त्रयोदश अध्याय – क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग-योग

[ यह शरीर ‘क्षेत्र’ है , आत्मा ‘क्षेत्रज्ञ’ है ]

अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥

arjuna uvāca
prakṛtiṅ puruṣaṅ caiva kṣētraṅ kṣētrajñamēva ca.
ētadvēditumicchāmi jñānaṅ jñēyaṅ ca kēśava৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अर्जुन ने कहा : हे केशव ! मैं यह जानना चाहता हूँ कि ‘प्रकृति’ क्या है , ‘पुरुष’ क्या है , ‘क्षेत्र’ क्या है , ‘क्षेत्रज्ञ’ क्या है, ‘ज्ञान’ क्या है , ‘ज्ञेय’ क्या है ?

गीता के अनेक संस्करणों में यह श्लोक नहीं पाया जाता | शंकराचार्य ने अपने गईं-भाष्य में इस श्लोक की व्याख्या नहीं की | इसका यही अभिप्राय हो सकता है कि गीता की जो प्रति उनके पास थी उसमें यह श्लोक नहीं था | वैसे गीता में ७०० श्लोक है, परन्तु इस श्लोक को सम्मिलित कर लिया जाय तो गीता के श्लोकों की संख्या ७०१ हो जाती है | गीता की उन प्रतियों में जिनमें यह श्लोक दिया गया है , इसे देकर गिनती में नहीं लिया गया , इसलिये हमने भी इस श्लोक को कोई संख्या नहीं दी है |

श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥ १ ॥

śrī bhagavānuvāca
idaṅ śarīraṅ kauntēya kṣētramityabhidhīyatē.
ētadyō vētti taṅ prāhuḥ kṣētrajña iti tadvidaḥ ৷৷13.1 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : श्री भगवान् ने कहा : हे कौन्तेय ! यह शरीर ‘क्षेत्र’ कहलाता है, और जो व्यक्ति इस क्षेत्र को जानता है उसे तत्त्वज्ञानी लोग ‘क्षेत्रज्ञ’ कहते हैं || १ ||

[ यह संसार ‘क्षेत्र’ है, परमात्मा ‘क्षेत्रज्ञ’ है ]

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २॥

kṣētrajñaṅ cāpi māṅ viddhi sarvakṣētrēṣu bhārata.
kṣētrakṣētrajñayōrjñānaṅ yattajjñānaṅ mataṅ mama ৷৷ 13.2 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे भारत ! ( संसार के ) सब ‘क्षेत्रों’ मुझे ‘क्षेत्रज्ञ’ समझो | मेरा मत है कि ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ के भेद का जो ज्ञान है वही ( वास्तविक ) ज्ञान है || २ ||

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्‌।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु॥ ३॥

tatkṣētraṅ yacca yādṛk ca yadvikāri yataśca yat.
sa ca yō yatprabhāvaśca tatsamāsēna mē śrṛṇu ৷৷ 13.3 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वह ‘क्षेत्र’ जो-कुछ है, जैसा-कुछ है, जैसे उसके विकार होते हैं , परिवर्तन होते हैं , जहाँ से वह आया है, वह जो है और जो उसका प्रभाव है, उसकी शक्ति है — यह मुझ से संक्षेप से सुनो || ३ ||

[ क्षेत्र की व्याख्या ]

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्‌ ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥ ४॥

ṛṣibhirbahudhā gītaṅ chandōbhirvividhaiḥ pṛthak.
brahmasūtrapadaiścaiva hētumadbhirviniśicataiḥ ৷৷ 13.4 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( ‘क्षेत्र-‘क्षेत्रज्ञ’ — इन दोनों में ‘क्षेत्र’ क्या है ? क्षेत्र का ) ऋषियों द्वारा, विविध मन्त्रों से, अनेक प्रकार गान किया गया है | यह ( ‘क्षेत्रज्ञ’ से ) पृथक है ( क्षेत्र तथा क्षेत्रज्ञ — ये दोनों अलग-अलग हैं एक ही नहीं हैं ) | ( क्षेत्र का ) वर्णन निष्चययुक्त ‘ब्रह्मसूत्रो’ और ‘तर्क’ द्वारा किया गया है || ४ ||

