৷৷ 18.68 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो इस परम गुह्य रहस्य को मेरे भक्तों को सिखाता है और मेरे प्रति परम भक्ति करता है वह अवश्य ही मुझ तक पहुँच जायगा — इसमें संदेह नहीं || ६८ ||

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥ ६९॥

na ca tasmānmanuṣyēṣu kaśicanmē priyakṛttamaḥ.
bhavitā na ca mē tasmādanyaḥ priyatarō bhuvi ৷৷ 18.69 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( ऐसे व्यक्ति की अपेक्षा ) मनुष्यों में मेरा कोई अधिक प्रिय कार्य करने वाला नहीं है और इस संसार में उसकी अपेक्षा मुझे कोई अधिक प्रिय होने वाला नहीं है || ६९ ||

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥ ७०॥

adhyēṣyatē ca ya imaṅ dharmyaṅ saṅvādamāvayōḥ.
jñānayajñēna tēnāhamiṣṭaḥ syāmiti mē matiḥ ৷৷ 18.70 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : और जो व्यक्ति हमारे इस संवाद का अध्ययन करेगा , मेरी यह धारणा है कि वह मेरी ज्ञानयज्ञ द्वारा पूजा कर रहा होगा || ७० ||

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्‌॥ ७१॥

śraddhāvānanasūyaśca śrṛṇuyādapi yō naraḥ.
sō.pi muktaḥ śubhāōllōkānprāpnuyātpuṇyakarmaṇām ৷৷ 18.71৷৷

हिन्दी में भावार्थ : और जो व्यक्ति श्रद्धा से युक्त होकर , ईर्ष्या से रहित होकर इस संवाद को सुनेगा , वह भी मुक्त होकर पुण्य कर्म वाले लोग जहाँ बास्ते हैं , उन शुभ लोकों को पावेगा || ७१ ||

कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥ ७२॥

kaccidētacchrutaṅ pārtha tvayaikāgrēṇa cētasā.
kaccidajñānasaṅmōhaḥ pranaṣṭastē dhanañjaya ৷৷ 18.72 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पार्थ ! क्या तुमने एकाग्रचित होकर यह सब-कुछ सुने ? हे धनंजय ! अज्ञान के कारण जो तुम्हें ‘मोह’ उत्पन्न हो गया था — आसक्ति उत्पन्न हो गई थी — वह ‘मोह’ दूर हुआ ? || ७२ ||

[ उपसंहार ]

अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव॥ ७३॥

arjuna uvāca
naṣṭō mōhaḥ smṛtirlabdhā tvatprasādānmayācyuta.
sthitō.smi gatasandēhaḥ kariṣyē vacanaṅ tava ৷৷ 18.73 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अर्जुन ने कहा : हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा ‘मोह’ नष्ट हो गया है , मुझे ( स्व-धर्म की ) स्मृति फिर प्राप्त हो गई है | अब मेरे संदेह दूर हो गए हैं , मैं स्थिर-चित्त हो गया हूँ , मैं आपके कहे के अनुसार कर्म करूँगा || ७३ ||

संजय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्‌॥ ७४॥

sañjaya uvāca
ityahaṅ vāsudēvasya pārthasya ca mahātmanaḥ.
saṅvādamimamaśrauṣamadbhutaṅ rōmaharṣaṇam ৷৷ 18.74 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : संजय ने कहा : इस प्रकार मैंने वासुदेव और महान आत्मा पार्थ के बीच हुए इस रोमांचकारी अद्भुत संवाद को सुना || ७४ ||

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्‍गुह्यमहं परम्‌ ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्‌॥ ७५॥

vyāsaprasādācchrutavānētadguhyamahaṅ param.
yōgaṅ yōgēśvarātkṛṣṇātsākṣātkathayataḥ svayam ৷৷ 18.75 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : व्यास जी की कृपा से मैंने स्वयं इस परम गुह्य रहस्यमय योग को साक्षात् स्वयं योगेश्वर कृष्ण द्वारा उपदेश दिये जाते हुए सुना || ७५ ||

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्‌ ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥ ७६॥

rājansaṅsmṛtya saṅsmṛtya saṅvādamimamadbhutam.
kēśavārjunayōḥ puṇyaṅ hṛṣyāmi ca muhurmuhuḥ ৷৷ 18.76 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे राजन ! मैं कृष्ण तथा अर्जुन के बीच हुए इस अद्भुत और पुनीत संवाद को बार-बार स्मरण करके आनन्द से पुलकित हो उठता हूँ || ७६ ||

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान्‌ राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७॥

tacca saṅsmṛtya saṅsmṛtya rūpamatyadbhutaṅ harēḥ.
vismayō mē mahān rājan hṛṣyāmi ca punaḥ punaḥ ৷৷ 18.77 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : और हे राजन ! हरि के उस अद्भुत रूप को स्मरण कर-करके मुझे महान विस्मय होता है , और मैं बार-बार पुलकित हो उठता हूँ || ७७ ||

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ ७८॥

yatra yōgēśvaraḥ kṛṣṇō yatra pārthō dhanurdharaḥ.
tatra śrīrvijayō bhūtirdhruvā nītirmatirmama ৷৷ 18.78 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं , वही श्री होगी , वहीं विजय होगी , वहीं विभूति होगी, वहीं अचल नैतिकता होगी – यह मेरी निश्चित धारणा है || ७८ ||

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे मोक्षसन्न्यासयोगो नामाष्टादशोऽध्यायः |

श्रीमद्-भगवद्-गीतारुपी उपनिषद् में जिस ब्रह्मविद्या का वर्णन किया गया है, उसके अन्तर्गत जो योग-शास्त्र है, उसमे जो कृष्णार्जुन-संवाद है, उस संवाद का ‘मोक्ष-संन्यास-योग’-नामक श्रष्टादश अध्याय समाप्त हुआ |

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