षष्ठदश अध्याय – देवासुर-सम्पद-विभाग-योग

[ दैवी-प्रकृति के लोग ]

श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌॥ १॥

śrī bhagavānuvāca
abhayaṅ sattvasaṅśuddhiḥ jñānayōgavyavasthitiḥ.
dānaṅ damaśca yajñaśca svādhyāyastapa ārjavam ৷৷ 16.1 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्री भगवान् ने कहा : हे भारत ! निर्भयता, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञान और योग में निष्ठा , दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप , सरलता || १ ||

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्‌।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्‌ ॥ २॥

ahiṅsā satyamakrōdhastyāgaḥ śāntirapaiśunam.
dayā bhūtēṣvalōluptvaṅ mārdavaṅ hrīracāpalam ৷৷ 16.2 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति , दूसरों के दोष न ढूँढना, प्राणियों पर दया, लोभ न होना, स्वभाव में मृदुता ( कोमलता ) , लज्जाशीलता || २ ||

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहोनातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥ ३॥

tējaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucamadrōhō nātimānitā.
bhavanti sampadaṅ daivīmabhijātasya bhārata ৷৷ 16.3 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, द्वेष न होना, अत्यन्त अभिमान न होना – ये उस व्यक्ति के गुण हैं जो ‘दैवी-संपद’ लेकर जन्म लेता है || ३ ||

[ आसुरी प्रकृति के लोग ]

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्‌॥ ३॥

dambhō darpō.bhimānaśca krōdhaḥ pāruṣyamēva ca.
ajñānaṅ cābhijātasya pārtha sampadamāsurīm ৷৷ 16.4 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे पार्थ ! दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, पारुष्य , अज्ञान – ये उस व्यक्ति के दुर्गुण हैं जो ‘आसुरी-संपद’ लेकर जन्म लेता है || ४ ||

[ दैवी तथा आसुरी प्रकृति के परिणाम ]

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥ ५॥

daivī sampadvimōkṣāya nibandhāyāsurī matā.
mā śucaḥ sampadaṅ daivīmabhijātō.si pāṇḍava ৷৷ 16.5 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : दैवी संपद मोक्ष देने वाली और आसुरी संपद बन्धन में डालनेवाली है | हे पांडव ! तुम दुखी मत हो क्योकि तुम दैवी-संपद लेकर जन्मे हो || ५ ||

द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में श्रृणु ॥ ६॥

dvau bhūtasargau lōkē.smin daiva āsura ēva ca.
daivō vistaraśaḥ prōkta āsuraṅ pārtha mē śrṛṇu ৷৷ 16.6 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इस संसार में दो प्रकार के प्राणियों की सृष्टि है – दैवी तथा आसुरी | हे पार्थ ! दैवी का विस्तार से वर्णन किया जा चुका है, अब तुम मुझसे आसुरी का वर्णन सुनो || ६ ||

bhagwat geeta chapter 16 in hindi

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥ ७॥

pravṛttiṅ ca nivṛttiṅ ca janā na vidurāsurāḥ.
na śaucaṅ nāpi cācārō na satyaṅ tēṣu vidyatē ৷৷ 16.7 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : आसुरी-प्रकृति के लोग न यह जानते हैं कि क्या करना चाहिये , न यह जानते हैं कि क्या नहीं करना चाहिये – उन्हें ‘प्रवृत्ति’ तथा ‘निवृत्ति’ का ज्ञान नहीं होता | उनमें न पवित्रता पायी जाती है , न ‘सदाचार’ पाया जाता है, न ‘सत्य’ पाया जाता है | ( पवित्रता शारीरिक गुण है, सदाचार मानसिक गुण है, सत्य आध्यात्मिक गुण है ) || ७ ||

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्‌।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्‌॥ ८॥

asatyamapratiṣṭhaṅ tē jagadāhuranīśvaram.
aparasparasambhūtaṅ kimanyatkāmahaitukam ৷৷ 16.8 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वे कहते हैं कि यह जगत असत्य है, इसका कोई आधार नहीं है , इसका कोई ईश्वर नहीं है, यह ‘अपरस्पर -संभूत’ है — अर्थात समाज में व्यक्तियों के परस्पर िलने-जुलने से नहीं बना , कामना से ही ( सामजिक-सहयोग की भावना से नहीं, अपितु अपनी वैयक्तिक स्वार्थ्यमायी कामना की पूर्ति से ही ) बना है – यह ‘काम-हैतुक’ है , इसके सिवाय इस संसार के बनने का दूसरा कोई हेतु ही क्या हो सकता है || ८ ||