महाभूतान्यहङ्‍कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥ ५॥

mahābhūtānyahaṅkārō buddhiravyaktamēva ca.
indriyāṇi daśaikaṅ ca pañca cēndriyagōcarāḥ ৷৷ 13.5 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ( तो फिर ‘क्षेत्र’ की व्याख्या क्या है ? ‘क्षेत्र’ में क्या-क्या आ जाता है ? ) पाँच महाभूत ( पृथ्वी, जल, तेज, वायु , आकाश ), अहंकार , बुद्धि, अव्यक्त मूल प्रकृति, दस इन्द्रियाँ ( पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ — आँख, नाक, कान, जीभ और त्वचा ; पाँच कर्मेन्द्रियाँ — हाथ, पैर , मुँह और दो गुह्येन्द्रियाँ ), एक ( मन ) , इन्द्रियों के पाँच विषय ( देखना, सुनना , चखना और छूना ) || ५ ||

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्‍घातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्‌॥ ६॥

icchā dvēṣaḥ sukhaṅ duḥkhaṅ saṅghātaścētanādhṛtiḥ.
ētatkṣētraṅ samāsēna savikāramudāhṛtam ৷৷ 13.6 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख , शरीर का यह संघात — पिंड, चेतना-शक्ति , धृति-शक्ति — यह संक्षेप पे अपने विकारों सहित ‘क्षेत्र’ का वर्णन है || ६ ||

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्‌ ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥ ७॥

amānitvamadambhitvamahiṅsā kṣāntirārjavam.
ācāryōpāsanaṅ śaucaṅ sthairyamātmavinigrahaḥ ৷৷ 13.7 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अभिमान न होना , दंभ-क्षल-कपट न होना , अहिंसा, क्षमा, सरलता, आचार्य की सेवा, शरीर तथा मन की शुद्धता, स्थिरता, आत्म-संयम || ७ ||

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्‍कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्‌॥ ८॥

indriyārthēṣu vairāgyamanahaṅkāra ēva ca.
janmamṛtyujarāvyādhiduḥkhadōṣānudarśanam ৷৷13.8 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य , अहंकार-शून्यता, संसार में जन्म , मृत्यु, वृद्धावस्था, रोग और दुःख — इन दोषों को देखना || ८ ||

असक्तिरनभिष्वङ्‍ग: पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥ ९॥

asakitaranabhiṣvaṅgaḥ putradāragṛhādiṣu.
nityaṅ ca samacittatvamiṣṭāniṣṭōpapattiṣu ৷৷ 13.9 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अनासक्ति, पुत्र-स्त्री-गृह आदि के साथ मोह का न होना , अभीष्ट और अनभीष्ट , प्रिय तथा अप्रिय में सदा समचित्तता , निरन्तर सम-भाव रखना || ९ ||

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥ १०॥

mayi cānanyayōgēna bhakitaravyabhicāriṇī.
viviktadēśasēvitvamaratirjanasaṅsadi ৷৷ 13.10 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अनन्य-भाव से मुझ में एकनिष्ठ भक्ति , एकान्त स्थान का सेवन , जान-समुदाय में सम्मिलित होने से अरुचि || १० ||

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌ ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥ ११॥

adhyātmajñānanityatvaṅ tattvajñānārthadarśanam.
ētajjñānamiti prōktamajñānaṅ yadatōnyathā ৷৷ 13.11 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : निरन्तर आत्मा के ज्ञान में मग्न रहना, तत्त्वज्ञान ही जीवन का अर्थ है, प्रयोजन है — यह भान हो जाना , यही ‘ज्ञान’ कहलाता है ; इससे जो भिन्न है वह ‘अज्ञान’ है || ११ ||

[ ‘ज्ञेय’ या ब्रह्माण्ड के ‘क्षेत्रज्ञ’ की व्याख्या ]

ज्ञेयं यत्तत्वप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥ १२॥

jñēyaṅ yattatpravakṣyāmi yajjñātvā.mṛtamaśnutē.
anādimatparaṅ brahma na sattannāsaducyatē ৷৷ 13.12 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : अब मैं तुम्हे यह बतलाऊँगा कि ‘ज्ञेय’ क्या है , जानने योग्य क्या है जिसे जान लेने पर अमृत की प्राप्ति हो जाती है | ( वह ‘ज्ञेय’ है : ) अनादि परब्रह्म , जिसके विषय में न यह कह सकते हैं कि वह ‘सत’ है, न यह कह सकते हैं कि  वह ‘असत’ है || १२ ||

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्‌ ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ १३॥

sarvataḥ pāṇipādaṅ tatsarvatō.kṣiśirōmukham.
sarvataḥ śrutimallōkē sarvamāvṛtya tiṣṭhati ৷৷ 13.13 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जहाँ देखो उसके हाथ-पैर हैं, जहाँ देखो उसकी आँखें, उसके सिर और मुख हैं , जहाँ देखो उसके कान हैं , वह सबको लपेटकर इस लोक में ठहरा हुआ है || १३ ||

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्‌ ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४॥

sarvēndriyaguṇābhāsaṅ sarvēndriyavivarjitam.
asaktaṅ sarvabhṛccaiva nirguṇaṅ guṇabhōktṛ ca ৷৷ 13.14 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : उसकी अपनी कोई इन्द्रिय नहीं है फिर भी सब इन्द्रियों का आभास उसमें विद्यमान है, वह अनासक्त है फिर भी सबको ( आसक्त की तरह ) संभाले हुए है , वह स्वयं प्रकृति के ( सत्व, रज , तम ) गुणों से रहित है फिर भी ( प्रकृति के ) गुणों का भोगने वाला है || १४ ||

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत्‌॥ १५॥

bahirantaśca bhūtānāmacaraṅ caramēva ca.
sūkṣmatvāttadavijñēyaṅ dūrasthaṅ cāntikē ca tat ৷৷ 13.15 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वह भूतों के बाहर है और अन्दर भी है ; वह चल है और अचल भी है; वह दूर है और पास भी है; वह सूक्ष्म है इसलिए अविजेय है , जाना नहीं जा सकता || १५ ||

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌ ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥ १६॥

avibhaktaṅ ca bhūtēṣu vibhaktamiva ca sthitam.
bhūtabhartṛ ca tajjñēyaṅ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca ৷৷ 13.16 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वह स्वयं अखंडित है परन्तु सब भूतों में मानों खंडित हो कर बैठा है | यह समझना चाहिए कि वह सब प्राणियों का भरण-पोषण करने वाला है , उन्हें ग्रस जाने वाला है, और फिर नये सिरे से उन्हें उत्पन्न करने वाला है || १६ ||

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्‌॥ १७॥

jyōtiṣāmapi tajjyōtistamasaḥ paramucyatē.
jñānaṅ jñēyaṅ jñānagamyaṅ hṛdi sarvasya viṣṭhitam ৷৷ 13.17 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : वह ज्योतिषियों की भी ज्योति है, उसे अन्धकार से परे कहा जाता है , वही ज्ञान है, वही ज्ञेय है, वही ज्ञानगम्य है, वह सबके हृदय में स्थित है || १७ ||

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ १८॥

iti kṣētraṅ tathā jñānaṅ jñēyaṅ cōktaṅ samāsataḥ.
madbhakta ētadvijñāya madbhāvāyōpapadyatē ৷৷ 13.18 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इस प्रकार ‘क्षेत्र’, ‘ज्ञान’, ‘ज्ञेय’ ( क्षेत्रज्ञ ) के विषय में संक्षेप से बतला दिया | इसे जानकर मेरा भक्त मेरी भावना को पाने के योग्य बनता है ( मैं क्या चाहता हूँ — यह जानने लगता है ) || १८ ||

[ प्रकृति , पुरुष, परमात्मा का विवेचन ]

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्‌यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्‌ ॥ १९॥

prakṛtiṅ puruṣaṅ caiva viddhyanādī ubhāvapi.
vikārāṅśca guṇāṅścaiva viddhi prakṛtisaṅbhavān ৷৷ 13.19 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : तुम इस बात को समझ लो कि प्रकृति तथा पुरुष — ये दोनों भी अनादि हैं | ( प्रकृति के जो ) विकार ( महत, अहंकार, पंचतन्मात्रा अदि जिनका उल्लेख इसी अध्याय के ५-६ श्लोकों में किया गया है ) और ( सत्त्व, रज , तम — ये ) गन प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं | ( मूल-प्रकृति ‘प्रकृति’ है और ये विकार तथा गुण ‘विकृति’ हैं ) || १९ ||