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥ ९॥

ētāṅ dṛṣṭimavaṣṭabhya naṣṭātmānō.lpabuddhayaḥ.
prabhavantyugrakarmāṇaḥ kṣayāya jagatō.hitāḥ ৷৷ 16.9 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इस दृष्टिकोण को पकड़ कर ये अल्पबुद्धि , नष्टात्मा , भयंकर कर्म करने वाले लोग जगत के शत्रु बनकर उसके विनाश के लिए उभरा करते हैं || ९ ||

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्‍गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥ १०॥

kāmamāśritya duṣpūraṅ dambhamānamadānvitāḥ.
mōhādgṛhītvāsadgrāhānpravartantē.śucivratāḥ ৷৷ 16.10 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : कभी तृप्त न होने वाली लालसा का आश्रय लेकर, दंभ , मान, और मद से युक्त, मोह के कारण असद-ग्रहों-दुष्ट, आसुरी इच्छाओं को ग्रहण करके – अपवित्र निश्चयों को मन में लेकर ( आसुरी प्रकृति के लोग ) कार्य में प्रवृत्त होते हैं || १० ||

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥ ११॥

cintāmaparimēyāṅ ca pralayāntāmupāśritāḥ.
kāmōpabhōgaparamā ētāvaditi niśicatāḥ ৷৷ 16.11 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अपरिमित चिन्ताओं में , जो सृष्टि के प्रलय पर ही जाकर कहीं समाप्त होंगी , पड़े हुए, कामनाओं के परम भोगी, ‘भोग ही सर्वस्व है’ – यह जिहोने निश्चय कर लिया है || ११ ||

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्‌॥ १२॥

āśāpāśaśatairbaddhāḥ kāmakrōdhaparāyaṇāḥ.
īhantē kāmabhōgārthamanyāyēnārthasañcayān ৷৷ 16.12 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : लालसाओं के सैकड़ों जालों में फँसे हुए , काम और क्रोध के पंजे में बँधे हुए ये ( आसुरी-प्रकृति के लोग ) अपनी कामनाओं की तृप्ति के लिये अन्यायपूर्ण उपायों द्वारा ढेर-की-ढेर संपत्ति का संचय करने के लिए प्रयत्न करते हैं  || १२ ||

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्‌।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्‌ ॥ १३॥

idamadya mayā labdhamimaṅ prāpsyē manōratham.
idamastīdamapi mē bhaviṣyati punardhanam ৷৷ 16.13 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : यह आज मैंने प्राप्त कर लिया है ; ( कल ) इस मनोरथ को पूरा कर लूँगा ; यह ( धन ) तो मेरे पास है ही , फिर वह धन भी मेरा हो जायगा || १३ ||

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥ १४॥

asau mayā hataḥ śatrurhaniṣyē cāparānapi.
īśvarō.hamahaṅ bhōgī siddhō.haṅ balavānsukhī ৷৷ 16.14 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इस शत्रु को मैंने मार लिया , अन्य  शत्रुओं को भी मार डालूँगा | मैं ईश्वर हूँ , मैं ही भोग करने वाला हूँ , मैं सिद्ध हूँ – सफल हूँ -बलवान और सुखी हूँ || १४ ||

आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५॥

āḍhyō.bhijanavānasmi kō.nyō.sti sadṛśō mayā.
yakṣyē dāsyāmi mōdiṣya ityajñānavimōhitāḥ ৷৷ 16.15 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : मैं धनवान हूँ , ऊँचे कुल में उत्पन्न हुआ हूँ , मेरे समान दूसरा कौन है ? मैं यज्ञ करूँगा , दान दूँगा , मौज करूँगा – वे अज्ञान के कारण मूढ़ बने हुए ( ऐसी बातें करते हैं ) || १५ ||

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥ १६॥

anēkacittavibhrāntā mōhajālasamāvṛtāḥ.
prasaktāḥ kāmabhōgēṣu patanti narakē.śucau ৷৷ 16.16 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : चित्त की अनेक भ्रान्तियों में पड़े हुए, मोह-जाल से घिरे हुए, विषय और भोगों में आसक्त हुए ये ( आसुरी प्रकृति के लोग ) अपवित्रतापूर्ण नरक में जा गिरते हैं || १६ ||

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्‌ ॥ १७॥

ātmasambhāvitāḥ stabdhā dhanamānamadānvitāḥ.
yajantē nāmayajñaistē dambhēnāvidhipūrvakam ৷৷ 16.17 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अपनी स्तुति आप करने वाले , अकड़बाज, धन तथा मान के मद में मस्त ( ये आसुरी प्रकृति के लोग ) दंभ से — पाखण्ड के साथ — शास्त्र की विधि को छोड़कर नाम के लिये यज्ञ किया करते हैं || १७ ||

अहङ्‍कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः॥ १८॥

ahaṅkāraṅ balaṅ darpaṅ kāmaṅ krōdhaṅ ca saṅśritāḥ.
māmātmaparadēhēṣu pradviṣantō.bhyasūyakāḥ ৷৷ 16.18 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अहंकार , बल , घमंड , काम और क्रोध के वश में होकर ये असूया — दूसरे की निन्दा — करने वाले ( आसुरी प्रकृति के लोग ) मुझ से , जो उनके देह में भी वर्तमान हूँ , दूसरों के देह में भी वर्तमान हूँ , द्वेष करते हैं || १८ ||

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्‌।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥ १९॥

tānahaṅ dviṣataḥ krūrānsaṅsārēṣu narādhamān.
kṣipāmyajasramaśubhānāsurīṣvēva yōniṣu ৷৷ 16.19 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इन द्वेष करने वाले क्रूर व्यक्तियों को, जो संसार में नराधम हैं , अशुभ हैं , मई बार-बार आसुरी योनियों में पटकता रहता हूँ || १९ ||

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्‌॥ २०॥

asurīṅ yōnimāpannā mūḍhā janmani janmani.
māmaprāpyaiva kauntēya tatō yāntyadhamāṅ gatim ৷৷ 16.20 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जन्म-जन्म में आसुरी योनियों में पड़े हुए ये मूढ़ प्राणी, हे कुन्ती के अर्जुन , क्योंकि मुझे पा नहीं सकते , इसलिये मुझे न पाने से इससे भी अधिक अधम गति को जाते हैं || २० ||

[ आसुरी-प्रकृति वालों के लिये नरक के तीन द्वार ]

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्‌ ॥ २१॥

trividhaṅ narakasyēdaṅ dvāraṅ nāśanamātmanaḥ.
kāmaḥ krōdhastathā lōbhastasmādētattrayaṅ tyajēt ৷৷ 16.21 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( आसुरी-प्रकृति के द्वारा ) आत्मा को विनाश की ओर ले जाने वाले तीन प्रकार के दरवाजे हैं | वे हैं : काम, क्रोध और लोभ | इसलिये मनुष्य को इन तीनो का त्याग करना चाहिये || २१ ||

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्‌॥ २२॥

ētairvimuktaḥ kauntēya tamōdvāraistribhirnaraḥ.
ācaratyātmanaḥ śrēyastatō yāti parāṅ gatim ৷৷ 16.22 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कुन्ती के पुत्र अर्जुन ! जो तम — अन्धकार — की ओर ले जाने वाले इन तीनों द्वारों से छूट जाता है , वह आत्मा का कल्याण करने वाले कर्मों का आचरण करता है , और इससे वह परम गति को पाता है || २२ ||

[ कर्तव्य-कर्म के लिये शास्त्र की प्रमाणिकता ]

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥ २३॥

yaḥ śāstravidhimutsṛjya vartatē kāmakārataḥ.
na sa siddhimavāpnōti na sukhaṅ na parāṅ gatim ৷৷ 16.23 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो व्यक्ति शास्त्र के विधान को छोड़कर मनमाना आचरण करने लगता है , उसे न सिद्धि — सफलता — मिलती है , न सुख मिलता है , न उत्तम गति ही मिलती है || २३ ||

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ २४॥

tasmācchāstraṅ pramāṇaṅ tē kāryākāryavyavasthitau.
jñātvā śāstravidhānōktaṅ karma kartumihārhasi ৷৷ 16.24 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इसलिये क्या करना चाहिये , क्या नहीं करना चाहिये — इस बात की व्यवस्था के लिये तुम शास्त्र को ही प्रमाण समझो | शास्त्र में जो विधान बतलाया गया है, जो नियम बतलाये गये हैं , उन्हें जानकर तुम्हे इस संसार में अपना काम करते जाना चाहिए || २४ ||

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्नीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुन दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्यायः |

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