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥ २०॥

kāryakāraṇakartṛtvē hētuḥ prakṛtirucyatē.
puruṣaḥ sukhaduḥkhānāṅ bhōktṛtvē hēturucyatē ৷৷ 13.20 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : ‘कार्य’ अर्थात देह तथा ‘करण’ अर्थात देह के उपकरण इन्द्रियाँ — इनका कर्तृव्य अर्थात इनकी रचना करने वाली प्रकृति ( क्षेत्र ) कही जाती है ; सुख-दुःखों का भोक्ता पुरुष ( क्षेत्रज्ञ ) कहा जाता है || २० ||

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्‌ ।
कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥ २१॥

puruṣaḥ prakṛtisthō hi bhuṅktē prakṛtijānguṇān.
kāraṇaṅ guṇasaṅgō.sya sadasadyōnijanmasu ৷৷ 13.21 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : पुरुष प्रकृति में स्थित होकर प्रकृति से उत्पन्न होने वाले गुणों का भोग करता है | इन गुणों के साथ हो जाना ही इस पुरुष के अच्छी या बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है || २१ ||

उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥ २२॥

upadraṣṭā.numantā ca bhartā bhōktā mahēśvaraḥ.
paramātmēti cāpyuktō dēhē.sminpuruṣaḥ paraḥ ৷৷ 13.22 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : इस देह में ( जेएस पुरुष है , आत्मा है वैसे एक ) परम पुरुष है जिसे परमात्मा कहते हैं , द्रष्टा करहते हैं , अनुमन्ता कहते हैं , भर्ता कहते हैं , भोक्ता कहते हैं , महेश्वर कहते हैं || २२ ||

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥ २३॥

ya ēvaṅ vētti puruṣaṅ prakṛtiṅ ca guṇaiḥsaha.
sarvathā vartamānō.pi na sa bhūyō.bhijāyatē ৷৷ 13.23 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो कोई पुरुष को और गुणों के साथ प्रकृति को इस प्रकार समझ लेता है, वह कैसा ही बर्ताव क्यों न किया करे , उसका पुनर्जन्म नहीं होता || २३ ||

[ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ , अनात्म-आत्म या प्रकृति-पुरुष के भेद का ज्ञान ]

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये साङ्‍ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४॥

dhyānēnātmani paśyanti kēcidātmānamātmanā.
anyē sāṅkhyēna yōgēna karmayōgēna cāparē ৷৷ 13.24 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : कुछ लोग ‘ध्यानयोग’ द्वारा , दूसरे लोग ‘ज्ञानयोग’ द्वारा और कुछ लोग ‘कर्मयोग’ द्वारा , अपने-आप से अर्थात अपने ‘देह’ से अपने आपको अर्थात ‘आत्मा’ को ( अलग ) देख लेते हैं || २४ ||

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥ २५॥

anyē tvēvamajānantaḥ śrutvā.nyēbhya upāsatē.
tē.pi cātitarantyēva mṛtyuṅ śrutiparāyaṇāḥ ৷৷ 13.25 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : परन्तु कुछ अन्य लोग ( योग के इन मार्गों को ) न जानते हुए दूसरे लोगों से ( प्रकृति तथा पुरुष के भेद को ) सुनकर वैसा ध्यान धरते हैं | वे भी जो-कुछ उन्होंने सुना है उस पर तत्पर रहते हुए मृत्यु को तर जाते हैं || २५ ||

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्‍गमम्‌ ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥ २६॥

yāvatsañjāyatē kiñcitsattvaṅ sthāvarajaṅgamam.
kṣētrakṣētrajñasaṅyōgāttadviddhi bharatarṣabha ৷৷ 13.26 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे भरत-कुल में श्रेष्ठ अर्जुन ! यह समझ लो कि स्थावर तथा जंगम जो-कोई भी वस्तु उत्पन्न होती है वह ‘क्षेत्र’ तथा ‘क्षेत्रज्ञ’ के संयोग से ही उत्पन्न होती है || २६ ||

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्‌ ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ २७॥

samaṅ sarvēṣu bhūtēṣu tiṣṭhantaṅ paramēśvaram.
vinaśyatsvavinaśyantaṅ yaḥ paśyati sa paśyati ৷৷ 13.27 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : और इन नाशवान वस्तुओं में जो अविनाशी तत्व परमेश्वर को देखता है , जो सम्पूर्ण जड़-चेतन में सम-भाव से विराजमान है, वही यथार्थ में देखता है || २७ ||

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌ ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌॥ २८॥

samaṅ paśyanhi sarvatra samavasthitamīśvaram.
na hinastyātmanā৷৷tmānaṅ tatō yāti parāṅ gatim ৷৷ 13.28 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : परमेश्वर को सर्वत्र सम-भाव से विराजमान देखने के कारण वह अपने हाथों अपना हनन नहीं करता और इसी से वह परम गति पा लेता है || २८ ||

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥ २९॥

prakṛtyaiva ca karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśaḥ.
yaḥ paśyati tathā৷৷tmānamakartāraṅ sa paśyati ৷৷ 13.29 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो व्यक्ति इस बात को देख लेता है कि सब कर्म सब प्रकार से केवल प्रकृति द्वारा किये जा रहे हैं , आत्मा तो अकर्ता है, वह कर्म करने वाला नहीं है , वही यथार्थ में देखता है || २९ ||

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥ ३०॥

yadā bhūtapṛthagbhāvamēkasthamanupaśyati.
tata ēva ca vistāraṅ brahma sampadyatē tadā ৷৷ 13.30 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जब यह देख लेता है कि पंचभूतों का प्रकृति का जगत पृथक है, अलग है , और एकस्थ आत्मा-परमात्मा का जगत पृथक है , इन पृथक-पृथक सत्ताओं से ही ये सारा विस्तार हो रहा है , तब ब्रह्म प्राप्त होता है || ३० ||

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१॥

anāditvānnirguṇatvātparamātmāyamavyayaḥ.
śarīrasthō.pi kauntēya na karōti na lipyatē ৷৷ 13.31 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : हे कौन्तेय ! क्योंकि वह अव्यय , अविनाशी परमात्मा अनादि है , निर्गुण है, इसलिये शरीर में रहता हुआ भी न कुछ कर्म करता है , न किसी कर्म से लिप्त होता है || ३१ ||

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥ ३२॥

yathā sarvagataṅ saukṣmyādākāśaṅ nōpalipyatē.
sarvatrāvasthitō dēhē tathā৷৷tmā nōpalipyatē ৷৷ 13.32 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिस प्रकार सर्वव्यापी आकाश सूक्ष्मता के कारण किसी वस्तु से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सब देहों में स्थित आत्मा भी किसी प्रकार ( शरीर के कर्म से ) लिप्त नहीं होता || ३२ ||

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥ ३३॥

yathā prakāśayatyēkaḥ kṛtsnaṅ lōkamimaṅ raviḥ.
kṣētraṅ kṣētrī tathā kṛtsnaṅ prakāśayati bhārata ৷৷ 13.33 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जिस प्रकार एक ही सूर्य इस समूचे जगत को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार हे भारत ! क्षेत्र का स्वामी — ‘क्षेत्री’ — समूचे ‘क्षेत्र’ को प्रकाशित करता है || ३३ ||

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्‌ ॥ ३४॥

kṣētrakṣētrajñayōrēvamantaraṅ jñānacakṣuṣā.
bhūtaprakṛtimōkṣaṅ ca yē viduryānti tē param ৷৷ 13.34 ৷৷

हिन्दी में भावार्थ : जो लोग अपने ज्ञान-चक्षुओं द्वारा इस प्रकार ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ के अन्तर को, भेद को जान लेते हैं, और जो पंचभूतात्मक प्रकृति से ( आत्मा के ) मोक्ष को — प्रकृति से आत्मा की अलहगदी को — जान लेते हैं , वे परम पद को प्राप्त कर लेते हैं || ३४ ||

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः |

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